जब दिल ही टूट गया

सत्तर और अस्सी के दशक में ग्लैमर का पर्याय मानी जाने वाली अभिनेत्री ज़ीनत अमान इन दिनों अपनी शादी को

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अपनी माटी से जुड़ते बिहारी कारोबारी

कुछ साल पहले देश में यह धारणा बन चुकी थी कि बिहार में उद्योग-धंधे लगाना किसी भी क़ीमत पर संभव नहीं है. ऐसा मानने वालों का तर्क था कि राज्य में कोई औद्योगिक माहौल ही नहीं है, क्योंकि वहां बुनियादी सुविधाओं से लेकर आधारभूत संरचनाओं की घोर कमी है.

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वर्ग युद्ध

मध्यम वर्ग का या उत्पादन करने वाला कोई भी व्यवसायी जिस तरह से अपने जीवन निर्वाह के लिए अपना माल बेचना आवश्यक समझता है, उसी तरह एक मज़दूर भी अपना माल-असबाब बेचे बिना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता. उसका माल-असबाब उसका श्रम ही है. उसकी जितनी ज़्यादा क़ीमत मिल सके, उतना ही उसके लिए अच्छा है, जितनी कम मिले, उतना ही बुरा है.

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महाराष्‍ट्रः चंदे के फंदे में मंत्री

पावर और पैसा आज हर महत्वाकांक्षी व्यक्ति की चाहत है. जिसके पास पावर है, उसके पास पैसे वाले स्वयं चले आते हैं. व्यवसायी, ठेकेदार एवं उद्योगपति पावर के चारों ओर सौर मंडल के ग्रहों की तरह चक्कर लगाते नज़र आते हैं. उनकी निकटता पाकर मंत्री-संतरी भी उनसे अपना उल्लू सीधा करने में गुरेज़ नहीं करते.

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अप्रवासी मजदूर बदहाली के शिकार

असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे सैकड़ों अप्रवासी मज़दूरों की जान-माल की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने के लिए कोई भी तैयार नहीं है. कटनी ज़िले में विभिन्न उद्योगों से जुड़े देश भर के हज़ारों मज़दूर केवल नियोक्ता के रहमोंकरम पर आश्रित हैं. ज़िला प्रशासन या किसी अन्य संस्था द्वारा इन मज़दूरों को सुरक्षा या संरक्षण देने के लिए कोई नियमावली नहीं बनाई गई है.

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