बंद मिलें और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

समस्तीपुर बिहार का प्रमुख ज़िला है. यहां पूर्व मध्य रेलवे का मंडलीय कार्यालय है, उत्तर बिहार का इकलौता राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय है. फिर भी यह जिला औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ा है. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद यहां उद्योग पनप नहीं पा रहे हैं.

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कार्टून के बहाने उठे सवाल

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के लगभग छह दशक पहले छपे एक कार्टून के एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तक में फिर से छपने पर संसद में जमकर बवाल हुआ. बवाल और हंगामे के बीच मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने सदन में मा़फी मांगी और मामले की जांच के लिए कमेटी बनाने का ऐलान कर दिया. मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने नैतिकता के आधार पर मा़फी मांगी, लेकिन इस मा़फी में नैतिकता से ज़्यादा एक मंत्री की लाचारी भी दिखाई देती है.

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गांव की मिट्टी और देश का गौरव

हाल में दीपिका कुमारी ने तीरंदाज़ी विश्वकप में स्वर्ण पदक जीता. वह भी लंदन ओलंपिक खेलों के आयोजन के कुछ महीने पहले. देशवासी दीपिका से ओलंपिक मेडल की आस लगाने लगे हैं. आस लगाने वालों में हमारी सरकार भी शामिल है. खिलाड़ी पदक जीतते ही देश के लाल हो जाते हैं, सरकार कुछ दिन तक खिलाड़ियों का गुणगान करती है.

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सुनील कुमार जेएस एंड एफए बने

1981 बैच के आईडीएएस अधिकारी सुनील कुमार कोहली जल संसाधन मंत्रालय में संयुक्त सचिव और वित्तीय सलाहकार बनाया गया है. वह अनन्या रे की जगह लेंगे.

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जल संसाधन मंत्रालयः एनपीसीसी में यह क्‍या हो रहा है

जल, थल और नभ, भ्रष्टाचार के कैंसर ने किसी को नहीं छोड़ा. जहां उंगली रख दीजिए, वहीं भ्रष्टाचार का जिन्न निकल आता है. बड़े घोटालों की बात अलग है. ऐसे सरकारी संगठन भी हैं, जिनके बारे में अमूमन आम आदमी नहीं जानता और इसी का फायदा उठाकर वहां के बड़े अधिकारी वह सब कुछ कर रहे हैं, जिसे संस्थागत भ्रष्टाचार की श्रेणी में आसानी से रखा जा सकता है.

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मध्य प्रदेश : नक्सल प्रभावित क्षेत्र घोषित होने का फ़ायदा किसे

राज्य में पूर्व के तीन ज़िलों मंडला, डिंडोरी एवं बालाघाट के मुक़ाबले 5 अन्य नए ज़िलों सीधी, सिंगरौली, उमरिया, शहडोल एवं अनूपपुर में नक्सलियों का प्रभाव बढ़ गया है. राज्य सरकार की लगातार कोशिशों के बाद प्रदेश के इन सभी आठ ज़िलों को नक्सल प्रभावित घोषित कराने में कामयाबी मिल गई और ऐसे प्रत्येक ज़िले के लिए 25 करोड़ रुपये की सालाना केंद्रीय सहायता हाल में शुरू भी हो गई है.

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एक सीमावर्ती गांव की असली तस्वीर

भारत को गांवों का देश कहा जाता है, क्योंकि यहां की अधिकतर आबादी आज भी गांव में ही निवास करती है, प्रकृति की गोद में जीवन बसर करती है और प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से जीवन के साधन जुटाती है. शहरी सुख-सुविधाओं से दूर ज़िंदगी कितनी कठिनाइयों से गुज़रती है, इसका अंदाज़ा लगाना बड़े शहरों में रहने वालों के लिए मुश्किल है.

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अशोक कुमार एएस बने

1981 बैच के आईएएस अधिकारी अशोक कुमार को रक्षा उत्पाद विभाग में अतिरिक्त सचिव बनाया गया है. वह पहले इसी विभाग में संयुक्त सचिव के पद पर काम कर रहे थे.

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जहां चाह, वहां राह

एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है.

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मिस्र : मार्शल तांतवी का तांडव

कहा जाता है कि क्रांति अपने पुत्रों को निगल जाती है. क्या मिस्र में कुछ ऐसा ही होने वाला है? जिन लोगों ने देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना क़ीमती समय ख़र्च किया, संसाधन लगाए और होस्नी मुबारक को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया, आज उन्हीं के साथ फिर से अन्याय किया जा रहा है.

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वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं.

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झारखंड: रेल परियोजनाओं की कछुआ चाल

खनिज संसाधनों के मामले में देश के सबसे धनी सूबे झारखंड में शायद ही ऐसी कोई योजना है, जो समय पर पूरी हुई हो. एक वर्ष के भीतर पूरी हो जाने वाली योजनाएं 3 से लेकर 5 साल तक खिंच जाती हैं. योजना के लिए प्राक्कलित राशि भी दोगुनी से तीन गुनी हो जाती है. राजनीतिक अस्थिरता, सुस्त एवं भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी, असामाजिक तत्वों का हस्तक्षेप और शासन में इच्छाशक्ति का अभाव जैसे कारण इस समस्या के मूल में हैं.

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पानी पर सबका हक़ है

जल ही जीवन है. वाक़ई पानी के बिना ज़िंदगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि जहां एक तऱफ करोड़ों लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं, वहीं इतने ही लोग ज़रूरत से ज़्यादा पानी का इस्तेमाल करके इसे बर्बाद करने पर आमादा हैं. जब हम पानी पैदा नहीं कर सकते तो फिर हमें इसे बर्बाद करने का क्या हक़ है?

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बीटी बीज यानी किसानों की बर्बादी

संप्रग सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति होनी चाहिए, वह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है. इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देने के उपाय हैं.

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शाहाबादः कहीं बंजर न हो जाए जमीन

सन 1857 की क्रांति के दौरान जब शाहाबाद की धरती ने आग उगलना शुरू किया तब यहां के लोगों को सिंचाई के संसाधन देकर कृषि कार्य कीतरफ मोड़ने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने एक बड़ी परियोजना की शुरूआत की थी. डेहरी के ऐनकार्ट में सोन नदी पर एक बांध बना और पूरे शाहाबाद में नहरों का जाल बिछाने की कवायद तेज़ हुई.

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पुरवा नहरः 21 साल में 30 कोस

जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार के साथ-साथ लेट लतीफी के कारण तमाम जनहित की सरकारी परियोजनाओं का काम इतनी धीमी गति से होता है कि राज्य को उनका समय पर लाभ नहीं मिल पाता है. परियोजनाओं के निर्माण में देरी से निर्माण लागत भी कई गुना बढ़ जाती है.

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दिल्‍ली का बाबू : कपिल सिब्बल का बदला मिजाज

ऐसा लगता है, मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने शिक्षा क्षेत्र में शीर्ष पदों पर नौकरशाहों को नियुक्त न करने के अपने पुराने फैसले को तिलांजलि दे दी है. पिछले साल तक सिब्बल का स्पष्ट रवैया था कि वह शिक्षा विभाग में शीर्ष पदों पर नौकरशाहों की अपेक्षा शिक्षाविदों की नियुक्ति के पक्ष में हैं, लेकिन अब वह अपनी बात से पीछे हटते दिख रहे हैं.

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अधर में लटकी जलाशय परियोजना

देवघर ज़िले में चल रही दो बड़ी बहुप्रतीक्षित एवं बहुचर्चित जलाशय परियोजना का निर्माण कार्य अनियमितता, भ्रष्टाचार, लापरवाही एवं राजनीतिक दावपेंच के चंगुल में फंस कर रह गया है. दोनों ही जलाशय परियोजनाओं पर अब तक अरबों रुपये ख़र्च किए जा चुके हैं. फिर भी निर्माण कार्य अब तक पूरा नहीं हुआ है.

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जैव विविधता और जैव प्रौद्योगिकी के बीच का घालमेल

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकार यानी एनबीए ने उत्तराखंड के देहरादून डॉल्फिन इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नेचुरल साइंसेस के साथ एक समझौता किया है. उसने तीन जनवरी 2008 को अमेरिका स्थित लिबेनन में मास्कोमा कॉरपोरेशन को जैविक संसाधन हस्तांतरित करने के लिए समझौते की यह प्रक्रिया पूरी की.

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सार-संक्षेप

केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा में गुणात्मक सुधार और उसे रोचक बनाने के प्रयास में अरबों रुपए ख़र्च करने के बाद भी राज्य में सैटेलाईट के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा (एडूसेट) की योजना पूरी तरह नाकाम हो गई है. इस योजना को सर्वप्रथम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सीधी ज़िले में, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रारंभ किया था.

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विशेषज्ञों की परामर्श सेवा पर पौने दो अरब रूपए खर्च

मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग ने तकनीकी विशेषज्ञों की परामर्श सेवा लेने के लिए पौने दो अरब रूपए खर्च करके परामर्श सेवा कंपनियों को तो मालामाल कर दिया, लेकिन इस सेवा से राज्य को कितना लाभ मिला, इस बारे में विभाग कुछ भी बताने को तैयार नहीं है. आरोप है कि मध्य प्रदेश का जल संसाधन विभाग कुछ अफसरों की सनक पर चलता है. चूंकि राजनेता ज़्यादा समझदार और चुस्त नहीं हैं, इसलिए विभाग में अफसरों की ही मनमानी चलती है.

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