ज़बानी जमा-खर्च पर लड़े जा रहे चुनाव

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं. कहने को इन चुनावों में हर पार्टी ने अपना घोषणा-पत्र जारी

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परिवर्तन की शताब्दी

एक सौ दो साल पहले दिल्ली में ब्रिटिश शासक को ताज पहनाया गया था. उस समय ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्यास्त

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अमीर लोगों से ज्यादा टैक्स लेना ज़रूरी

वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए,

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शेयर बाज़ार का जुआ

अब मान लीजिए कि आप थोड़े-बहुत जुआरी भी हैं. आप जुए से अत्यंत नफरत करते हों तो भी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के ढांचे को समझने के लिए जुए की जानकारी भी आवश्यक है. शेयर बाज़ार में व्यापार के अलावा एक विशेष खेल खेला जाता है, जिसे सट्टा कहते हैं. इसमें खयाली शेयरों की खयाली क़ीमतें दी-ली जाती हैं.

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रुपयों से ख़रीदे गए रुपये

पूंजी बाज़ार वह जगह है, जहां साल भर की कमाई एकमुश्त रकम के बदले ख़रीदी या बेची जाती है. एक हज़ार रुपये में आप कितनी कमाई ख़रीद सकते हैं, यह भाव रोज़ाना बदलता रहता है. और किसी दिन एकमुश्त रकमें कम हैं तो ज़्यादा कमाई ख़रीद सकते हैं.

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कॉरपोरेट्स की सामाजिक ज़िम्मेदारी तय हो

यह आलेख कॉरपोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली द्वारा दिए गए एक भाषण और नए कंपनी बिल-2011 पर आधारित है. वीरप्पा मोइली ने बंगलुरु में हुए एक सम्मेलन, जिसका विषय था-भारत में कॉरपोरेट्‌स का भविष्य, में बोलते हुए नए कंपनी बिल-2011 और कॉरपोरेट्‌स की सामाजिक ज़िम्मेदारी यानी सीएसआर पर अपने विचार रखे थे.

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कंपनियों का अवतरण

ये मध्यम वर्ग के लोग जो शुरू-शुरू में छुटभैय्या, कारिंदों या मंत्रियों के रूप में सामने आए थे, धीरे-धीरे स्वयं व्यापार करने लगे. एक तऱफ पूंजीपतियों की पूंजी थी, दूसरी तऱफ मज़दूर की मेहनत थी. दोनों का उपयोग करते हुए या दोनों का ही शोषण करके इस वर्ग ने अपना अधिपत्य सारे व्यापार और उद्योग पर जमा लिया.

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क्या छत्तीसग़ढ में लोकतंत्र नहीं है

दिल्ली के उन नेताओं को धन्यवाद देना चाहिए, जो पत्रकारिता जगत का नेतृत्व करते हैं. इनके लिए सारा देश दिल्ली है. अगर दिल्ली में किसी अख़बार के साथ कुछ ग़लत हो तो इनके लिए बहुत बड़ा सवाल बन जाता है. अगर किसी पत्रकार के साथ कुछ हो तो और भी बड़ा सवाल बन जाता है.

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खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश : सरकार देश को गुमराह कर रही है

खुदरा व्यापार का मतलब है कि कोई दुकानदार किसी मंडी या थोक व्यापारी के माध्यम से माल या उत्पाद खरीदता है और फिर अंतिम उपभोक्ता को छोटी मात्रा में बेचता है. खुदरा व्यापार का मतलब है कि वैसे सामानों की खरीद-बिक्री, जिन्हें हम सीधे इस्तेमाल करते हैं.

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विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी है

वेन जियाबाओ पिछले दिनों लंदन गएऔर वहां उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इस बात के लिए फटकारा कि उन्हें अपने अतिथि के सामने मानवाधिकार पर भाषण नहीं देना चाहिए, लेकिन तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पास जियाबाओ की बात सुनने के अलावा कोई विशेष चारा नहीं था, क्योंकि वह चीन से व्यापार और निवेश को इच्छुक थे.

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जिसकी लाठी उसकी भैंस

तीसरी योजना है कि जिसके पास ताक़त हो, वह ले ले. जो संभाल सके, वह रखे. यदि यह कार्यान्वित हुई तो विश्व में कहीं भी शांति या सुरक्षा का नामोनिशान ही नहीं रहेगा. अगर सब ताक़त में या चालाकी में समान हों तो संघर्ष और भी भयानक होंगे, परिणामस्वरूप कोई कुछ भी हथिया न सकेगा. बालक-वृद्ध कम ताक़त वाले हैं, युवा व्यक्ति अधिक ताक़त वाले हैं.

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बाबा रामदेव जी, पहले इस देश को तो समझिए

हमने बाबा रामदेव से कई सवाल किए. हमें बाबा रामदेव से कोई शिकायत नहीं है. शिकायत इसलिए नहीं है कि देश में कोई भी आदमी कुछ भी व्यापार करने के लिए स्वतंत्र है, चाहे वह व्यापार कारों का हो, चाहे वह व्यापार मिठाई बनाने का हो, चाहे वह व्यापार योग सिखाने का हो या चाहे वह व्यापार दवाइयां बनाने का हो. बहुत सारे लोग व्यापार कर रहे हैं

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सीमांचलः देह के दलदल में फंसी मासूम जिंदगियां

एक ओर जहां पूरे देश में राष्ट्रीय बलिका दिवस मनाया जाता है, वहीं सीमांचल के चंद बे़खौ़फ दलालों द्वारा मासूम नाबालिक लड़कियों से अनैतिक ज़िस्मफरोशी जैसे धंधे करवाकर मानवता को कलंकित और शर्मसार किया जा रहा है.

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चीन से संबंध दोधारी तलवार

इस कॉरपोरेट युग में हमें भी राज, काज, समाज और आवाज़ को परिवर्तित करने की ज़रूरत है. बीते माह भारत आए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का जिस अंदाज़ में स्वागत हुआ, उन्होंने जो-जो कहा, सो-सो भारत ने मान लिया, लेकिन विकीलीक्स के खुलासे ने सारे किए-धरे पर पानी फेर दिया.

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भोपाल गैस पीड़ितों के दर्द का व्यापार

आज अर्जुन सिंह मीडिया के, राजनीतिक दलों के, ख़ुद उनके अपने दल कांग्रेस के निशाने पर हैं. दो दशक से ज़्यादा बीत गए, मीडिया को भोपाल गैस त्रासदी महज़ एक खानापूर्ति की तरह याद थी. दिसंबर की तीन तारीख़ को, दरअसल दो और तीन दिसंबर की रात साढ़े तीन बजे के बाद गैस रिसी थी, जिसने लगभग बीस हज़ार से ज़्यादा जानें ले लीं.

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बांस न मिलने से रोटी को तरसे बसोड़

मध्य प्रदेश के वन विभाग की अदूरदर्शिता के कारण राज्य के लाखों बसोड़ या वंसकार (बांस का सामान बनाने वाले) बेरोज़गारी की पीड़ा झेल रहे हैं. राज्य सरकार बांस व्यापार को बढ़ावा देने और वन विभाग की राजस्व आय बढ़ाने के लिए बांस का निर्यात कर रही है और बांस का सामान बनाने वाले कारखानों को बड़ी मात्रा में बांस बेच रही है,

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उत्तर भारत बांग्‍लादेशी दुल्‍हनों का बड़ा बाजार

मां तुम मुझे अब कभी नहीं देख सकोगी. मुझे भूल जाओ. सोच लो कि तुम्हारी बेटी नज़मा अब मर गई. मैं अपने बच्चों को नहीं छोड़ सकती और वे यहां आ नहीं सकते. वे तुम्हें कभी नानी नहीं कह पाएंगे. मेरी ज़िंदगी नर्क हो गई है, पर मैं कुछ नहीं कर सकती, उक्त उद्गार हैं उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में ब्याही तहमीना नामक दुल्हन के, जो सात साल पहले अपनी मां से मिलने बांग्लादेश लौटी थी.

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पश्चिम बंगाल बना दुल्‍हनों का बाजार

बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों में ओ पार यानी बांग्लादेश से लाई जाने वाली लड़कियां कटी पतंग की तरह होती हैं, जिन्हें लूटने के लिए कई हाथ एक साथ उठते हैं. इनमें होते हैं दलाल, पुलिस, स्थानीय नेता और पंचायत प्रतिनिधि. अवैध रूप से सीमा पार से आने वाली इन लड़कियों की मानसिक हालत बलि के लिए ले जाई जा रही गाय की तरह होती है.

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महिला-बाल व्‍यापार का बढ़ता जाल

बाज़ारवाद के इस युग में मनुष्य भी बिकाऊ माल बन गया है. बाज़ार में पुरूष की ज़रूरत श्रम के लिए है, तो वहीं स्त्री की ज़रूरत श्रम और सेक्स दोनों के लिए है. इसलिए व्यापारियों की नज़र में पुरूष की तुलना में स्त्री कहीं ज़्यादा क़ीमती और बिकाऊ है. राजधानी भोपाल की 66 बालिकाएं और 70 बालक ऐसे हैं जिनका पिछले एक साल से कोई अता-पता नहीं है.

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विंध्‍य हर्बल सफल सहकारी संस्‍था

सरकारी प्रयासों से जनकल्याण के काम बिना रुकावट पूरे होते रहें, यह लगभग असंभव बात मानी जाती है. पर जब आप मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के द्वारा बनाई गई विंध्य हर्बल संस्था के कामकाज को देखेंगे तो मानेंगे कि जनकल्याण के लिए सरकारी प्रयासों की कमी नहीं है. विंध्य हर्बल संस्था प्रदेश स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी आयुर्वेदिक औषधियों से संबंधित संग्रहण, उत्पादन, शोधन, दवा निर्माण एवं उसकी बिक्री का काम करती है.

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पाकिस्तान में आर्थिक सुधार के लिए राजनीतिक सुधार जरूरी

1980 के दशक के अंत से ही पाकिस्तान में उदारीकरण की नीति तेज़ी से लागू की जाने लगी. निर्यात पर लगे टैक्स को कम किया गया और व्यापार पर लगे प्रतिबंधों को बिना देर किए वापस ले लिया गया.

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