पांडुलिपियों में छिपे हैं मिथिला के कई रहस्य

मिथिला के कई अनसुलझे प्राचीन रहस्य आज भी उन पांडुलिपियों में छिपे हुए हैं, जो अभी भी शिक्षण संस्थाओं के

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बिना वृक्ष नहीं कल्याण

सभ्यता के आरंभ से ही मनुष्य का प्रकृति से गहरा रिश्ता रहा है, लेकिन आज हम उसी प्रकृति की अनदेखी

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बाबा की महिमा अपरंपार

जब वेद और पुराण ही ब्रह्मा या सद्गुरु का वर्णन करने में असमर्थता प्रगट करते हैं, तब हम एक अल्पज्ञ प्राणी अपने सद्गुरु श्री साई बाबा का वर्णन कैसे कर सकते हैं. सच पूछा जाए तो मूक रहना ही सद्गुरु की विमल पताकारूपी विरुदावली का उत्तम प्रकार से वर्णन करना है, परंतु उनमें जो उत्तम गुण हैं, वे हमें मूक कहां रहने देते हैं. यदि स्वादिष्ट भोजन बने और मित्र एवं संबंधी आदि साथ बैठकर न खाएं तो वह नीरस सा प्रतीत होता है और जब वही भोजन सब एक साथ बैठकर खाते हैं, तब उसमें एक विशेष प्रकार की सुस्वादुता आ जाती है.

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सद्गुरु की पहचान

जो वेद, वेदांत एवं छहों शास्त्रों की शिक्षा प्रदान करके ब्रह्म विषयक मधुर व्याख्यान देने में पारंगत हो, जो अपनी श्वांसोच्छवास क्रियाओं पर नियंत्रण कर सहज ही मुद्राएं लगाकर अपने शिष्यों को मंत्रोपदेश दे, निश्चित अवधि में यथोचित संख्या का जप करने का आदेश दे और केवल अपने वाक्‌ चातुर्य से ही उन्हें जीवन के अंतिम ध्येय का दर्शन कराता हो तथा जिसे स्वयं आत्म साक्षात्कार न हुआ हो, वह सद्गुरु नहीं है.

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अतीत मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण : राजेंद्र मोहन

मेरे लिए अतीत इसलिए जरूरी है जैसे पेड़ के लिए जड़. जड़ रहित पेड़ खड़ा नहीं रह सकता. संसार में भारत को इसीलिए सबसे ज़्यादा महत्व हासिल है, क्योंकि उसके पास वेदोपनिषद्‌ जैसे ज्ञान के उत्कृष्ट भंडार हैं. वेद तो संसार के प्राचीनतम एवं आध्यात्मिक ग्रंथ हैं, जो संसार को सदैव उज्ज्वल दृष्टि प्रदान करते रहे हैं, कहते हैं लेखक एवं साहित्यकार डॉ. राजेंद्र मोहन भटनागर.

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