गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायत राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. दरअसल, इसी के तहत आगे चलकर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई. ज़िला स्तर पर ज़िला परिषद, [...]
Tags: अधिकार, अधिकारी, आवेदन, इंदिरा आवास योजना, क़ानून, कार्य, केंद्र, गांधी जी, ग्राम सभा, घोटाले, देश, नागरिक, पंचायत, भ्रष्टाचार, राज्य सरकार, लोग, विकास, व्यवस्था, सूचना, हिसाब Posted in समाज by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
राजनीतिक पार्टियों में अच्छे लोग नहीं हैं, यह बात नहीं है, पर सवाल अच्छे लोगों का नहीं, बल्कि नीतियों एवं योजनाओं का है. भले और अच्छे लोग भी अगर पुरानी नीतियों और पुराने ढांचे पर ही निर्भर करते रहें, तो वे कारगर साबित नहीं हो सकेंगे. जब तक ये नीतियां एवं योजनाएं और इनके परिणामस्वरूप [...]
Tags: अंग्रेजों, आंदोलन, गांधी जी, गांव, ग्राम-प्रमुख, ग्राम-सेवक, ग्रामसभा, जयप्रकाश जी, निराकरण, नीतियों एवं योजना, प्रशासन, भारत, भाषणों, मतदाताओं, महाराष्ट्र, मुखिया, योजनाओं, राजनीतिक पार्टियों, लोकसभा. विधानसभा, लोग, व्यवस्था, व्यवस्था एवं परिस्थिति, व्यापक, शासन, सत्ता, समस्या, सरपंच, स्वराज्य, स्वराज्य काल Posted in राजनीति by Author: ठाकुर दास बंग | No Comments » | Read More... |
बहुत समय के बाद प्रधानमंत्री ने एक राजनीतिक बयान दिया है. हालांकि, इस तरह के बयान के लिए संसद एक सही फोरम नहीं था. उन्होंने कहा कि भाजपा 2004 और 2009 की तरह इस बार भी सत्ता में नहीं आ सकेगी और कांग्रेस एक बार फिर से 2014 में सत्ता में वापस आ जाएगी. उनकी [...]
Tags: अल्पसंख्यकों, आज़ादी, उत्तर भारत, कांग्रेस, क्रांतिकारी, ग़रीबों, घपलों-घोटालों, दक्षिण भारत, दल, दलितों, देश, नरेंद्र मोदी, पूर्वोत्तर भारत, पॉलिसी, प्रधानमंत्री जी, फ्रेमवर्क, बयान, भूमिहीनों, भ्रष्टाचार, राजनीति, राजनीतिक, वर्णित राज्य, विकास, व्यवस्था, शासन, संविधान, समस्याओं, सरकार, सांप्रदायिकता Posted in राजनीति, स्टोरी-6 by Author: कमल मोरारका | No Comments » | Read More... |
1990 में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण अब अपना असर दिखा रहा है. ख़ुशहाली से भरे सपनों का गुब्बारा फटने लगा है. व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश और व्यवस्था के प्रति नाराज़गी बढ़ती ही जा रही है. देश भर में हज़ारों आंदोलन चल रहे हैं और सभी आंदोलनों का मूल मुद्दा एक ही है, जल, जंगल और [...]
Tags: आंदोलन, आर्थिक उदारीकरण, उत्तर प्रदेश, किसान, कैदमुक्त, जंगल, जल, जवान, ज़मीन, दिल्ली, दिल्ली-मथुरा, देश, बच्चे, बुजुर्ग, ब्रजवासियों, भक्तों, महिलाएं, यमुना, यमुना रक्षक दल, रमेश बाबा, राजमार्ग, व्यवस्था, साधु-संत, सामाजिक, स्वच्छ जल, हथिनी कुंड, हरियाणा Posted in Crousel2, आंदोलन, कवर स्टोरी-2, राजनीति by Author: शशि शेखर | No Comments » | Read More... |
एक फिल्म आई थी, जिसका एक बहुत मशहूर संवाद था, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़. दरअसल, यह वाक्य हमारी न्याय-व्यवस्था की उस कमज़ोरी को दर्शाता है, जिसमें न्याय पाने की चाह लिए पीढ़ियां गुज़र जाती हैं. लेकिन फिर भी न्याय नहीं मिलता. सच तो यह है कि आज देश के जो [...]
Tags: अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, अमेरिका, अर्थशास्त्री, खेती, ग़रीब, ग़रीबी, घोटाला, चंद्रशेखर, देश, नरसिम्हा राव, नौजवानों, न्याय-व्यवस्था, प्रधानमंत्री, बिजली, भविष्य, भाषण, भ्रष्टाचार, मनमोहन सिंह, राजीव गांधी, विदेशी बैंकों, वीपी सिंह, व्यवस्था, सामाजिक परिवर्तन, हिंदुस्तान Posted in जब तोप मुकाबिल हो by Author: संतोष भारतीय | 1 Comment » | Read More... |
वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है. पश्चिमी देशों में वार्षिक बजट अकाउंट के स्टेटमेंट के अलावा कुछ नहीं होता है. भारत में, विशेषकर 1991 के पहले बजट का एक औचित्य होता [...]
Tags: अमीर लोगों, अर्थव्यवस्था, आयकर, कारपोरेट टैक्स, किरोसीन, गरीब लोगों, घोषणा, ज्यादा टैक्स, पेट्रोल और डीजल, बजट, बहुप्रतिक्षित, बीमा, भारत, रिटर्न टैक्स, रेल मंत्री, वित्त मंत्री, विपक्षी दल, वेतनभोगी, व्यक्ति, व्यवस्था, व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य, सरकार Posted in आर्थिक, कवर स्टोरी-2 by Author: कमल मोरारका | No Comments » | Read More... |
राजा को कर कैसे लगाना चाहिए. प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कहा गया है कि जिस तरह मधुमक्खी फूलों से रस लेती है, लेकिन उन फूलों को कोई नुकसान नहीं होता और मधु भी इकट्ठा हो जाता है, उसी तरह राजा से प्रजा को कर लेना चाहिए, ताकि करदाता भी खुश रहें और राज्य को भी [...]
Tags: आयकर, एजेंसियों, कर्मचारियों, ग़लत, देश, नुकसान, नौकरी, मधुमक्खी, राजनीतिक दल, राजस्व, राजा, वित्त मंत्री, वोट बैंक, व्यवस्था, सरकार Posted in राजनीति by Author: राजीव कुमार | No Comments » | Read More... |
गांव में किए जा सकने वाले काम ग्रामसभा करे, ऐसा संविधान स्वराज्य के बाद बनाया जाना चाहिए था. दरअसल जो काम ग्राम-स्तर पर नहीं हो सकता है, वह अवश्य ही शासन की ऊपर की इकाइयां करें. लेकिन ऊपर भी गांव के मतदाताओं का अंकुश होना चाहिए. बचे हुए सारे विषयों की सत्ता और इन कार्यकलापों [...]
Tags: आर्थिक स्रोत, उड़ीसा, ग्राम पंचायतों, ग्राम भावना, ग्रामसभा, चुनाव, जनसंख्या, ज़िंदगी, पंचायत क़ानून, पुस्तक-गांव, प्रशासन, मतदाताओं, राज्य सरकार, व्यवस्था, संविधान, सत्ता-शासन, समाज, स्वराज्य Posted in राज्य, समाज by Author: ठाकुर दास बंग | No Comments » | Read More... |
भारतीय लोकतंत्र के लिए आने वाला समय काफी महत्वपूर्ण है. लोगों का इस व्यवस्था से भरोसा उठने और उसके नतीजे के तौर पर जनता के सड़क पर उतरने की घटनाएं लगातार जारी हैं. दामिनी वाली घटना में जिस तरह से युवा लगातार दिल्ली और देश के बाक़ी हिस्सों में आंदोलन कर रहे हैं, इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है.
Tags: Anna Hazare, Bihar, Corruption, Damini, Delhi, Gandhi Maidan, General VK Singh, Jan Lokpal, Movement, Patna, Rally, people, systems, अन्ना हजारे, आंदोलन, गांधी मैदान, जन लोकपाल, जनता, जनरल वी के सिंह, दामिनी, दिल्ली, पटना, बिहार, भ्रष्टाचार, रैली, व्यवस्था Posted in आंदोलन, कवर स्टोरी-2, कानून और व्यवस्था, राजनीति, राज्य, विधि-न्याय, समाज by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | 2 Comments » | Read More... |
|
व्यवस्था संविधान को धोखा देकर बनी है |
|