अक्षय ने पेश की मिसाल, सुकमा के शहीदों को दिए 1 करोड़ 8 लाख

नई दिल्ली, (राज लक्ष्मी मल्ल) : बॉलीवुड के खिलाड़ी कुमार कहे जाने वाले अक्षय कुमार के देश प्रेम जग जाहिर

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दिलीप कुमार : एक महानायक की गाथा

फिल्म मेला, शहीद, अंदाज, आन, देवदास, नया दौर, मधुमती, यहूदी, पैगाम, मुगल-ए-आ़जम, गंगा-जमुना, लीडर तथा राम और श्याम जैसी फिल्मों

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जहां डाल-डाल पर सोने की चिडि़या करती है बसेरा

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी… यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है.

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लेफ्टिनेंट की कुर्बानी बेकार गई

बीते 20 अगस्त को गुरेज सेक्टर में भारतीय सेना का एक युवा लेफ्टिनेंट आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गया. शहीद लेफ्टिनेंट 15 मराठा एलआई बटालियन से जुड़ा था. इस युवा सेना अधिकारी की शहादत ने देश के समक्ष हमारे सैनिकों के गौरवशाली इतिहास को एक बार फिर ताज़ा कर दिया है. गुरेज सेक्टर में शहीद हुए इस लेफ्टिनेंट ने अकेले ही 12 दहशतगर्दों को मार गिराया और अंत में खुद भी शहीद हो गया.

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डुमरांवः शहीदों के परिजन चाय बेच रहे हैं

आज़ाद हिंदुस्तान का ख्वाब लिए हज़ारों क्रांतिकारी सपूत आज़ादी की जंग में खुशी-खुशी शहीद हो गए. इन्हीं में शामिल हैं डुमरांव के चार ऐसे शहीद, जिन्होंने गोरों की गोलियां खाकर अपने खून से आजादी की नई इबारत लिखी. इनकी शहादत पर यहां के लोगों को गर्व है, लेकिन दुभार्र्ग्य यह है कि आज़ाद देश की सरकार इन शहीदों की कुर्बानी को पूरी तरह से भूल गई है.

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दो डीजीपी की जंग में शहीद हो रहे जवान

नक्सलवाद को नेस्तनाबूद करने की ख़ातिर छत्तीसगढ़ में तैनात किए गए दो पुलिस महानिदेशक नक्सलियों को मटियामेट करने के बजाय आपस में ही धींगामुश्ती कर रहे हैं. नक्सलियों का सफाया करने की जगह उनमें इस बात की होड़ मची है कि नक्सलियों के ख़िला़फ चल रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट की डोर किसके हाथ रहे और इसका सेहरा किसके सिर बंधे.

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शहादत से उठते सवाल

मुंबई पर आतंकवादी हमले के जख्म अभी हरे हैं. लगभग डेढ़ साल बाद तमाम जांच-पड़ताल के बावजूद मुंबई पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल अब भी मुंह बाए खड़े हैं. मुंबई हमले के दौरान शहीद हुए एडिशनल पुलिस कमिश्नर अशोक काम्टे की पत्नी विनीता काम्टे की किताब टू द लास्ट बुलेट मुंबई पुलिस और उसके कुछ आला अफसरों पर संगीन इल्ज़ाम लगाती है.

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विकास का वादा बनाम विनाश का भय

बलूचिस्तान ऑपरेशन की शुरुआत तो ग्वाडोर परियोजना की घोषणा के साथ हुई थी, लेकिन इसकी बुनियाद रखी गई हत्या, अपहरण और दिल को दहला देने जैसी वारदातों के साथ. ग्वाडोर बंदरगाह की बात तो की गई, लेकिन वादा केवल वादा ही बनकर रह गया.

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खून बहाने का जुनून

नक्सलियों के सिर पर रोज खून बहाने का जुनून सवार होता है, तो पुलिस के जवानों पर नक्सलवाद के नासूर को खत्म करने का. इसी चक्कर में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब निरीह जनता के खून से यहां की धरती लाल न होती हो. कहीं नक्सली मारे जा रहे हैं तो कहीं सुरक्षाबल के जवान शहीद हो रहे हैं. हालात यह हैं कि कुछ इलाक़ों में नक्सलियों को लेवी देने के बाद ही विकास के काम का पहला पत्थर लग पाता है. दोनों राज्यों के कई इलाक़ों में रेलगाड़ियों का परिचालन नक्सलियों की मर्ज़ी पर निर्भर है

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शहीद स्थल बाज़ारू संस्कृति की भेंट चढ़ा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सीवान के अनेक युवा क्रांतिकारी शहीद हुए थे. उन्होंने आने वाली पी़ढी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया. लेकिन, विडंबना देखिए कि उन वीर सपूतों के बलिदान को भुला कर उनके स्मारकों को बाज़ारू संस्कृति की भेंट चढ़ा दिया गया. इस काम को अंजाम दिया है सीवान नगरपालिका ने. उसने शहीद सराय परिसर को मार्केट कांप्लेक्स में तब्दील कर दिया है, जहां कई शहीदों के स्मारक हैं.

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गोली से नहीं सियासत से शहीद हुए हेमंत करकरे

चार्जशीट में दिए ब्यौरे के मुताबिक इस गिरोह का नेटवर्क भारत से बाहर कई देशों, यहां तक कि इस्लामिक देशों में भी फैला है़ देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में चार्जशीट में दिए गए तथ्यों की व्याख्या कतई नहीं की जा सकती. आरोपियों से पूछताछ और नार्को टेस्ट के जरिए हिंदू आतंकवाद के बहाने जो घिनौना सच सामने आया है, वो आम हो जाए तो शायद देश में संकट के हालात पैदा हो जाएं. हिंदू समाज का ठेकेदार बनने वाली पार्टियों को मुंह छुपाने की जगह भी न मिले, लिहाजा इन तथ्यों को लेकर बेहद गोपनीयता बरती जा रही है ताकि चुनावी माहौल में पार्टियां देश में कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दें.

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