जम्मू-कश्मीर के वाशिंदे पहले भारतीय : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, (चौथी दुनिया ब्यूरो): सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर राज्य भारतीय संविधान के दायरे के बाहर नहीं

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संविधान और लोकतंत्र की गरिमा बनी रहनी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन को खारिज कर दिया है, जो वहां के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा

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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : बंधुत्व एकता की सीढ़ी है

पिछले अंक में आपने 26 जनवरी, 1950 को भारत के प्रजातांत्रिक देश बन जाने के बारे में पढ़ा. इस समापन

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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : जीवन की सामाजिक-आर्थिक असमानताएं ख़त्म करना ज़रूरी

भारत 26 जनवरी, 1950 को एक प्रजातांत्रिक देश बन गया, लेकिन उससे पूर्व कई आशंकाएं संविधान निर्माताओं को चिंतित कर

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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है

स्वतंत्रता की रक्षा हर क़ीमत पर होनी चाहिए संविधान बनने के बाद केंद्र और राज्य की शक्तियों को लेकर कई

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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : राजनीतिक दलों की राय का औचित्य

भाग-3 मैं संविधान पर किसी भी आलोचना को चुनौती देता हूं कि दुनिया की कोई भी संविधान सभा इस बात

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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : संविधान बनाने में किसने कितनी मेहनत की

संविधान निर्माण में किन-किन लोगों ने कैसे योगदान किया. उनके कार्यों का क्या महत्व था और अगर वे न होते,

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संविधान में राजनीतिक दल का ज़िक्र नहीं है : कब और कैसे बना हमारा संविधान

इस अंक से हम डॉ. बी आर अंबेडकर द्वारा 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए गए आख़िरी भाषण

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यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया.

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उड़ीसा ने अन्‍ना हजारे को सिर-आंखों पर बैठाया : राजनीति को नए नेतृत्‍व की जरूरत है

अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.

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सीमेंट फैक्ट्रियों के लिए भूमि अधिग्रहणः खूनी मैदान में तब्‍दील हो सकता है नवलगढ़

करीब पांच दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 को जिस राजस्थान के नागौर ज़िले में पंचायती राज का शुभारंभ किया था, उसी सूबे की पंचायतों और ग्राम सभाओं की उपेक्षा होना यह साबित करता है कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने देखा था, वह आज़ादी के 65 वर्षों बाद भी साकार नहीं हो सका.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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सीएजी के प्रति कांग्रेस का रवैया यह प्रजातंत्र पर हमला है

सीएजी (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2006-2009 के बीच कोयले के आवंटन में देश को 1.86 लाख करोड़ का घाटा हुआ. जैसे ही यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई, कांग्रेस के मंत्री और नेता सीएजी के खिला़फ जहर उगलने लगे. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सीएजी ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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हिंद, हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व

वर्ष 1940 के दशक में जब हम लोग बच्चे थे तो गाया करते थे, हिंदी हैं हम चालीस करोड़. 1940 के दशक के चालीस करोड़ लोग अपने आपको हिंदी यानी हिंद के रहने वाले समझते थे. सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया और उनका नारा जयहिंद था. यही नारा प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल क़िले से देते हैं. भारत का एक अलग अस्तित्व है.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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हमें किस हवा के साथ बहना चाहिए?

दुनिया में बहुत सारे देश हैं, जिनमें सरकार, पुलिस, सेना और अदालत एक तरह से सोचते हैं, एक तरह से फैसला लेते हैं और मिलजुल कर देश की संपदा और जनता पर राज करते हैं, लेकिन बहुत सारे देश ऐसे हैं, जहां एक-दूसरे के फैसलों के ऊपर गुण-दोष के आधार पर यह तय होता है कि एक पक्ष दूसरे का साथ दे या न दे.

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सरकार नहीं चाहती मुस्लिमों को आरक्षण मिले

एक बार फिर मुस्लिम आरक्षण को लेकर पूरे देश में विवाद खड़ा हो गया है. कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय मुसलमानों को 4.5 फीसदी आरक्षण के रूप में जो लॉलीपॉप दिया था, उसकी सच्चाई उस समय सामने आ गई, जब आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने उसे यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि यह धर्म की बुनियाद पर है और संविधान के अनुकूल नहीं है.

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क्या फिर टूटेगा कुसहा बांध

कुसहा की त्रासदी की पीड़ा लोग अभी तक भुला नहीं पाए हैं और एक नई त्रासदी की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी है. यही कारण है कि लोगों के मुंह से अब यह बरबस निकलने लगा है कि क्या नेपाल में संविधान निर्माण को लेकर चल रहे आंदोलन की वजह से कुसहा जैसी बाढ़ की पुनरावृत्ति सचमुच हो सकती है.

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ग्रामीण विकास और महिला जनप्रतिनिधि

एक बार फिर हमेशा की तरह महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ा बिल ठंडे बस्ते में रहा. सरकार भी आम सहमति बनाने के मूड में नज़र नहीं आई. सभी राजनीतिक दल एक सुर में महिला अधिकारों की बात करते हैं, परंतु बिल पारित कराने के विषय पर बंटे नज़र आते हैं. कुछ राजनीतिक दल आरक्षण में आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

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