मज़दूरों की गहमागहमी और मशीनों की घरघराहट से गुलज़ार रहने वाले मानेसर (गुड़गांव) के मारुति सुजुकी प्लांट में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है. प्लांट के भीतर मशीनें बंद हैं और काम ठप पड़ा है. पिछले महीने मारुति सुजुकी प्रबंधन और मज़दूरों के बीच हुए विवाद में कंपनी के एचआर हेड की मौत हो जाने के बाद हिंसा भड़क उठी. दोनों पक्षों के बीच हुई मारपीट में कई दर्जन लोग घायल हो गए.
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मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.
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देश में छह वर्ष से चौदह साल की आयु के हर बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देने वाले क़ानून राइट टू एजुकेशन को उच्चतम न्यायालय ने अपनी मंज़ूरी दे दी है. न्यायादेश के मुताबिक़, अब देश के सरकारी स्कूल और निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हो गया है.
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हर धंधे में एक श्रमिक का औसत कार्यभार निर्धारित होना आवश्यक है. मालिक लोग तो, मान लीजिए, ऐसे एक मज़दूर को चुन लेते हैं, जो बहुत ज़्यादा मेहनत करता है या निपुण है, जो सबसे ज़्यादा काम करता है, और उसी को पैमाना बनाकर वे चाहते हैं कि हर श्रमिक का कार्यभार उतना ही हो.
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यह सही है कि इससे जनता को कष्ट और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. अभी हम श्रमिक संघ प्रणाली का विश्लेषण कर रहे हैं. इसके कई पहलू अभी तक बाक़ी रह गए हैं. मज़दूरों के किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए सविनय अवज्ञा के तरीक़े हैं, जैसे टूल्स डाऊन, स्टे-इन-स्ट्राइक आदि.
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मध्यम वर्ग के संबंध में तो कह चुके. अब लीजिए ग़रीब वर्ग को, जो भूखे हैं, मज़दूर हैं, श्रमिक हैं, भीड़ हैं, चाहे जो कह लीजिए. दुनिया में किसी देश का हो, किसी जाति का हो, स्त्री हो या पुरुष, ऐसा व्यक्ति जिसके पास निज की कोई ज़मीन-जायदाद न हो, न जिसकी कोई पूंजी हो, जिसे अपने जीवन निर्वाह के लिए दूसरों के यहां नौकरी करनी पड़े, काम का मूल्य या भाड़ा लेकर काम करना पड़े, इन सबको सभ्य भाषा में श्रमिक वर्ग कहते हैं.
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बढ़ी हुई जनसंख्या निश्चय ही देश का धन है, पर कब और किस हालत में? ज़रा ग़ौर कीजिए. एक दंपत्ति समृद्ध हैं, अपनी परिचर्या के लिए दो नौकर रखे हुए हैं, सब काम उनके वे दोनों नौकर आराम से कर लेते हैं. एक दूसरे दंपत्ति ने अपनी परिचर्या के लिए, अलग-अलग कामों के लिए 9 नौकर तैनात किए हैं. काम इनका भी आराम से हो जाता है. अब बताइए, वे 9 आदमी विशेष काम करते हैं क्या? नहीं.
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यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.
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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राजनीति के जादूगर हैं. वह राज्य की भोलीभाली जनता को सुनहरे सपने दिखाने में माहिर हैं और कभी-कभी तो कई दिनों तक सपनों के संसार की सैर भी कराते हैं. बाद में अपने वायदे भूलकर जनता को बेरहमी से धरती पर पटक देते हैं. हाल ही शिवराज सिंह ने राज्य के हज़ारों हाथठेला मज़दूरों की वाहवाही लूटने के लिए वायदा किया था कि सभी हाथठेला चालकों को मालिकाना हक़ दे दिया जाएगा.
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श्रमिकों के कल्याण के लिए उपलब्ध फंड का उपयोग नहीं किया जा रहा है. जो राशि इनके कल्याण के लिए आती है वह किसी और की जेब में जा रही है और यह सब इसलिए क्योंकि राज्य सरकार ने उसके लिए ज़रूरी राज्य सलाहकार समिति का गठन नहीं किया है. छत्तीसगढ़ सरकार के अलावा स्वयं केंद्र की सरकार श्रमिकों के कल्याण के लिए चलाए जाने वाली योजनाओं केवल औपचारिकता बनाकर रखना चाहती है.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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