रेलवे का नया फरमान: रेल यात्रा के दौरान आईडी प्रूफ के तौर पर m-Aadhaar होगा मान्य

नई दिल्ली : रेल यात्रियों के लिए रेलवे आए दिन कोई न कोई तोहफा पेश करती रहती है. पहले यात्रा

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नर नहीं तो नरकंकालों की ही सुन लीजिए सरकार

29 मार्च को जब संसद भवन परिसर में लोकसभाध्यक्ष सहित हमारे तमाम सांसद फुटबॉल को किक मारकर फीफा वर्ल्ड कप

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देश कार्य पद्धति में बदलाव चाहता है

वर्ष 2015 बीत चुका है और जब हम देश की आर्थिक स्थिति देखते हैं, तो बड़ी हैरानी होती है. मंत्रिमंडल

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सभी पक्षों को ध्यान में रखकर काम होना चाहिए

बजट सत्र में बजट मुख्य विषय होने के कारण संसद में कम काम होता है और जो बिल सरकार अध्यादेश

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दिल्ली बजट 2014 : यह चुनावी तीर है

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में गत दिनों दिल्ली का बजट पेश किया. भाजपा नेताओं की दलील है कि

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यह किसानों के साथ धोख़ा है

देश में खेती-किसानी से जुड़े लोगों की संख्या क़रीब सत्तर फ़ीसद है. इनमें काफ़ी बड़ा हिस्सा खेतिहर मज़दूरों का है.

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आर्थिक सर्वे ने फिर निराश किया

इसी फ़रेब में हमने सदियां ग़ुजार दीं, गुज़िश्ता साल से शायद ये साल बेहतर हो. उक्त पक्तियां ताजा आर्थिक सर्वेक्षण

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हमारा लोकतंत्र भ्रष्टाचार बनाए रखने का हथियार है

काम तो सचमुच कमाल के हो रहे हैं. सीबीआई सुप्रीम कोर्ट को स्टेटस रिपोर्ट सौंपती है, जिसका रिश्ता 26 लाख

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एक साधारण बजट

अमेरिका का एक कलाकार था हाउदनी, जो लोगों को मोहित करने की कला जानता था. वह लोगों को वास्तविकता का

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एफडीआई की मंज़ूरी जनता के साथ धोखा है

देश के ख़ुदरा बाज़ार में एफडीआई की मंजूरी किसानों, मज़दूरों एवं छोटे व्यापारियों के लिए फ़ायदेमंद नहीं है, फिर भी

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बंद हो कमोडिटी एक्सचेंज

कमोडिटी एक्सचेंज को अर्थशास्त्री सट्टा बाज़ार मानते हैं, क्योंकि वहां लोगों की गाढ़ी कमाई के साथ खिलवाड़ किया जाता है.

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अमीर लोगों से ज्यादा टैक्स लेना ज़रूरी

वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए,

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आयकर का तरीक़ा ग़लत है

राजा को कर कैसे लगाना चाहिए. प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कहा गया है कि जिस तरह मधुमक्खी फूलों से रस

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यह बजट खोखला और दिशाहीन है

यह एक पुराना तर्क है कि जब समस्याएं असामान्य हों, तो ऐसी समस्याओं से निपटने का तरीक़ा भी असामान्य होना

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यह सरकार मज़दूर विरोधी है

बीती 20-21 फरवरी को ट्रेड यूनियनों की दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल न स़िर्फ पूरी तरह कामयाब रही, बल्कि इस हड़ताल

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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बिना ब्‍याज का कर्ज और सस्‍ती जमीन: यह रिश्‍वत नहीं तो क्‍या है

नए-नए बने राजनीतिक दल (अरविंद केजरीवाल द्वारा घोषित) ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर एक साथ कई आरोप लगाए हैं. इन तमाम आरोपों में कई चीजें शामिल हैं और इनमें कई तथ्य एवं आंकड़े बहुत ही बड़े हैं, लेकिन इस सबके बीच अगर सिद्धांत की बात की जाए तो दो चीजें एकदम स्पष्ट हैं. पहला यह कि रॉबर्ट वाड्रा की कुल पहचान यही है कि वह सोनिया गांधी के दामाद हैं.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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बिगड़े रिश्‍ते, बिगड़ी अर्थव्‍यवस्‍था

अब प्रणब मुखर्जी के दूसरे मंत्रियों और प्रधानमंत्री से रिश्ते की बात करें. वित्त मंत्री माना जाता है कि आम तौर पर कैबिनेट में दूसरे नंबर की पोजीशन रखता है. वित्त मंत्रालय इन दिनों मुख्य मंत्रालय (की मिनिस्ट्री) हो गया है, क्योंकि हर पहलू का महत्वपूर्ण पहलू वित्त होता है, इसलिए बिना वित्त के क्लीयरेंस के कोई भी फैसला हो ही नहीं सकता.

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ओमिता पॉल महान सलाहकार

प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. ऐसे में उनके चार दशक पुराने राजनीतिक करियर की समीक्षा की जा रही है. देश की वर्तमान खराब आर्थिक हालत और उसमें प्रणब बाबू की भूमिका पर भी खूब चर्चा हो रही है, लेकिन इस सबके बीच एक और अहम मसला है, जिस पर ज़्यादा बात नहीं हो रही है. खासकर ऐसे समय में, जबकि बिगड़ी आर्थिक स्थिति को न सुधार पाने के लिए प्रणब मुखर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा हो. यह सवाल सीधे-सीधे वित्त मंत्री के सलाहकार से जुड़ा हुआ है.

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प्रणब मुखर्जी सफल राष्ट्रपति साबित होंगे

हिंदुस्तान की राजनीति में इंदिरा जी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी का एक विशेष स्थान रहा. जब इंदिरा जी की हत्या हुई तो प्रणब मुखर्जी और राजीव गांधी दोनों दिल्ली से बाहर थे. न केवल बाहर थे, बल्कि दोनों साथ थे. वापस लौटते हुए जब बातचीत हुई कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, क्योंकि इंदिरा जी की हत्या हो गई है और उनकी लाश दिल्ली में रखी हुई है तो प्रणब मुखर्जी ने लोगों से कहा कि मैं ही सबसे वरिष्ठ हूं और मुझे ही प्रधानमंत्री बनना चाहिए.

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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है.

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रुपयों के किराए का नियंत्रण

अर्थशास्त्रियों की गणना अजीब है. उनका कल्पनातीत हिसाब है. जमा पूंजी का हिसाब लगाने के उनके तरीक़े को अगर आप ग़ौर से देखें तो यही लगेगा कि ऐसी बातें करने वालों को क्यों न जल्दी से पागलखाने भिजवा दिया जाए. उदाहरण स्वरूप, अगर एक बैंक के पास लोगों के खातों में जमा रुपये, मान लीजिए 5 करोड़ हैं तो वे अर्थशास्त्री कहते हैं कि 5 करोड़ जमा हैं. ऐसा होने से 5 करोड़ उस बैंक की साख बन गए.

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बजट- 2012 देश पर गंभीर आर्थिक संकट

सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.

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काला धन पर बहसः नीति और नीयत दोनों में खोट है

काला धन. एक ऐसा शब्द जिसके सहारे विपक्ष जनता को सुनहरे भविष्य और खुद के लिए सत्ता का सपना देख रहा है. लालकृष्ण आडवाणी ने इसी मुद्दे पर रथ यात्रा कर डाली. संसद में इस मुद्दे पर बहस कराने के लिए बीजेपी ने ए़डी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. बहस भी हुई, लेकिन नतीजा स़िफर.

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अन्‍न का अनादर

महंगाई और भूख से परेशान इस देश में भंडारण की समुचित व्यवस्था न होने से अन्न सड़ रहा है. और, यह देश के नीति नियंताओं के लिए शर्म की बात है. महंगाई के मुद्दे पर हो रहे हंगामे को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि रबी की फसल आने के बाद महंगाई में गिरावट दर्ज़ होगी, लेकिन शायद उन्हें यह नहीं मालूम कि पिछले वर्ष भी देश में अनाज की कमी नहीं थी.

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अब भारत में भी इंडिया फर्स्ट लाइ़फ इंश्योरेंस

भारत के दो प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों-बैंक ऑफ बड़ौदा एवं आंध्रा बैंक के साथ यूके की अग्रणी जोखिम, संपदा एवं निवेश कंपनी लीगल एवं जनरल के एक संयुक्त उद्यम इंडिया फर्स्ट इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने इसकी शुरुआत करने की घोषणा की है.

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स्‍वायत परिषद पर गोरखा मान जाएंगे?

गोरखा जन मुक्ति मोर्चे के मुखिया विमल गुरुंग अपने आंदोलन को गांधीवादी करार देते हैं, पर ज़रूरत पड़ने पर वह

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