जरा हट के : कुत्ते ने हासिल की एमबीए की डिग्री

हो सकता है आने वाले दिनों में प्राइवेट कंपनियों में एमबीए होल्डर कुत्तों की मांग आने लगे. कुत्ते की जितनी बड़ी

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बंद मिलें और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

समस्तीपुर बिहार का प्रमुख ज़िला है. यहां पूर्व मध्य रेलवे का मंडलीय कार्यालय है, उत्तर बिहार का इकलौता राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय है. फिर भी यह जिला औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ा है. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद यहां उद्योग पनप नहीं पा रहे हैं.

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पूर्वी चंपारणः महात्‍मा गांधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जनसंघर्ष और नेतागिरी

संघर्ष ज़मीन तैयार करता है और फिर उसी ज़मीन पर नेता अपनी राजनीतिक फसल उगाते हैं. कुछ ऐसा ही हो रहा है मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए बने संघर्ष मोर्चा के साथ. चंपारण की जनता केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दिन-रात एक करके संघर्ष करती है और जब दिल्ली आती है अपनी बात केंद्र तक पहुंचाने, तो वहां मंच पर मिलते हैं बिहार के वे सारे सांसद, जो संसद में तो इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलते, लेकिन जनता के बीच भाषणबाज़ी का मौक़ा भी नहीं छोड़ते.

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सिंह नहीं, किंग महेंद्र

हम और आप केवल कल्पना कर सकते हैं कि क्या कोई शख्स सात बार लगातार राज्यसभा के लिए चुना जा सकता है, लेकिन नज़र जब किंग महेंद्र के चेहरे पर जाकर अटकती है तो लगता है कि इस धरती एवं इस लोकतंत्र में कुछ भी संभव है. इस लंबे दौर में बिहार एवं केंद्र में सत्ता की राजनीति का चेहरा कई बार बदला, पर एक चीज़ नहीं बदली और वह थी किंग महेंद्र की राज्यसभा के लिए दावेदारी.

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बिहारः केंद्रीय विश्वविद्यालय कहां खुलेगा, गांधी की कर्मभूमि या तथागत की तपोभूमि में

केंद्रीय विश्वविद्यालय को लेकर बिहार में बहस शुरू हो गई है. इसे राजनीतिक रंग भी दिया जा रहा है. इस मामले को लेकर केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल फ्रंट फुट पर हैं, तो बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार बैक फुट पर आ गए हैं. लेकिन राजनीतिक मजबूरी और वादा़खिला़फी से घबराये बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, अंतरराष्ट्रीय पटल पर महत्वपूर्ण होते जा रहे गया में केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं बनने देना चाह रहे हैं.

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सही प्रशिक्षण से सफलता मिलेगी

आज पूरा विश्व बैंकिंग और कॉरपोरेट क्षेत्र में आई मंदी की मार झेल रहा है. यूरोप में इसका प्रभाव ज़्यादा दिखा, जबकि भारत इस मंदी से कुछ हद तक अपने को दूर रखने में कामयाब रहा है. भारत ने इसके लिए एक अच्छा रास्ता अपनाया. उसने अपनी घरेलू मांग को बढ़ाया. साथ ही केंद्र और राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों ने भी कॉरपोरेट क्षेत्र को मंदी से निपटने में सहयोग दिया, लेकिन सरकार का सहयोग और घरेलू मांगों को बढ़ाना ही वैश्वीकरण के इस दौर में मंदी से बचने के लिए का़फी नहीं है.

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बार-बार वर्धा

तक़रीबन दस-ग्यारह महीने बाद एक बार फिर वर्धा जाने का मौक़ा मिला. वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छात्रों से बात करने का मौक़ा था. दो छात्रों हिमांशु नारायण और दीप्ति दाधीच के शोध को सुनने का अवसर मिला.

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संकट में हॉवर्ड की प्रतिष्ठा

दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक हॉवर्ड विश्वविद्यालय इन दिनों विवादों में घिर गया है. विश्वविद्यालय के दो निर्णयों की दुनिया भर में आलोचना हो रही है. पहला निर्णय तो भारतीय राजनेता एवं अर्थशास्त्री सुब्रह्मण्यम स्वामी को गर्मी के दौरान चलने वाले अर्थशास्त्र के दो पाठ्यक्रमों के शिक्षण से हटा देने का है.

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केंद्रीय विश्‍वविद्यालय स्‍थापित करने की मांगः चंपारण एक बार फिर आंदोलन की राह पर

महात्मा गांधी के नाम पर कसमें खाकर दुबली होने वाली कांग्रेस सरकार उनके नाम पर एक अदद केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने को तैयार नहीं है, जो कि बापू की कर्मभूमि चंपारण के मोतिहारी में प्रस्तावित है. केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का अड़ियल रवैया उसकी स्थापना में बाधक बन रहा है. सिब्बल के ताजा बयान ने केंद्रीय विश्वविद्यालय का सपना संजोए चंपारणवासियों के अरमान में पलीता लगा दिया है.

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पाटलिपुत्र का दर्द

ईसा से 304 वर्ष पूर्व भारत आए प्रसिद्ध ग्रीक राजदूत मेगास्थनीज ने यदि यह न लिखा होता कि भारत के इस महानतम नगर पाटलिपुत्र (पटना) की सुंदरता और वैभव का मुक़ाबला सुसा और एकबताना जैसे नगर भी नहीं कर सकते, तो शायद आज भारत के गंदे नगरों में गिना जाने वाला पटना कभी इतना सुंदर था, यह मानने के लिए लोग तैयार न होते.

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पत्रकारिता के अभिमन्यु

कॉलेज के उत्साही शिक्षक डॉ. हरीश अरोड़ा ने बेहद श्रमपूर्वक दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी. इस संगोष्ठी के अंतिम दिन और अंतिम सत्र में मुझे भी बोलना था.

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सार-संक्षेपः ब्याज़ मा़फिया का आतंक

पिछले दिनों आगरा में आईजी रेंज पी.के. तिवारी की पहल पर छह ब्याज़ माफिया के खिला़फ मुक़दमे ज़रूर लिखे गए किंतु ब्याज़ माफियाओं पर इसका कोई असर नहीं दिखाई दे रहा. उनके सर पर राजनीतिक पहुंच वाले लोगों का हाथ है, इसलिए उनके आका मामलों को खत्म करने की जुगत में लगे हुए हैं और ब्याज़ मा़फिया शान से खुले घूम रहे हैं.

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मगध विश्‍वविद्यालयः बेहतर भविष्‍य की ओर अग्रसर

जिस प्रकार प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक व्यवस्था तथा पठन-पाठन के उच्च मापदंड के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध था, ठीक उसी प्रकार अब मगध विश्‍वविद्यालय भी देश-दुनिया में उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानक पर खरे उतरते हुए अपनी पहचान बनाने में सफल हो रहा है.

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पुस्‍तक अंश: मुन्‍नी मोबाइल- 32

आनंद विचारों को झटक देना चाहते थे, पर ऐसा उनके साथ कई बार नहीं हो पाता. ख़ासकर इलाहाबाद उनके लिए यादों का शहर रहता है हर बार. विश्वविद्यालय परिसर ही नहीं, कभी-कभी इस शहर का हर कोना उन्हें मानसी के बिना अधूरा-अधूरा लगता. वह कहीं भी जाते, मानसी का वजूद उनका पीछा करता.

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विक्रमशिला को सबने छला

प्राचीनकाल में बिहार में नालंदा और विक्रमशिला दो ऐसे विश्वविद्यालय थे, जो पूरी दुनिया में प्रमुख शिक्षा केंद्र के रूप में मशहूर थे. यहां बड़ी संख्या में दूसरे देशों से भी छात्र पढ़ने और अनुसंधान के लिए आते थे, लेकिन आज दोनों ही विश्वविद्यालय बदहाली के शिकार हैं.

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कुलपति की पहल रंग लाएगी

राज भवन और राज्य सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग के बीच क़रीब दो महीने की रसाकसी के बाद मगध विश्वविद्यालय के शिक्षकों, छात्रों व कर्मचारियों ने कुलपति के अधिकार मिलते ही राहत की सांस ली. इससे शैक्षणिक व प्रशासनिक कार्य भी पटरी पर आने लगा, लेकिन जो लोग मगध विश्वविद्यालय मुख्यालय, अंगीभूत कॉलेजों में बैठकबाजी में लगे रहते थे.

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दिल्‍ली का बाबूः सरकारी फैसलों पर बाजार का असर

केंद्र सरकार के कामकाज पर नजर रखने वालों की बातों का भरोसा करें तो कुछ खास मंत्रालयों के नौकरशाहों एवं शेयर बाजार के बीच एक नया और रोचक रिश्ता बनता दिख रहा है. बाजार से जुड़े मंत्रालयों में पदस्थ नौकरशाह शेयर बाजार की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बिजनेस न्यूज चैनलों पर नजर गड़ाए रहते हैं.

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की समस्याएं

सबसे पहले मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि अलीगढ़ से मेरा कोई ख़ास वास्ता नहीं है. मुझे कभी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में पढ़ाई करने का मौक़ा नहीं मिला. फिर भी कुछ ऐसी वजहें बताना चाहूंगा, जिनके चलते मुझे लगता है कि इस विश्वविद्यालय से मेरा भी कुछ रिश्ता है.

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उच्च शिक्षा विभाग बदहाली का शिकार

मध्य प्रदेश के किसी विश्वविद्यालय में उप कुलपति बनने से बेहतर है किसी होटल का मैनेजर बनना. यह कथन है लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाशप्राप्त) के टी सतारावाला का. इस कथन की पृष्ठभूमि यह है कि 1978 में सतारावाला को जबलपुर विश्वविद्यालय का उप कुलपति नियुक्त किया गया था.

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समान शिक्षा प्रणाली ही चाहिए

केंद्र सरकार जनता को गुमराह करने के लिए धन की कमी का हवाला देकर कारपोरेट एवं ग़ैर सरकारी संगठनों की लॉबी से सांठगांठ करने में जुटी हुई है. इससे भविष्य में ग़रीब एवं अमीर के बीच की खाई गहराने के संकेत स्पष्ट नज़र आ रहे हैं. यदि इसी तरह चलता रहा तो आने वाले समय में यह सामाजिक विषमता विद्रोह का रूप धारण कर सकती है.

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प्रधानमंत्री जी, क्‍या देश में प्रतिभा की कमी है?

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. दीपक पेंटल पर मेहरबान है. यहां तक कि मंत्रालय उनके लिए नियमों में फेरबदल को भी तैयार है. इससे जो अनेक सवाल खड़े होते हैं, उनमें से एक यह भी है कि क्या भारत में ऐसे सक्षम लोगों की कमी हो गई है, जो हमारी विश्वविद्यालयी व्यवस्था की कमान संभाल सकें? ऐसा हम तो नहीं मानते, पर मानव संसाधन मंत्रालय का ऐसा ही मानना है.

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दिल्ली का बाबू

इतने स़ख्त नियमों के बावजूद कुछ बाबुओं ने अपने वेतन में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी का जुगाड़ कर ही लिया. वित्तीय बाज़ार के अस्थिर रु़ख को देखते हुए सरकार अब पूंजी बाज़ार पर उच्च स्तरीय समन्वय समिति (एचएलसीसी) को पूर्ण विकसित नियामक में तब्दील करने की योजना बना रही है.

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