सांप्रदायिकता की राजनीति

सांप्रदायिकता का आरोप झेलने वाले दल या व्यक्ति ये कैसे मान लेते हैं कि मुसलमानों का विरोध करना ही सांप्रदायिकता

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व्यवस्था संविधान को धोखा देकर बनी है

कर्नाटक में कांग्रेस भारी बहुमत से जीत गई और भारतीय जनता पार्टी हार गई. क्या इसका मतलब हम यह निकालें

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कांग्रेस और मुस्लिम संगठनों को सबक़ लेना चाहिए

गुजरात का चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए एक अलग तरह का सबक़ है और कांग्रेस के लिए दूसरी तरह का. भारतीय जनता पार्टी न अपनी जीत से कुछ सीखती है और न कांग्रेस अपनी हार से. एक और वर्ग है, जो सबक़ नहीं सीखता और वह है हमारे देश का मुस्लिम समाज. मैं शायद ग़लत शब्द इस्तेमाल कर रहा हूं. मुझे मुस्लिम समाज नहीं, मुस्लिम संगठन और मुस्लिम नेता शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए.

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गुजरात चुनाव सब की परीक्षा लेगा

गुजरात विधानसभा चुनाव किसके लिए फायदेमंद होगा और किसके लिए नहीं, यह तो आख़िरी तौर पर दिसंबर के आख़िरी हफ्ते में पता चलेगा, जब परिणाम आ जाएंगे. लेकिन परीक्षा किस-किस की है, इसका आकलन करना ज़रूरी है. गुजरात विधानसभा चुनाव में पहली परीक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की है. कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के अलावा कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसके जाने से भीड़ इकट्ठी हो सके. यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा में भी सारे ख़र्चों और सारी कोशिशों के बावजूद लोगों की संख्या कुछ हज़ारों तक सीमित रहती है.

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समय के साथ बदलते मुस्लिम चेहरे

उत्तर प्रदेश की राजनीति में तमाम मुस्लिम चेहरे मोर्चा संभाले हुए हैं. ये चेहरे सभी दलों में मौजूद हैं. कहीं ये शो पीस की तरह हैं तो कई जगह इनके कंधों पर वोट बैंक की ज़िम्मेदारी है. कोई भी दल ऐसा नहीं है, जो मुस्लिम चेहरों को आगे करके अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए दाना न डाल रहा हो.

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और मुद्दे

ब्रिटिश सार्वजनिक जीवन की एक आधारभूत सच्चाई यह है कि वहां के टैक्सी चालक को भी अपने देश के राजनीतिक हालात के बारे में जानकारी होती है और जब आप टैक्सी से यात्रा कर रहे हों तो वह आपको मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों के बारे में बता सकता है.

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वोट पाने के लिए हर हथकंडा

दिल्ली में राहुल की ताजपोशी का लक्ष्य पूरा करने के लिए कांग्रेस हर वह हथकंडा अपना रही है, जिससे मुस्लिमों के वोट फिर से उसकी झोली में आ जाएं. ऐसा करते समय उसे न तो इस बात की चिंता रही कि वह संविधान से खिलवाड़ कर रही है और न इस बात की कि उसके नेताओं के आचरण से चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को ठेस पहुंच रही है.

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उत्तर प्रदेशः क्‍या रशीद मसूद मुख्‍यमंत्री बन सकते हैं

रशीद मसूद का नाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी परिचय का मोहताज नहीं है. सहारनपुर से पांच बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके रशीद मसूद समाजवादी पार्टी के अंदर रहकर इतने परेशान हो गए थे कि आखिरकार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस का हाथ थाम लिया.

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पूर्वांचल के बुनकरों का दर्दः रिश्‍ता वोट से, विकास से नहीं

केंद्र की यूपीए सरकार से पूर्वांचल के लगभग ढ़ाई लाख बुनकरों को का़फी उम्मीदें थीं. बुनकरों के लिए करोड़ों रुपये के बजट का ऐलान सुनते ही बुनकरों को यक़ीन हो गया कि उनकी हालत अब सुधरने वाली है, लेकिन जब हक़ीक़त सामने आई तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे.

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राजनीतिक दलों का दलित प्रेम दिखावा है

उत्तर प्रदेश में जहां मुस्लिम वोटों के लिए जंग जारी है, वहीं दलों का दलितों के प्रति दुलार जगा है. यही वजह है कि बसपा ने 88, सपा ने 85, भाजपा ने 85 और कांग्रेस ने 87 विधानसभा सीटों पर अपने-अपने दलित प्रत्याशी उतारे हैं. मायावती ने जिन 88 दलितों को उम्मीदवार बनाया है, उनमें से 78 खुद उनकी अपनी जाटव जाति के हैं, जबकि उन्होंने पासियों को 4, धोबियों को 2 और धानुकों, नटों एवं वाल्मीकियों एक-एक टिकट दिया है.

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विधायक जी बैठक से गायब क्यों थे

जनता और जनप्रतिनिधियों का आमना-सामना पांच सालों में स़िर्फ एक बार ही होता है. वह तब, जब विधायक जी विधायक बनने की आस में जनता के आगे हाथ फैलाकर वोटों की भीख मांगते हैं. चुनाव खत्म होते ही जनप्रतिनिधि असली रंग रूप में आ जाते हैं.

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कांग्रेस को दोस्ती निभाना नहीं आता

वे सांसद कहां हैं, जो अन्ना हजारे को यह समझा रहे थे कि संसद की एक गरिमा होती है, उसे बाहर से डिक्टेट नहीं किया जा सकता है. वे आज चुप क्यों हैं? संसद की गरिमा बचाने के लिए, देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए. कैश फॉर वोट भारत के इतिहास का सबसे शर्मनाक स्कैम है. देश के सांसद बिकते हैं, ऐसा सोचकर ही घिन होती है.

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विधानसभा चुनावः सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का मिज़ाज अलग है. यहां सियासी दल जनता को वोट के बदले क़ीमती वस्तुएं देने का लालच दे रहे हैं.

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विधानसभा चुनाव और मुसलमानों का सियासी रूझान

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं, मुसलमान वहां रिवायती तौर पर अभी तक सीपीएम के नेतृत्व वाले वाम

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विधानसभा चुनावः सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्‍टाचार

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का मिज़ाज अलग है. यहां सियासी दल जनता को वोट के बदले क़ीमती वस्तुएं देने का लालच दे रहे हैं. जहां सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के प्रमुख और मुख्यमंत्री एम करुणानिधि जनता को करुणानिधि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए सस्ता अनाज, हर ग़रीब परिवार को मुफ़्त रंगीन टीवी, छात्रों को लैपटॉप, महिलाओं को मंगलसूत्र के लिए सोना देने और विकास के नाम पर समर्थन जुटाने की कवायद में जुटे हैं, वहीं एआईएमडीएमके की महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने जनता को राशन कार्ड पर 20 किलो चावल म़ुफ्त, छात्रों को लैपटॉप, महिलाओं को पंखे, मिक्सर, ग्राइंडर एवं मिनरल वाटर आदि देने का ऐलान किया है.

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युवाओं को सड़क पर उतरना होगा

23 मार्च, 1931 की सुबह सात बजे लाहौर जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई. ये जांबाज़ स्वतंत्रता संग्राम के महानायक थे. इनकी आंखों में आज़ाद भारत का सपना था. एक ऐसा भारत, जो दुनिया भर में लोकतंत्र की एक मिसाल बनेगा.

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मतदाताओं की पहचान से खिलवाड़

लोकतंत्र का महापर्व है चुनाव. इस पर्व की शुरुआत होती है मतदाताओं से. मतदाता ही इस पर्व का आयोजक, नियोजक और प्राप्तकर्ता है. मतदाता वह होता है, जो देश का भविष्य तय करता है, पर अ़फसोस कि किसी भी नगर, क़स्बे या गांव में चले जाइए, आपको मतदाता सूची सा़फ-सुथरी शायद ही मिले.

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वोट के बदले चोट

नीतीश कुमार को बिहार में जो प्रचंड जनादेश मिला है, उसमें महादलित समुदाय की भूमिका का़फी अहम मानी गई. महादलितों ने चुनाव में जिस तरह एनडीए के लिए दिल खोला, ठीक उसी तरह वे चाहते हैं कि सरकार उनकी भलाई के लिए खजाना खोले.

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छपराः पंचायत चुनाव की सरगर्मी बढ़ी

पिछले महीने समाप्त हुए विधान सभा चुनाव की चर्चाएं अभी पूरी तरह थमी भी नहीं हैं कि अप्रैल-मई में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर गांव-गंवई की राजनीति परवान चढ़ने लगी है. पंचायत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार सक्रिय हो गए हैं.

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नीलाम हुआ लोकतंत्र:सौ रुपये का एक वोट

बिहार में लोकतंत्र भी बिकता है. विधानसभा चुनाव संपन्न हो गए और नीतीश कुमार की सरकार भी बन गई, लेकिन इस चुनाव में लोकतंत्र का एक घिनौना चेहरा देखने को मिला. गया ज़िले के सभी दस विधानसभा क्षेत्रों में लोकतांत्रिक अधिकारों की बोली लगाई गई. इस बोली में दलीय और निर्दलीय प्रत्याशी सभी शामिल थे.

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यह बिहार और विकास की जीत है

दो कहावतें हैं. एक लालू यादव और राम विलास पासवान पर तथा एक कांग्रेस पर लागू होती है. कछुए और खरगोश की दौड़ की कहानी हम सबने बचपन में पढ़ी भी है और जीवन में कई बार सुनी भी है. खरगोश सोचता था कि कछुआ कहां उसके सामने दौड़ पाएगा, इसलिए आराम कर लो, बाद में दौड़ कर हरा ही दूंगा. लालू यादव को लगता था कि वह और राम विलास पासवान मिल जाएंगे तो ताक़तवर दो समाजों का गठजोड़ हो जाएगा. यादव और पासवान और फिर मुसलमान उनके साथ रहेगा ही. वह भाजपा के साथ जाएगा नहीं. दोनों ने खरगोश की तरह सोचा और आराम से छह महीने पहले पंद्रह साल पुरानी रणनीति पर अमल करने लगे. नीतीश ने दो साल में खामोश चेतना पैदा कर दी, आशाएं पैदा कर दीं. कछुआ जीत गया और एक बार फिर खरगोश हार गया.

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उत्तर प्रदेश के विधानसभा उपचुनाव परिणाम: गठबंधन से लड़ने-लड़ाने की चुनौती

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के ठीक एक दिन पहले उत्तर प्रदेश की दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम भी घोषित हुए. इसके पहले उत्तर प्रदेश में पंचायत के चुनाव हुए, जिसे विधानसभा चुनाव के पहले का रिहर्सल मानकर पूरे उत्साह से लड़ा गया. पंचायत चुनावों के परिणामों को लेकर हो रही खींचतान और दावे-प्रतिदावे 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव के ट्रेलर के बतौर देखे जा रहे हैं.

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कहीं दरक न जाए एनडीए की जमीन

नीतीश सरकार की उपलब्धियां गिनाकर वोट पाने की चाहत रखने वाले प्रत्याशियों को इस बार झटका लग सकता है. वजह, जीत के बाद उन्होंने आम जनता से सरोकार रखना भी मुनासिब नहीं समझा, शिलान्यास और उद्घाटन करके मीडिया के सामने बड़ी-बड़ी बातें ज़रूर कीं. एक बार फिर लगभग वही प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं.

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किसी भी कीमत पर इन्‍हें वोट मत दीजिए

बिहार के चुनावों में अपराधियों का बोलबाला नज़र आ रहा है. राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं. जिन लोगों ने पांच सालों तक पार्टी के लिए खून-पसीना बहाया, उन्हें दरकिनार करके बिहार में राजनीतिक दलों ने बाहुबलियों को टिकट दिया है. राजनीतिक दलों की दलील बस यह है कि उनके जीतने की संभावनाएं ज़्यादा हैं.

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चुनावी तड़काः बैठे बैठाए मिलेंगे वोट

पुरानी कहावत है कि दो के झगड़े में तीसरे को फायदा मिल जाता है. सुशीला देवी को लोजपा टिकट मिलने से उनसे ख़फा कुछ नेताओं ने इ.धर्मेंद्र को मदद करने का ऐलान कर दिया है. राजद नेता प्रफुल्ल चंद्रघोष ने बग़ावती तेवर अपनाते हुए धर्मेंद्र के पक्ष में वोटरों की गोलबंदी शुरू कर दी है.

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अल्‍पसंख्‍यक मतदाताः वोट दे कर भी चोट खाते हैं हर बार

बिहार विधान सभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. साथ ही सामान्य मतों की छीना-झपटी के लिए आम मतदाताओं को बहलाने, फुसलाने की होड़ भी मची हुई है. सभी दल एक दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए परेशान हैं. इन दलों के निशाने पर सबसे अधिक मुस्लिम मतदाता हैं.

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कोसी- सीमांचल में पहले चरण का चुनावः तय होगा नई सरकार का चेहरा

कोसी एवं सीमांचल में 47 सीटों के लिए होने वाला पहले चरण का चुनाव पिछले पांच सालों में इस इलाक़े में हुए सारे राजनीतिक-सामाजिक प्रयोगों के परिणामों से पर्दा उठा देगा. यहां 21 अक्टूबर को होने वाला मतदान यह भी तय कर देगा कि सूबे में बनने वाली अगली सरकार का चेहरा कैसा होगा. जद-यू एवं भाजपा दोनों ही दल यहां अपनी पुरानी हैसियत बरकरार रखने की लड़ाई लड़ेंगे तो राजद-लोजपा के सामने अपने पुराने आधार वोट बैंक को वापस लाने की चुनौती होगी.

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