पूर्वी चंपारणः महात्‍मा गांधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जनसंघर्ष और नेतागिरी

संघर्ष ज़मीन तैयार करता है और फिर उसी ज़मीन पर नेता अपनी राजनीतिक फसल उगाते हैं. कुछ ऐसा ही हो रहा है मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए बने संघर्ष मोर्चा के साथ. चंपारण की जनता केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दिन-रात एक करके संघर्ष करती है और जब दिल्ली आती है अपनी बात केंद्र तक पहुंचाने, तो वहां मंच पर मिलते हैं बिहार के वे सारे सांसद, जो संसद में तो इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलते, लेकिन जनता के बीच भाषणबाज़ी का मौक़ा भी नहीं छोड़ते.

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नरेंद्र भूषण संयुक्त सचिव बनेंगे

1992 बैच के आईएएस अधिकारी नरेंद्र भूषण को कृषि एवं सहकारिता विभाग में संयुक्त सचिव बनाया जा सकता है. वह सुभाष चंद्र गर्ग की जगह लेंगे.

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यूरोप को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए

यूरोप में मुस्लिमों के साथ भेदभाव किए जाने का मामला किसी न किसी स्तर पर उठता रहता है. इस बीच एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जो मुसलमान सार्वजनिक तौर पर अपने धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं, उनके साथ यूरोप में भेदभाव किया जाता है.

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बिहारः सेवा यात्रा में सुशासन की पोल खुली

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चार दिवसीय चंपारण सेवा यात्रा ने सुशासन की पोल खोल दी है. मुख्यमंत्री के मोतिहारी पहुंचते ही पंचायत शिक्षकों द्वारा मानदेय भुगतान के लिए किया गया हंगामा, पुतला दहन, बिजली का ग़ायब होना, पंचायती राज के जन प्रतिनिधियों का आंदोलन एवं अभियंत्रण महाविद्यालय में व्याप्त कुव्यवस्था को लेकर छात्रों का हंगामा तथा सभाओं में जनता के बीच उत्साह न होना साबित करता है कि लोग सरकार से खुश नहीं हैं.

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पाठशाला में कोटा कितना कारगर होगा

देश में छह वर्ष से चौदह साल की आयु के हर बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देने वाले क़ानून राइट टू एजुकेशन को उच्चतम न्यायालय ने अपनी मंज़ूरी दे दी है. न्यायादेश के मुताबिक़, अब देश के सरकारी स्कूल और निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हो गया है.

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शिक्षा के अधिकार से गरीब क्यों वंचित हैं

खबर आई है कि बिहार सरकार संत विनोबा भावे का भूदान आंदोलन एक बार फिर शुरू करने जा रही है. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि विनोबा भावे द्वारा चलाया गया भूदान आंदोलन भूमिहीन किसानों को ज़मीन दिलाने के लिए था, वहीं बिहार सरकार का आंदोलन स्कूलों को ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए होगा. इस आंदोलन के माध्यम से राज्य सरकार लोगों से विद्यालयों के लिए ज़मीन मांगेगी.

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सद्गुरु की पहचान

जो वेद, वेदांत एवं छहों शास्त्रों की शिक्षा प्रदान करके ब्रह्म विषयक मधुर व्याख्यान देने में पारंगत हो, जो अपनी श्वांसोच्छवास क्रियाओं पर नियंत्रण कर सहज ही मुद्राएं लगाकर अपने शिष्यों को मंत्रोपदेश दे, निश्चित अवधि में यथोचित संख्या का जप करने का आदेश दे और केवल अपने वाक्‌ चातुर्य से ही उन्हें जीवन के अंतिम ध्येय का दर्शन कराता हो तथा जिसे स्वयं आत्म साक्षात्कार न हुआ हो, वह सद्गुरु नहीं है.

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मौलाना मोहम्मद अली जौहर : एक महान स्वतन्त्रता सेनानी, जिसे भुला दिया गया

मौलाना मोहम्मद अली जौहर 1878 में रामपुर में पैदा हुए. बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण पालन-पोषण और शिक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी मां को निभानी पड़ी. रिवायत के अनुसार, उर्दू और फ़ारसी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई.

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महाराष्ट्र में डी वाई पाटिल ग्रुप की हकीकत शिक्षा का माफिया राज

शिक्षा माफिया. इस देश को नव उदारवाद का एक उपहार. धंधा ऐसा कि हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आ जाए. और जब भैया हों कोतवाल तो फिर डर कैसा, चाहे जो मर्जी हो, वह कर लो. महाराष्ट्र के शिक्षा जगत में भी सालों से कुछ ऐसा ही हो रहा है. डी वाई पाटिल ग्रुप, एक ऐसा ही नाम है. पेश है, चौथी दुनिया की खास रिपोर्ट.

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बच्चों ने किया कमाल

दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में गरीब बच्चों का दाखिला टेढ़ी खीर है, लेकिन सरकारी स्कूल भी इस मामले में कम नहीं हैं. दिल्ली सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली छात्रवृत्तियां भी कई बार जरूरतमंद छात्र-छात्राओं तक नहीं पहुंच पाती हैं

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दिल्ली का बाबू: आइएएस बनने का ख्वाब

भारत में नव उदारवाद के दौर के बाद से मध्य वर्ग में लोक सेवा का आकर्षण बहुत ज्यादा नहीं बचा. फिर भी अन्य लोगों में इसे लेकर अभी भी दिलचस्पी बची हुई है. हाल के वर्षों में ऐसी कई खबरें आईं, जहां आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के कई उम्मीदवारों ने लोक सेवा की परीक्षा में अपने दम पर सफलता पाई है.

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आरक्षण

हमेशा मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर प्रकाश झा ने इस बार आरक्षण का मुद्दा उठाया है. यह आज की परिस्थितियों पर बनी फिल्म है और शिक्षा के व्यवसायीकरण के कारण नौजवानों और उनके परिवार को होने वाली परेशानियों व समस्याओं को सामने लाने का प्रयास है.

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अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के लिए छात्रवृति योजना : मदद के नाम पर धोखा

भारत में मूल शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया गया, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि हमारे देश में क़ानून तो बना दिए जाते हैं, पर उन्हें ठीक से लागू नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप क़ानून होते हुए भी आम नागरिक उससे कोई फ़ायदा नहीं ले पाते. शिक्षा का भी कुछ यही हाल है.

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मिड डे मील की कछुआ चाल

स्‍कूलों में मिलने वाला दोपहर का भोजन यानी मिड डे मील भी बच्चों को कुपोषण से बचाने में सहायक साबित नहीं हो पा रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3) की रिपोर्ट के मुताबिक़, देश में तीन साल से कम उम्र के क़रीब 47 फीसदी बच्चे कम वज़न के हैं. इसके कारण उनका शारीरिक विकास रुक गया है.

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सरकारी स्कूलों का लें हिसाब

शिक्षा का अधिकार क़ानून के तहत छह साल से लेकर 14 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा उनका मौलिक अधिकार होगा. इस क़ानून से उन करोड़ों बच्चों को फायदा मिलेगा, जो स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्राथमिक स्कूलों की मौजूदा संख्या पर्याप्त है? शायद नहीं.

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बिहार में सांस्कृतिक क्रांति

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि विद्रोह, क्रांति या बग़ावत कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका विस्फोट अचानक होता है. घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है. दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृहराज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती हैं.

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असमः अब उग्रवाद नहीं अंधविश्वास हावी

असम में अब उग्रवाद से कहीं ज़्यादा हत्याएं अंधविश्वास से हो रही हैं. राज्य की कांग्रेस सरकार स्वास्थ्य सेवा में आमूलचूल परिवर्तन का दावा करती है, पर हक़ीक़त इससे कोसों दूर है. गांवों में आज भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए लोग कविराज की झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं.

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एडसिल में सीएमडी की नियुक्ति का मामलाः सिब्बल जी, यह भी भ्रष्टाचार है

लोकपाल विधेयक बनाने के लिए गठित ज्वाइंट ड्राफ्ट कमेटी में सरकारी नुमाइंदे के तौर पर मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल भी शामिल हैं. यह कमेटी एक ऐसी संस्था के गठन का रास्ता निकाल रही है, जो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सके.

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रोटी की तलाश में भटकती जनजातियां

महाराष्ट्र में इन पिछड़ों को भटके विमुक्त के तौर पर पहचाना जाता है. महाराष्ट्र सरकार ने इन लोगों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण रखा है, लेकिन शिक्षा की कमी के कारण ये लोग इसका लाभ नहीं उठा पाए. इन जातियों के लोगों के पास ख़ुद के घर नहीं थे. ये लोग काम की तलाश में इस गांव से उस गांव भटकते थे. इन लोगों पर चोरी के भी आरोप लगते रहते थे. इसलिए अंग्ऱेजों ने 1871 में क़ानून बनाया. इस समुदाय को हमेशा बंदी बनाया जाता था.

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मुस्लिम समाज में तालीम की बयार

शिक्षा सभ्य समाज की बुनियाद है. इतिहास गवाह है कि शिक्षित क़ौमों ने हमेशा तरक़्क़ी की है. किसी भी व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए शिक्षा बेहद ज़रूरी है. अफ़सोस की बात यह है कि जहां विभिन्न समुदाय शिक्षा को विशेष महत्व दे रहे हैं, वहीं मुस्लिम समाज इस मामले में आज भी बेहद पिछड़ा हुआ है.

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विद्रोह की क़ीमत

क्‍या सरकार और माओवादियों के बीच चूहे-बिल्ली की तरह चल रहे खूनी संघर्ष में बाबुओं की हालत एक बंधक की तरह हो गई है? मलकानगिरी के जिलाधिकारी आर विनील कृष्णा एवं जूनियर इंजीनियर पी एम मांझी के अपहरण और बाद में उनकी रिहाई से यह सवाल उठ रहा है.

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आख़िर स्कूल बदहाल क्यों?

सरकारी स्कूल इस देश के करोड़ों बच्चों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं हैं. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के लिए बहुत ही मुश्किल है, जो रोजाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर अपना जीवनयापन करती है.

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मगध विश्‍वविद्यालयः बेहतर भविष्‍य की ओर अग्रसर

जिस प्रकार प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक व्यवस्था तथा पठन-पाठन के उच्च मापदंड के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध था, ठीक उसी प्रकार अब मगध विश्‍वविद्यालय भी देश-दुनिया में उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानक पर खरे उतरते हुए अपनी पहचान बनाने में सफल हो रहा है.

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बच्‍चों का निवाला गट जाते हैं गुरू जी

सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत अबोध बच्चों को शिक्षा के प्रति ललक पैदा करने व उनके शारीरिक विकास के लिए चलाई जा रही मध्यान्ह भोजन योजना का निवाला कोई और ही गटक जाता है. इस मामले में सारण ज़िले का कोई सानी नहीं है.

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आंदोलन के बहाने देशी शिक्षा

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश को ग़ुलाम बनाया गया तो उसकी शिक्षा पद्धति में सबसे पहले परिवर्तन किया गया. आज़ादी के का़फी पहले से देश के विद्वानों और आंदोलनकारियों ने इस बात को समझ लिया था.

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कुलपति और बदहाल उच्‍च शिक्षा

जदयू सांसद शिवानंद तिवारी की हाल ही में की गई टिप्पणी, जिसमें वह कहते हैं कि बिहार में कुलपतियों की नियुक्तियां संदेह के घेरे में रही हैं. इसलिए विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल को सुधारने के लिए कुलपतियों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आवश्यक है, बताती है कि उच्च शिक्षा की वर्तमान हालत क्या है.

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आधी आबादी और शिक्षा के अधिकार का सच

भारत में 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का क़ानून भले ही लागू हो चुका हो, लेकिन इस आयु वर्ग की लड़कियों में से 50 प्रतिशत तो हर साल स्कूलों से ड्राप-आउट हो जाती हैं. ज़ाहिर है, इस तरह से देश की आधी लड़कियां क़ानून से बेदखल होती रहेंगी.

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एक स्‍कूल ऐसा भीः नैतिक शिक्षा के रूप में गीता की पढ़ाई

देश भर में स्कूलों के पाठ्यक्रमों में आए दिन बदलाव तो होते ही रहते हैं, और यह कोई नई बात भी नहीं है. पर लखनऊ में एक संस्था ऐसी भी है, जिसने पिछले 75 वर्षों से अपने पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया है.

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साउथ ब्‍लॉकः गुप्ता बन सकते हैं निदेशक

पीवी गुप्ता जल्द ही उच्च शिक्षा विभाग में निदेशक का पद संभाल सकते हैं. उन्हें रश्मि चौधरी की जगह पर नियुक्त किया जा सकता है.

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बदहाल उत्तर प्रदेश में बेहाल शिक्षा

हाल ही में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने शिक्षा के गिरते स्तर और अराजक होते शैक्षिक माहौल से निपटने के लिए राज्य भर के विश्व विद्यालयों के कुलपतियों के साथ गहन चिंतन-मनन किया. राज्यपाल की चिंता इस संदर्भ से जुड़ी थी कि उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालय गुणवत्तापरक शिक्षा देने में विफल हो रहे हैं, साथ ही अनुशासन बना पाने में भी नाकाम सिद्ध हो रहे हैं.

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