इटली के दो नौसैनिकों का हाल का विवाद चर्चा में है. इन दोनों को भारतीय अदालत से इस शर्त पर जमानत मिल गई थी कि जब कभी ज़रूरत होगी, वे स्वेच्छा से अदालत में हाजिर हो जाएंगे. जमानत मिलने के बाद दोनों इटली चले गए और अब वापस आने से मना कर रहे हैं. इस [...]
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बाबुओं का साहित्य प्रेम कई बाबुओं के अंदर साहित्यिक अभिरुचि पनप रही है. कुछ बाबू विश्लेषण, तो ज़्यादातर फिक्शन लिखते हैं. पूर्व आईपीएस अधिकारी पवन वर्मा, राजनयिक एवं राजदूत नवतेज सरना और आईएएस अधिकारी उपमन्यु चटर्जी ने लेखक एवं उपन्यासकार के रूप में अपना करियर बनाया है. इन लोगों की किताबों ने कोई विवाद पैदा [...]
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बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.
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सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.
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बिहार के चौक-चौराहों पर लगे सरकारी होर्डिंग में जिस तरह सुशासन का प्रचार किया जाता है, वह एनडीए सरकार की शाइनिंग इंडिया की याद दिलाता है. बिहार से निकलने वाले अ़खबार जिस तरह सुशासन की खबरों से पटे रहते हैं, उसे देखकर आज अगर गोएबल्स (हिटलर के एक मंत्री, जो प्रचार का काम संभालते थे) भी ज़िंदा होते तो एकबारगी शरमा जाते. ऐसा लिखने के पीछे तर्क है.
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संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.
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यह हमेशा विवाद का विषय रहा है कि विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करके लड़ा जाए या चुनाव के बाद मुख्यमंत्री चुना जाए. ठीक उसी तरह, जैसे लोकसभा चुनाव में कुछ पार्टियां प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करके लड़ती हैं, कुछ पार्टियां ऐसा नहीं करती हैं. 2004 में भाजपा ने आडवाणी जी को प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग कहकर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस ने किसी को भी अपना उम्मीदवार नहीं बनाया था.
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एक बार फिर मुस्लिम आरक्षण को लेकर पूरे देश में विवाद खड़ा हो गया है. कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय मुसलमानों को 4.5 फीसदी आरक्षण के रूप में जो लॉलीपॉप दिया था, उसकी सच्चाई उस समय सामने आ गई, जब आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने उसे यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि यह धर्म की बुनियाद पर है और संविधान के अनुकूल नहीं है.
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इस साल का आईपीएल सीजन फिर विवादों में घिर गया. इस बार खिलाड़ियों के स्पॉट फिक्सिंग में फंसने की बात सामने आई. कुछ खिलाड़ियों ने अनुबंध से ज़्यादा राशि मिलने की बात स्वीकार की. विवाद इतना बढ़ा कि बात संसद के गलियारों तक पहुंच गई.
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चौथी दुनिया को कुछ ऐसे दस्तावेज़ हाथ लगे हैं, जिनसे हैरान करने वाली सच्चाई का पता चलता है. कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई हुई, जिसमें लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह को अगले सेनाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति पर सवाल खड़े किए गए.
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अभिषेक मनु सिंघवी, कांग्रेस के प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं. इससे भी बड़ा परिचय उनका यह है कि वह सांसद हैं. ऐसे-वैसे सांसद नहीं, बल्कि संसद की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन हैं. वह देश में क़ानून बनाने की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली केंद्र हैं.
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व्यवस्था संविधान को धोखा देकर बनी है |
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