न थकेंगे, न झुकेंगे

आखिर अन्ना हज़ारे क्या हैं, मानवीय शुचिता के एक प्रतीक, बदलाव लाने वाले एक आंदोलनकारी या भारतीय राजनीति से हताश लोगों की जनाकांक्षा? शायद अन्ना यह सब कुछ हैं. तभी तो इस देश के किसी भी हिस्से में अन्ना चले जाएं, लोग उन्हें देखने-सुनने दौड़े चले आते हैं? उनकी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर कई राजनेताओं को रश्क होता होगा.

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गुजरात चुनाव सब की परीक्षा लेगा

गुजरात विधानसभा चुनाव किसके लिए फायदेमंद होगा और किसके लिए नहीं, यह तो आख़िरी तौर पर दिसंबर के आख़िरी हफ्ते में पता चलेगा, जब परिणाम आ जाएंगे. लेकिन परीक्षा किस-किस की है, इसका आकलन करना ज़रूरी है. गुजरात विधानसभा चुनाव में पहली परीक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की है. कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के अलावा कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसके जाने से भीड़ इकट्ठी हो सके. यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा में भी सारे ख़र्चों और सारी कोशिशों के बावजूद लोगों की संख्या कुछ हज़ारों तक सीमित रहती है.

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स़िर्फ बोलने के लिए बोलना!

इन दिनों जितना बोला जा रहा है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं बोला गया. कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, समझ में नहीं आ रहा. बोला जाना चीखे जाने में तब्दील हो चुका है. लोग इतनी ताक़त से माइक में चिल्ला रहे हैं कि बोला जाना शोर मचाने की श्रेणी में आ गया है.

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