अंतर्द्वंद्व की सहज अभिव्यक्ति

कोमलता की पहली अनुगूंज किसी ने सुनी थी जो निरंतर अमरबेल की तरह फैलती रही. समाज, व्यवस्था, संस्कृति, परंपरा, स्नेह,

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हक़ से मांगें पंचायत के ख़र्च का हिसाब

गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायत राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत

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समस्या और उसका निराकरण

राजनीतिक पार्टियों में अच्छे लोग नहीं हैं, यह बात नहीं है, पर सवाल अच्छे लोगों का नहीं, बल्कि नीतियों एवं

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हमें तीसरे विकल्प की ज़रूरत है

बहुत समय के बाद प्रधानमंत्री ने एक राजनीतिक बयान दिया है. हालांकि, इस तरह के बयान के लिए संसद एक

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एक आंदोलन- ताकि यमुना कैदमुक्त हो

1990 में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण अब अपना असर दिखा रहा है. ख़ुशहाली से भरे सपनों का गुब्बारा फटने लगा

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क्या करें ऐसे प्रधानमंत्री का?

एक फिल्म आई थी, जिसका एक बहुत मशहूर संवाद था, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़. दरअसल,

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अमीर लोगों से ज्यादा टैक्स लेना ज़रूरी

वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए,

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आयकर का तरीक़ा ग़लत है

राजा को कर कैसे लगाना चाहिए. प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कहा गया है कि जिस तरह मधुमक्खी फूलों से रस

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गांव की आज की व्यवस्था एवं उपाय योजना

गांव में किए जा सकने वाले काम ग्रामसभा करे, ऐसा संविधान स्वराज्य के बाद बनाया जाना चाहिए था. दरअसल जो

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पटना गांधी मैदान से शुरू होगी परिवर्तन की लड़ाई

भारतीय लोकतंत्र के लिए आने वाला समय काफी महत्वपूर्ण है. लोगों का इस व्यवस्था से भरोसा उठने और उसके नतीजे के तौर पर जनता के सड़क पर उतरने की घटनाएं लगातार जारी हैं. दामिनी वाली घटना में जिस तरह से युवा लगातार दिल्ली और देश के बाक़ी हिस्सों में आंदोलन कर रहे हैं, इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है.

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प्रजातंत्र बना लाठीतंत्र

एक बार लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारी पूर्वांचल के अलग-अलग शहरों से लखनऊ पहुंचे थे, उनकी संख्या क़रीब 1500 रही होगी, उनमें किसान, मज़दूर एवं छात्रनेता भी थे, जो अपने भाषणों में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे. वे सब अपने भाषणों में सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे थे. उस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी नेता चंद्रशेखर कर रहे थे.

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प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

सेवा में,

श्रीमान् डॉ. मनमोहन सिंह जी,

प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली.

विषय : गैंगरेप-मानवता को कलंकित करने वाली शर्मनाक घटना घटी और देश की जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया. ऐसे हालात में आम जनता का क्या दोष है?

महोदय,

गैंगरेप की घटना से देशवासियों की गर्दन शर्म से झुक गई.

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राजनीतिक दलों का रवैया गुस्सा दिलाता है

महाभारत शायद आज की सबसे बड़ी वास्तविकता है. इस महाभारत की तैयारी अलग-अलग स्थलों पर अलग तरह से होती है और लड़ाई भी अलग से लड़ी जाती है, लेकिन 2013 और 2014 का महाभारत कैसे लड़ा जाएगा, इसका अंदाज़ा कुछ-कुछ लगाया जा सकता है, क्योंकि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं या जो सत्ता के आसपास के लोग हैं, वे धीरे-धीरे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे किन हथियारों से लड़ना चाहते हैं.

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न थकेंगे, न झुकेंगे

आखिर अन्ना हज़ारे क्या हैं, मानवीय शुचिता के एक प्रतीक, बदलाव लाने वाले एक आंदोलनकारी या भारतीय राजनीति से हताश लोगों की जनाकांक्षा? शायद अन्ना यह सब कुछ हैं. तभी तो इस देश के किसी भी हिस्से में अन्ना चले जाएं, लोग उन्हें देखने-सुनने दौड़े चले आते हैं? उनकी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर कई राजनेताओं को रश्क होता होगा.

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते तो शायद ज़्यादा अच्छा रहता. इस प्रेस कांफ्रेंस के दो मुख्य बिंदु रहे. पहला यह कि जब अदालत में केस चल रहा है तो संपादकों को क्यों गिरफ्तार किया गया और दूसरा यह कि पुलिस ने धारा 385 क्यों लगाई, उसे 384 लगानी चाहिए थी. नवीन जिंदल देश के उन 500 लोगों में आते हैं, जिनके लिए सरकार, विपक्षी दल और पूरी संसद काम कर रही है.

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भविष्य के भ्रष्टाचारियों के कुतर्क

बहुत चीजें पहली बार हो रही हैं. पूरा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. पहले भ्रष्टाचार का नाम लेते थे, तो लोग अपने आगे भ्रष्टाचारी का तमगा लगते देख भयभीत होते हुए दिखाई देते थे, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी बोलता है, उसे अजूबे की तरह देखा जाता है. राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए लोग चाहते हैं कि यह आवाज़ या इस तरह की आवाज़ें न निकलें और जो निकालते भी हैं, उनके असफल होने की कामना राजनीतिक दल करते हैं और राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इसका उपाय बताते हैं कि भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोग कैसे असफल होंगे.

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किसानों पर गोलियां चलाने से हल नहीं निकलेगा

भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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संसद ने सर्वोच्च होने का अधिकार खो दिया है

भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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निगाहें भ्रष्‍टाचार पर, निशाना 2014

अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के बाक़ी सदस्य जब जुलाई 2012 के अनशन के लिए मांगों की लिस्ट तैयार कर रहे होंगे, तब उन्हें भी यह अहसास रहा होगा कि वे असल में क्या मांग रहे हैं? 15 दाग़ी मंत्रियों (टीम अन्ना के अनुसार), 160 से ज़्यादा दाग़ी सांसदों और कई पार्टी अध्यक्षों के खिला़फ जांच और कार्रवाई की मांग, अब ये मांगें मानी जाएंगी, उस पर कितना अमल हो पाएगा, इन सवालों के जवाब ढूंढने की बजाय इस बात का विश्लेषण होना चाहिए कि अगर ये मांगें नहीं मानी जाती हैं तब टीम अन्ना का क्या होगा, तब टीम अन्ना क्या करेगी?

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पंसारी पंचायत : जिसने लोगों की ज़िंदगी बदल दी

गांव के विकास में पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि पंचायतें अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीक़े से नहीं करती हैं, जिसके कारण लोगों के मन में यह धारणा घर कर गई है कि पंचायत के स्तर पर कुछ नहीं किया जा सकता है.

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शेयर बाज़ार का जुआ

अब मान लीजिए कि आप थोड़े-बहुत जुआरी भी हैं. आप जुए से अत्यंत नफरत करते हों तो भी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के ढांचे को समझने के लिए जुए की जानकारी भी आवश्यक है. शेयर बाज़ार में व्यापार के अलावा एक विशेष खेल खेला जाता है, जिसे सट्टा कहते हैं. इसमें खयाली शेयरों की खयाली क़ीमतें दी-ली जाती हैं.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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साक्षात्‍कारः बड़े ढांचे में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का चलना मुश्किल

83 वर्षीय सच्चिदानंद सिन्हा एक समाजवादी कार्यकर्ता, चिंतक एवं लेखक हैं. उस दौर में जब समाजवादी विचारधारा महानगरों एवं चर्चाओं तक सीमित रह गई हो, तब सच्चिदानंद बाबू की न स़िर्फ लेखनी, बल्कि उनकी जीवनशैली भी समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करती नज़र आती है.

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सौ समस्याओं का एक समाधान : आरटीआई आवेदन

रिश्वत देना जहां एक ओर आम आदमी की मजबूरी बन गया है, वहीं कुछ लोगों के लिए यह अपना काम जल्दी और ग़लत तरीक़े से निकलवाने का ज़रिया भी बन गया है, लेकिन इन दोनों स्थितियों में एक फर्क़ है. एक ओर 2-जी स्पेक्ट्रम के लिए रिश्वत दी जाती है, तो दूसरी ओर एक आम और बेबस आदमी को राशन कार्ड बनवाने सरकारी पेंशन, दवा एवं इंदिरा आवास पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है.

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बजट- 2012 देश पर गंभीर आर्थिक संकट

सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.

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