कैसे मायावती के भाई आनंद कुमार की संपत्ति बन गई कुबेर का खजाना

हाल ही में खबर आई थी कि मायावती को राजनीतिक चन्दे के तौर पर 100 करोड रूपये मिले थे. अब,

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रॉबर्ट वाड्रा को आरोपों का सामना करना चाहिए

रॉबर्ट वाड्रा ने जो किया, वह अनोखा नहीं है. जो भी बिजनेस में होते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग ऐसे ही तरीक़े अपनाते हैं और अपनी संपत्ति बढ़ाते हैं. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि उनका जुड़ाव सत्ता से नहीं होता, जबकि रॉबर्ट वाड्रा का रिश्ता सीधे सत्ता से है और सत्ता से भी इतना नज़दीक का कि वह वर्तमान सरकार को नियंत्रित करने वाली सर्वशक्तिमान महिला श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद हैं और भारत के भावी प्रधानमंत्री, यदि बने तो, राहुल गांधी के बहनोई हैं.

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कश्मीर और कश्मीरियों से दिल का रिश्ता जोड़िए

कश्मीर हमारे लिए कभी प्राथमिकता नहीं रहा. कश्मीर की क्या तकली़फ है, वह तकली़फ क्यों है, उस तकली़फ के पीछे की सच्चाई क्या है, हमने कभी जानने की कोशिश नहीं की. हमने हमेशा कश्मीर को सरकारी चश्मे से देखा है, चाहे वह चश्मा किसी भी सरकार का रहा हो. हम में से बहुत कम लोग श्रीनगर गए हैं. श्रीनगर में पर्यटक के नाते जाना एक बात है और कश्मीर को समझने के लिए जाना दूसरी बात है.

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सुशासन का सच या फरेब

बिहार के चौक-चौराहों पर लगे सरकारी होर्डिंग में जिस तरह सुशासन का प्रचार किया जाता है, वह एनडीए सरकार की शाइनिंग इंडिया की याद दिलाता है. बिहार से निकलने वाले अ़खबार जिस तरह सुशासन की खबरों से पटे रहते हैं, उसे देखकर आज अगर गोएबल्स (हिटलर के एक मंत्री, जो प्रचार का काम संभालते थे) भी ज़िंदा होते तो एकबारगी शरमा जाते. ऐसा लिखने के पीछे तर्क है.

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कब्रों का कारोबार

हिंदुस्तान पर हुकूमत करने वाले अनेकानेक राजा-महाराजाओं और नवाबों को लोग आज सैकड़ों वर्षों बाद भी भूल नहीं पाए हैं. यह राजा-रजवाड़े भले ही आलीशान महलों में रहते थे लेकिन इनका दिल जनता में बसता था.

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रुपयों से ख़रीदे गए रुपये

पूंजी बाज़ार वह जगह है, जहां साल भर की कमाई एकमुश्त रकम के बदले ख़रीदी या बेची जाती है. एक हज़ार रुपये में आप कितनी कमाई ख़रीद सकते हैं, यह भाव रोज़ाना बदलता रहता है. और किसी दिन एकमुश्त रकमें कम हैं तो ज़्यादा कमाई ख़रीद सकते हैं.

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दुष्टतापूर्ण नीति

भारत में तो एक तरह से यह स्थिति आ गई है कि शासन को भारतीय राष्ट्रीय मज़दूर संघ ही चला रहा है. कोई भी काम हो, अगर उसके अधिकारीगण कराना चाहेंगे तो फौरन हो जाएगा, चाहे वह काम क़ानूनन वैध हो अथवा अवैध. कोई मिल, फैक्ट्री या कारखाना कितने ही वर्षों से नुक़सान में चल रहा हो, मज़दूर आवश्यक संख्या से बहुत ज़्यादा हों, यहां तक कि धीरे-धीरे मिल की सारी पूंजी समाप्त हो जाए, पर इन श्रमिक संघों के कान पर जूं नहीं रेंगेगी.

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पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का नया युग

भारत एक ऐसा देश है, जिसका पर्यावरण संबंधी आंदोलनों, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और उत्तरदायी उच्च न्यायपालिका का अपना समृद्ध इतिहास रहा है. ऐसे देश में 2011 का वर्ष पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष अर्थात मील का पत्थर साबित हुआ है. यद्यपि पर्यावरण संबंधी मुक़दमेबाज़ी पिछले तीन दशकों में काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के कारण 2011 का वर्ष फिर भी काफ़ी विशिष्ट है.

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बिहार मदरसा बोर्ड : नया चेयरमैन, नई चुनौतियां

राज्य में मदरसा शिक्षा माफियाओं का किला ढह गया है. ठगी, चोरी, डकैती और लूटपाट के मकड़जाल में उलझे मदरसा शिक्षा बोर्ड ने कई वर्षों के बाद राहत की सांस ली है. मदरसा शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लाखों मासूम शिक्षक, शिक्षणेत्तर कर्मी एवं विद्यार्थी माफियागिरी के अंत को नीतीश सरकार की ओर से जनता को नए वर्ष के तोह़फे के रूप में देख रहे हैं

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संपत्ति का ब्योरा कब देंगे

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाबुओं के बीच फैले भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जो क़दम उठाए, वे कई दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए आधार बने. भले ही नीतीश कुमार को इसमें कुछ हद तक सफलता मिली है, लेकिन उनका प्रयास का़फी नहीं है. उन्हें इसके लिए और प्रयास करने की ज़रूरत है.

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मनुष्य का यंत्रीकरण

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने आदमी को एक तरह से मशीन बना दिया है. उदाहरण के लिए घर में काम आने वाली सुइयां या कीलें आज से 200 वर्ष पहले ग्राम का कोई लोहार बनाता था. उसके बनाने में जो साजो-सामान लगता था, उसको प्राप्त करने से लेकर तैयार सुई या कील घर- घर जाकर बेचकर पैसा इकट्ठा करने तक का सारा काम वह स्वयं या उसका परिवार कर लेता था.

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फालतू धन की माया

ज़मीन या मकान ही ऐसी निजी संपत्ति नहीं थी जिसकी आय पर आदमी बिना कुछ करे घर बैठे खाता-पीता रहे. किराये के धन से भी कहीं ज़्यादा जो फालतू धन लोगों के पास पड़ा है, उसका किराया पूंजीवादियों की दूसरी निजी संपत्ति है. फालतू धन के किराये को हम ब्याज़ के नाम से पुकारते हैं.

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व्यक्तिगत और निजी संपत्ति

समाजवादी अर्थव्यवस्था की प्रतिष्ठा से पहले इसे ठीक से समझना होगा. जब तक इसके विपरीत पक्ष पूंजीवाद को हम सही मायनों में समझ नहीं लेते, तब तक समाजवाद का तात्विक अर्थ समझना कठिन है.

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सरकार नहीं चाहती वक्फ संपत्तियों का संरक्षक योग्य व्यक्ति बनें

देश में वक्फ संपत्तियों की खुलेआम लूट कोई नई बात नहीं है और न अब यह बात किसी से छुपी है कि इन संपत्तियों को लूटने में जितना हाथ सरकार का है, उतना ही खुद मुसलमानों का भी है. यह बहुत आसान फार्मूला है कि जिन लोगों को वक्फ बोर्ड की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, वे अपनी इस चोरी को छिपाने के लिए सीधे-सीधे सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दें और देश के आम मुसलमानों को यह कहकर बेवक़ू़फ बनाते रहें कि सरकार ही मुसलमानों के प्रति सांप्रदायिक है तो उन्हें इंसा़फ कैसे मिल सकता है?

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आय का सामान वितरण ही समाजवाद है

अब स़िर्फ आ़खिरी योजना यानी समाजवादी वित्त-वितरण की योजना का परीक्षण ही शेष रहा. आपको ध्यान होगा कि यह बात इस विषय पर विचारणीय हुई कि धन का बंटवारा किस ढंग पर संतोषप्रद या उपादेय हो सकता है. इस सिलसिले में जब हमने यह विचार किया कि हर आदमी को उतना ही मिले, जितना वह अर्जन करता है, बिना अर्जन किए नहीं मिले तो यह तरीक़ा बिल्कुल मूर्खतापूर्ण सिद्ध हुआ.

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संपत्ति के वितरण की विभिन्न प्रणालियां

एक योजना जो आमतौर पर बतलाई जाती है और जो काम करने वाले मज़दूरों को मान्य और प्रिय है वह यह है कि जो आदमी अपने परिश्रम से जितना द्रव्य कमाए या पैदा करे वह उसके पास रहने दिया जाए. दूसरे कई व्यक्ति कहते हैं जो जितने का पात्र है उतना उसे मिले, जिससे कि आलसी, बेकार, कमज़ोर, शिथिल आदमियों को कुछ न मिले और वे नष्ट हो जाएं.

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व्यक्ति और समाज

मान लीजिए देश की समस्त संपत्ति आपके हाथ में सौंप दी जाए और कह दिया जाए कि आप उचित ढंग से उसका वितरण कर दीजिए. आप बंटवारा किस ढंग से करेंगे? एक बार आप अपने परिवार के आदमियों और इष्ट मित्रों को भूल जाइए, क्योंकि आप वितरणकर्ता हैं. तो लाज़िमी तौर पर आपको पक्षपात रहित होकर सर्वसाधारण को एक समान मानकर वितरण करना होगा. आपको पंच परमेश्वर का बाना पहनना होगा.

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समाजवाद क्या है

समाजवाद का मूल सिद्धांत है देश की कमाई को नए ढंग से बांटना. आपने शायद लक्ष्य नहीं किया हो, पर यह सत्य है कि देश की आय प्रत्येक दिन प्रत्येक क्षण बंटती रहती है और उस आय का बंटवारा होता ही रहेगा. जब तक देश में एक से अधिक व्यक्ति मौजूद रहेंगे, तब तक अहर्निश यह बंटवारा होता ही रहेगा.

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दिल्‍ली का बाबूः बाबुओं पर सख्त डीओपीटी

पिछले कुछ महीनों से कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग अपने उन बाबुओं की नकेल कसने में लगा हुआ है, जिन्होंने बार-बार कहने के बाद भी अपनी संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया है, जबकि ऐसा करना उनके लिए अनिवार्य है. इसलिए अब इस विभाग ने ऐसे बाबुओं को रास्ते पर लाने के लिए एक तरीक़ा निकाला है.

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भारत को भारतीयों ने ज्यादा लूटा

यह 19वीं शताब्दी की बात है. ब्रिटिश जमकर भारत को लूट रहे थे और सारा पैसा इंग्लैंड ले जा रहे थे. यानी भारत से धन की निकासी अपने चरम पर थी. तब कांग्रेस के पुरोधाओं के लिए ब्रिटिश शासन की आलोचना का यही मुख्य आधार रहा.

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असमः मंत्रियों की संप‍त्ति की घोषणा पर सवाल

बीती 14 जनवरी को असम सरकार ने अपनी वेबसाइट पर राज्य के सभी मंत्रियों की संपत्तियों का विवरण सार्वजनिक कर दिया. काफी समय पहले असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने वादा किया था कि वह और उनके मंत्रिमंडल के सभी सहयोगी अपनी-अपनी संपत्ति की घोषणा करेंगे, लेकिन कई बार समय सीमा तय करने के बावजूद ऐसा नहीं हो सका.

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दिल्‍ली का बाबूः बाबू अपनी संपत्ति की घोषणा करें

वर्ष 2010 में अवैध रूप से 280 करोड़ रुपये की संपत्ति जमा करने के मामले में एक आईएएस अधिकारी का नाम आने के बाद अब लगता है कि 2011 में बाबुओं को अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करने के लिए कहा जा सकता है. नीतीश कुमार बिहार में यह अभियान शुरू भी कर चुके हैं और सफल होते दिख रहे हैं.

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आज़ादी के 63 बरसों बाद भी बेगाने

हमारे मुल्क के नीति नियंता किस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी और बिना दूरअंदेशी से अपनी नीतियां बनाते हैं, इसका एहसास हमें अभी हाल में आए शत्रु संपत्ति संशोधन और विधिमान्यकरण विधेयक का हश्र देखकर होता है. हिंदुस्तानी मुसलमानों की ज़मीन-जायदाद से सीधे-सीधे जुड़े इस संवेदनशील विधेयक, जिस पर मुल्क भर में बहुत विचार-विमर्श की ज़रूरत थी, को गोया इस तरह पेश करने की तैयारी थी, मानो यह कोई मामूली विधेयक हो.

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पैसा-पैसा करती है…

पैसा-पैसा करती है, क्यों पैसे पर तू मरती है…यह गाना तो आपको याद ही होगा. चीन में महिलाएं इस गाने को अपनी निजी ज़िंदगी में उतारने पर आमादा हैं. चीन में ज़्यादातर महिलाएं ऐसे पुरुषों से विवाह करना चाहती हैं, जिनके माता-पिता के पास अकूत दौलत हो. इसका खुलासा एक सर्वे में हुआ है.

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कोड़ा प्रकरणः विनोद सिन्‍हा को बचाने की रणनीति तैयार

खानों के आवंटन में दलाली के रूप में अर्जित की गई अकूत संपत्ति के मुख्य आरोपियों को बचाने की रणनीति तैयार की जा रही है. तक़रीबन चार हज़ार करोड़ रुपए की माइंस दलाली के आरोपी मधु कोड़ा एंड कंपनी के मामले की जांच सीबीआई के हवाले करने से राज्य सरकार के इंकार का रहस्य अब परत-दर- परत खुलने लगा है.

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अभी भी चुनौती है डंपर कांड

मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों द्वारा विधानसभा के पटल पर रखी गई, संपत्ति संबंधी जानकारी में राज्य के वित्तीय विशेषज्ञों को असमंजस में डाल दिया है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में शिवराज सिंह चौहान और उनकी पत्नी समेत सात व्यक्तियों के ख़िला़फ जनहित याचिका ख़ारिज़ कर दी है.

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नीतीश को मिला ब्रह्मास्त्र

यह लड़ाई से पहले की रणभेरी है और सभी लड़ाके खम ठोंक कर मैदान में उतर आए हैं. लालू-राबड़ी के खिला़फ आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई के एक खुलासे ने राजद के साथ-साथ कांग्रेस को भी बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया है. कांग्रेस सारे मामले से अपना हाथ खींचने की कोशिश में लगी है तो लालू जवाबी हमले के लिए तैयार हो रहे हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा फायदा तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू को हुआ है.

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सार-संक्षेप

आय से अधिक संपत्ति रखने और सरकारी नियमों के अनुसार उसका खुलासा न करने के आरोप में लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री महेंद्र सिंह चौहान को विशेष न्यायालय जबलपुर ने एक वर्ष के सश्रम कारावास और 50 हज़ार रुपये के ज़ुर्माने से दंडित किया है. महेंद्र सिंह चौहान जब जबलपुर में इंजीनियर पद पर कार्यरत थे, तब 24 फरवरी 1995 को लोकायुक्त-पुलिस ने उनके आवास पर छापा मारकर लाखों रुपये की अघोषित चल-अचल संपत्ति का पता लगाया था.

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