बजट- 2012 देश पर गंभीर आर्थिक संकट

सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.

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अपनी पंचायत का लेखा-जोखा मांगें

स्वराज, लोक स्वराज या गांधी का हिंद स्वराज आख़िर क्या है? गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायती राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. आगे चलकर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई.

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पंचायती राज व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत

देश की बदक़िस्मती कहिए या व्यवस्था की खामी कि किसी भी उद्देश्य को हासिल करने से पहले ही उसमें भ्रष्टाचार के घुन पनपने लगते हैं. चाहे वह खेल के आयोजन का मामला हो, स्वास्थ्य, सीमा की रक्षा करने वाले सैनिकों या गोदामों में अनाज सड़ने का मसला हो, कोई विभाग या क्षेत्र नहीं बचा है, जहां भ्रष्टाचार हावी न हो.

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दिल्‍ली का बाबूः सीआईसी में पारदर्शिता बढ़ी

केंद्रीय सूचना आयोग के पास बहुत सारे मामले लंबित पड़े हुए हैं, इसलिए उसे आलोचना सहनी पड़ती है. आलोचनाओं से बचने के लिए सूचना आयोग ने अपने काम में पहले से अधिक पारदर्शिता लाने की कोशिश की है.

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विजय माल्या और सियासत का गठजोड़ : आसमान में घोटाला

यह भारतीय लोकतंत्र का बाज़ारू चेहरा है, जो कॉर्पोरेट्स के हितों के मुताबिक़ फैसले लेता है. जहां लोकतंत्र के पहरुवे, भूख से मरते किसानों के लिए रोटी का इंतज़ाम करने का अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं करते, लेकिन उद्योग जगत के महारथियों के क़दमों में लाल क़ालीन बनकर बिछ जाना अपनी शान समझते हैं.

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दिल्‍ली का बाबूः अतिरिक्त प्रभार और बाबू

प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के कारण बहुत से विभागों में सचिव स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है. सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे से लौटकर आने के बाद भी कई महत्वपूर्ण विभाग और मंत्रालय में सचिव स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति नहीं हो पाई है और इनके लिए अस्थाई व्यवस्था की गई है. सरकार ने केमिकल और पेट्रोकेमिकल विभाग के प्रमुख के. जोसे को तीन महीने के लिए फर्मास्युटिकल विभाग का अतिरिक्त प्रभार दे दिया है.

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फालतू धन की माया

ज़मीन या मकान ही ऐसी निजी संपत्ति नहीं थी जिसकी आय पर आदमी बिना कुछ करे घर बैठे खाता-पीता रहे. किराये के धन से भी कहीं ज़्यादा जो फालतू धन लोगों के पास पड़ा है, उसका किराया पूंजीवादियों की दूसरी निजी संपत्ति है. फालतू धन के किराये को हम ब्याज़ के नाम से पुकारते हैं.

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लोकतंत्र राजनेताओं के बिना नहीं चल सकता

किसी भी देश को चलाने के लिए लोकतंत्र सबसे अच्छी शासन प्रणाली है. यह सही है कि इस प्रणाली में भी कई ख़ामियां हैं, लेकिन यह सभी देशों में अलग-अलग तरह से उजागर होती है. दुर्भाग्यवश पिछले साठ सालों में हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का जितना विकास होना चाहिए था, उतना हुआ नहीं, बल्कि इसकी ख़ामियां ही ज़्यादा उजागर हुई हैं.

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करों द्वारा प्राप्त सरकारी आय

बाज़ार से ली गई खाद्यादि सामग्रियों के सिवाय आप बहुत सा और दैनिक ख़र्च भी करते हैं. टेलीफोन का किराया, बिजली का चार्ज, पानी का चार्ज इत्यादि आप देते हैं. मकान भाड़े में नगरपालिका के कर आपको देने पड़ते हैं.

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तेलंगाना : राज्य के नाम पर सियासत

नए राज्य बनाने के लिए देश में अब तक कई आंदोलन हो चुके हैं. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इससे स्थानीय लोगों का विकास होगा और कानून व्यवस्था में सुधार भी. कभी सांस्कृतिक एकता की बात की जाती है तो कभी भाषाई एकता की.

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उत्तराखंड: बालकृष्ण की जालसाज़ी का भन्डाफोड़

बाबा रामदेव एंड कंपनी की जालसाज़ी का खुलासा होने से जनता में यह संदेश जा रहा है कि काले धन की वापसी और व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाले पतंजलि पीठ के खेवनहार रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण खुद एक बड़े जालसाज़ हैं.

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दिल्ली बम विस्फोट: ग़लती किसी की सज़ा किसी को

मरने वाला अकेला नहीं मरता. उसके साथ मरती हैं कई और ज़िंदगियां. ताउम्र, तिल-तिलकर. दिल्ली बम धमाके में जिन 13 लोगों की मौत हुई, उनके परिवार वालों की आंखों से निकलते आंसू देखकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाए. पीएम से लेकर भविष्य में होने वाले पीएम तक अस्पताल पहुंचे

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शेहला मसूद: सूचना का एक और सिपाही शहीद

भ्रष्टाचार की भंडाफोड़ कोशिशें जानलेवा साबित हो रही हैं. भोपाल की आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद की हत्या से पूरे देश में सूचना के अधिकार के तहत जानकारियां लेने का जोख़िम उठा रहे कार्यकर्ता हैरान हैं.

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उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है

एक कहावत है, प्याज़ भी खाया और जूते भी खाए. ज़्यादातर लोग इस कहावत को जानते तो हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि इसके पीछे की कहानी क्या है. एक बार किसी अपराधी को बादशाह के सामने पेश किया गया. बादशाह ने सज़ा सुनाई कि ग़लती करने वाला या तो सौ प्याज़ खाए या सौ जूते. सज़ा चुनने का अवसर उसने ग़लती करने वाले को दिया.

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लापरवाही, मनमानी और भ्रष्‍टाचार का गढ़

साढ़े पांच दशक पूर्व कई लोक कल्याणकारी उद्देश्यों को लेकर स्थापित किया गया भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) आज लापरवाही, मनमानी

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नव उदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्‍टाचार

एक दशक पहले यह खतरा पहचान में आने लगा था कि अगर नव उदारवादी नीतियों के मुक़ाबले में खड़े होने वाले जनांदोलनों का राजनीतिकरण और समन्वयीकरण नहीं हुआ तो नव उदारवाद के दलाल, चाहे वे नेता हों, नौकरशाह हों, बुद्धिजीवी हों, एनजीओबाज हों, धर्मगुरु हों, कलाकार हों या खिलाड़ी, विरोध के सारे प्रयास नाकाम कर देंगे. वही हो रहा है.

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सामाजिक विशमता मानव नस्ल का

आप पूछ सकते हैं कि भाई, जिन आदमियों के पास खाने को पर्याप्त रोटी नहीं है, पहनने के लिए कपड़ा नहीं है, उन सबको समान बंटवारा कर देने से क्या सब ठीक हो जाएगा? क्या आप मानते हैं कि वे उस प्राप्त धन का दुरुपयोग नहीं करेंगे? क्या उन्हें प्राथमिकता का ज्ञान या ध्यान रहेगा? वे लोग मिली हुई धनराशि जुए या अन्य किसी दुर्व्यसन में खर्च करके फिर उसी तरह रोटी-कप़डे के मोहताज नहीं बन जाएंगे?

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पाकिस्तान में स्थानीय निकायों की बदहाली

विकेंद्रीकरण संघीय व्यवस्था को एक मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन पाकिस्तान में तो विकेंद्रीरण कहीं दिखता ही नहीं है. सवाल यह है कि क्या राज्य सभी शक्तियां अपने पास रखने का अधिकारी है और वह स्थानीय निकायों को कोई भी अधिकार देना अस्वीकार कर सकता है? 18वें संविधान संशोधन के अनुसार, अनुच्छेद 270-एए का क्लॉज-1 लोकल गवर्नमेंट ऑर्डिनेंस 2001 को निरस्त करता है.

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सरकार चुप क्यों है

26 नवंबर, 2008 की त्रासदी को मुंबई के लोग अभी भूल भी नहीं पाए थे कि 13 जुलाई, 2011 को फिर से दिल दहला देने वाली घटना घट गई. महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए कौन वहां की क़ानून व्यवस्था की स्थिति की आलोचना कर सकता है. बिना किसी सरकारी सहायता के मुंबई वालों को इस विपत्ति से उबरने में अपनी चिरपरिचित योग्यता का परिचय देना पड़ेगा.

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राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रयास की जरुरत

ऐसा कहा जाता है कि भारत के पास राष्ट्रीय सुरक्षा का सिद्धांत नहीं है और यहां रणनीतिक दुविधाग्रस्तता की स्थिति बनी रहती है. सुरक्षा विशेषज्ञ जॉर्ज तनहाम ने भी ऐसा अनुभव किया है कि भारत के पास रणनीतिक सोच की संस्कृति का अभाव है. के सुब्रमण्यम के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड द्वारा इस तरफ संकेत करने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीरता से सोचा जाने लगा है.

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सरकारी और निजी स्कूलों से हिसाब मांगे

सूचना का अधिकार क़ानून को लागू हुए क़रीब छह साल होने को हैं. इन छह सालों में इस क़ानून ने आम आदमी को पिछले साठ साल की मजबूरी से मुक्ति दिलाने का काम किया. इस क़ानून ने आम आदमी को सत्ता में बैठे ताक़तवर लोगों से सवाल पूछने की ताक़त दी. व्यवस्था में लगी दशकों पुरानी ज़ंग को छुड़ाने में मदद की.

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राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के मायने

राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल आजकल आम तौर पर किया जाता है. प्राय: यह शत्रु देश के आक्रमण से सुरक्षा से संबंधित होता है अथवा उन हथियारबंद आतंकवादियों से सुरक्षा से, जो राष्ट्र के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं या राष्ट्रीय एकता-अखंडता को नुक़सान पहुंचाते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिप्राय केवल इसी से नहीं है, बल्कि इसे और अधिक वृहद अर्थों में समझने की आवश्यकता है.

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आपकी समस्याएं और सुझाव

आपके पत्र हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. इस अंक में हम उन पाठकों के पत्र शामिल कर रहे हैं, जिन्होंने बताया है कि आरटीआई के इस्तेमाल में उन्हें किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है और सूचना अधिकार क़ानून को लेकर उनके अनुभव क्या हैं. इसके अलावा इस अंक में मनरेगा योजना और जॉब कार्ड से संबंधित एक आवेदन भी प्रकाशित किया जा रहा है, ताकि आप इसका इस्तेमाल समाज के ग़रीब तबक़े के हित में करके भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारने की एक कोशिश कर सकें.

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अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के लिए छात्रवृति योजना : मदद के नाम पर धोखा

भारत में मूल शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया गया, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि हमारे देश में क़ानून तो बना दिए जाते हैं, पर उन्हें ठीक से लागू नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप क़ानून होते हुए भी आम नागरिक उससे कोई फ़ायदा नहीं ले पाते. शिक्षा का भी कुछ यही हाल है.

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विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी है

वेन जियाबाओ पिछले दिनों लंदन गएऔर वहां उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इस बात के लिए फटकारा कि उन्हें अपने अतिथि के सामने मानवाधिकार पर भाषण नहीं देना चाहिए, लेकिन तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पास जियाबाओ की बात सुनने के अलावा कोई विशेष चारा नहीं था, क्योंकि वह चीन से व्यापार और निवेश को इच्छुक थे.

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भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

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‘सांस्‍कृतिक क्रांति’ पर बवाल

चौथी दुनिया के अपने इसी स्तंभ में कुछ दिनों पहले मैंने बिहार सरकार के कला और संस्कृति मंत्रालय की कॉफी टेबल बुक-बिहार विहार के बहाने सूबे में सांस्कृतिक संगठनों की सक्रियता, उसमें आ रहे बदलाव और सरकारी स्तर पर उसके प्रयासों की चर्चा की थी.

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सांसद निधि: कहां और कितना खर्च हुआ

विकास कार्य के लिए आपके स्थानीय सांसद को हर साल करोड़ों रुपये मिलते हैं. इसे सांसद स्थानीय विकास फंड कहा जाता है. इस फंड से आपके क्षेत्र में विभिन्न विकास कार्य किए जाने की व्यवस्था होती है. लेकिन क्या कभी आपने अपने लोकसभा क्षेत्र में सांसद निधि से हुए विकास कार्यों के बारे में जानने की कोशिश की?

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नागपुरः मरीज का शोषण अस्‍पताल का पोषण

देश के विकसित राज्यों में एक महाराष्ट्र में उन तमाम बड़े अस्पतालों की हालत ख़राब है, जो दावा करते हैं कि उनके यहां ग़रीबों के लिए इलाज की मुकम्मल व्यवस्था है, जबकि इसके उलट इन बड़े कारपोरेट अस्पतालों में ग़रीबों के लिए कोई जगह नहीं है. कमाल की बात तो यह है कि अस्पतालों को ज़मीन सरकार ने ही दी है.

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भाग्यशाली क़ैदी

बात बड़ी अजीब है, लेकिन सच है. दुनिया का सबसे उम्रदराज कैदी अपनी सज़ा पूरी किए बग़ैर रिहा कर दिया गया. गोरखपुर जेल में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे 108 वर्षीय बृजबिहारी की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए जेल प्रशासन ने उसे घर जाने की इजाज़त दे दी. बृजबिहारी पर महाराजगंज के जगन्नाथ मंदिर के महंत रामानुज दास की हत्या का आरोप है.

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