किसकी मिलीभगत से चल रहा है नकली नोट का खेल

आरबीआई के मुताबिक़, पिछले 6 सालों में ही क़रीब 76 करोड़ रुपये मूल्य के नक़ली नोट ज़ब्त किए गए हैं. ध्यान दीजिए, स़िर्फ ज़ब्त किए गए हैं. दूसरी ओर संसद की एक समिति की रिपोर्ट कहती है कि देश में क़रीब एक लाख 69 हज़ार करोड़ रुपये के नक़ली नोट बाज़ार में हैं. अब वास्तव में कितनी मात्रा में यह नक़ली नोट बाज़ार में इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इसका कोई सही-सही आंकड़ा शायद ही किसी को पता हो.

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माननीयों की मनमानी: एक और ज़मीन घोटाला

महाराष्ट्र में घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा. माननीयों के कारनामों की फेहरिस्त कितनी लंबी है, इसका अंदाज लगा पाना मुश्किल है. ऐसा लगता है कि घोटालों के मामले में राज्य सरकार किसी भी सूरत में केंद्र सरकार से पीछे नहीं रहना चाहती है.

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पूंजी बाज़ार

फिर भी, मान लीजिए आपके पास थोड़े रुपये फालतू पड़े हुए हैं, तो आप उनका किस तरह से इंवेस्टमेंट करते हैं, इसकी चालू प्रणाली कैसी है, इसका ज़रा अवलोकन कर लें. जहां आपका रुपया काम में लाया जाता है या इंवेस्ट होता है, उस संस्था को पूंजी बाज़ार कहते हैं. कहते हैं, फिर भी यह कोई इस तरह का बाज़ार नहीं है जहां हाट लगी हो.

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ग्राम सभा को मज़बूत बनाएं

स्वराज की अवधारणा असल में पंचायती राज संस्था की नींव पर ही टिकी है यानी जितनी सशक्त पंचायती राज संस्था होगी, उतनी ही ज़्यादा संभावना ग्राम स्वराज के मज़बूत होने की बनेगी. गांधी जी भी चाहते थे कि शासन की सबसे छोटी इकाई यानी पंचायती राज के ज़रिए ही गांवों का विकास हो.

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खादी ग्रामोधोग आयोग: खादी की दुर्दशा का ज़िम्मेदार है

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस खादी को देश में स्वरोजगार पैदा करने का माध्यम बनाया था, उसी देश में आज़ादी के 64 साल बाद खादी ग्रामोद्योग आयोग की हालत बद से बदतर होती जा रही है.हर साल 2 अक्टूबर गांधी जयंती, 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस को ही खादी के कपड़े नज़र आते हैं.

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भूखों की रोटी कहां है

यूं तो भारत को विकासशील देशों की श्रेणी में अगला स्थान हासिल है, लेकिन फिर भी कुछ आंकड़े ऐसे हैं, जो इस सच को ठुकराने लगते हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में भूखे लोगों की संख्या बढ़कर 6.3 करोड़ हो गई है. एक ग़ैर सरकारी संस्था द्वारा जारी सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कहा गया है कि खराब आहार प्रणाली और खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों के कारण भूखे लोगों की गिनती बढ़ती जा रही है.

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हाथों में हुनर, दिल में खवाब

मीरा सिंह बताती है कि संस्था की प्रमुख ईशा सिंह के सहयोग से हम लोग लड़कियों के हाथों में न केवल हुनर देने का काम करते हैं, बल्कि उनमें आत्मविश्वास भरने का काम भी करते हैं. कोशिश होती है कि लड़कियों को इस तरह तैयार किया जाए, ताकि वह जीवन की किसी भी चुनौती का सामना कर सके. उनके दिलों में कुछ बड़ा काम करने का ख्वाब पैदा किया जाता है, ताकि वह अपने परिवार व जमुई का नाम रोशन कर सकें.

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समाजसेवा में श्रिया की रूचि

एक्टिंग को स़िर्फ अपना प्रोफेशन मानने वाली श्रिया शरण सामाजिक कार्यों में काफी रुचि रखती हैं. बच्चों से जुड़ी संस्थाओं के साथ-साथ वह निजी तौर पर भी ग़रीब बच्चों के बीच अनाथालय आदि में जाती रहती हैं. उनका मानना है कि इंसान स़िर्फ पैसा कमाने में जीवन की मंजिल नहीं पा सकता, न ही उसे स़िर्फबहुत सारा पैसा कमाकर संतुष्ट हो जाना चाहिए.

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ऊर्जा क्षेत्र में मचा घमासान

देश के ऊर्जा क्षेत्र के सामने मौजूद चुनौतियों की कोई कमी नहीं है. लेकिन सरकार को इस क्षेत्र में देश की शीर्ष नीति नियामक संस्था सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सीईए) में चल रहे घालमेल का जवाब तलाशना ही होगा. सूत्रों के मुताबिक़ सीईए के सदस्य गुरदयाल सिंह को संस्था का कार्यकारी अध्यक्ष बनाये जाने के बाद कई लोग विद्रोह पर उतारू हो गए हैं.

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नौकरशाहों की लोकतंत्र में आस्था नहीं

देश के आला अफसरों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई आस्था नहीं है. नौकरशाह मनमाने ढंग से प्रशासन चलाना चाहते हैं और चला भी रहे हैं. संवैधानिक बाध्यता के कारण विधानसभा एवं मंत्री परिषद आदि संस्थाओं की कार्यवाही में वे औपचारिकता ही पूरी करते हैं.

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जातिगत आरक्षण : व्यवस्थागत खामियों का प्रतिबिंब

सरकारी एवं ग़ैर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा बार-बार हमारे सामने आता रहा है. ठीक उसी दैत्य की तरह, जो हर बार अपनी राख से ही दोबारा पैदा हो जाता है. इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की ज़रूरत है. हमें यह सोचना होगा कि क्या आरक्षण वाकई ज़रूरी है.

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विंध्‍य हर्बल सफल सहकारी संस्‍था

सरकारी प्रयासों से जनकल्याण के काम बिना रुकावट पूरे होते रहें, यह लगभग असंभव बात मानी जाती है. पर जब आप मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के द्वारा बनाई गई विंध्य हर्बल संस्था के कामकाज को देखेंगे तो मानेंगे कि जनकल्याण के लिए सरकारी प्रयासों की कमी नहीं है. विंध्य हर्बल संस्था प्रदेश स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी आयुर्वेदिक औषधियों से संबंधित संग्रहण, उत्पादन, शोधन, दवा निर्माण एवं उसकी बिक्री का काम करती है.

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अनाथ बच्चों का दर्द

बुलबुल अनाथ हो गया. कोसी ने उसका सबकुछ छीन लिया. पिछले साल जब देश कोसी की प्रलयंकारी बाढ़ के कारण फैली तबाही के गम में डूबा था, उस समय बुलबुल के अलावा अठारह और अभागे बच्चे सिर से मां बाप का साया उठ जाने का मातम मना रहे थे.

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