भविष्य के भ्रष्टाचारियों के कुतर्क

बहुत चीजें पहली बार हो रही हैं. पूरा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. पहले भ्रष्टाचार का नाम लेते थे, तो लोग अपने आगे भ्रष्टाचारी का तमगा लगते देख भयभीत होते हुए दिखाई देते थे, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी बोलता है, उसे अजूबे की तरह देखा जाता है. राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए लोग चाहते हैं कि यह आवाज़ या इस तरह की आवाज़ें न निकलें और जो निकालते भी हैं, उनके असफल होने की कामना राजनीतिक दल करते हैं और राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इसका उपाय बताते हैं कि भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोग कैसे असफल होंगे.

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उपभोक्‍ता कानून और हम: जागो, ग्राहक जागो

बढ़ते बाज़ारवाद के दौर में उपभोक्ता संस्कृति तो देखने को मिल रही है, लेकिन उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी है. आज हर व्यक्ति उपभोक्ता है, चाहे वह कोई वस्तु खरीद रहा हो या फिर किसी सेवा को प्राप्त कर रहा हो. दरअसल, मुना़फा़खोरी ने उपभोक्ताओं के लिए कई तरह की परेशानियां पैदा कर दी हैं. वस्तुओं में मिलावट और निम्न गुणवत्ता की वजह से जहां उन्हें परेशानी होती है, वहीं सेवाओं में व्यवधान या पर्याप्त सेवा न मिलने से भी उन्हें द़िक्क़तों का सामना करना प़डता है. हालांकि सरकार कहती है, जब आप पूरी क़ीमत देते हैं तो कोई भी वस्तु वज़न में कम न लें.

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कर्ज का कुचक्र और किसान

बीते 22 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद जनपद की तहसील रुदौली के सिठौली गांव में ज़मीन नीलाम होने के डर के चलते किसान ठाकुर प्रसाद की मौत हो गई. ठाकुर प्रसाद का बेटा अशोक गांव के एक स्वयं सहायता समूह का सदस्य था. उसने समूह से कोई क़र्ज़ नहीं लिया था. समूह के जिन अन्य सदस्यों ने क़र्ज़ लिया था, उन्होंने अदायगी के बाद नो ड्यूज प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया था.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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इतिहास का ड्राफ्ट

वर्ष 2000 में जब बिहार से अलग हटकर झारखंड राज्य अस्तित्व में आया था, उस व़क्त उम्मीद जगी थी कि इलाक़े के आदिवासियों का समुचित विकास होगा और उनकी समस्याओं पर बेहतर तरीक़े से ध्यान दिया जाएगा.

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मुद्रा की शक्ति और उसकी मान्यता

भारत को आज़ाद हुए 12 साल बीत गए. इन 12 वर्षों में 5 या 6 वित्त मंत्री बदल चुके हैं. हर मंत्री की मुद्रा नीति भिन्न-भिन्न थी.

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दिल्‍ली का बाबू : सीआईसी की परेशानी

केंद्रीय सूचना आयोग में सूचना आयुक्त के दो पद खाली पड़े हैं, लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है. सूत्रों का कहना है कि नियुक्ति में देरी का कारण प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की व्यस्तता है, इसलिए निर्णय नहीं हो पा रहा है.

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उत्तर प्रदेशः दिल्‍ली के ताज पर मुलायम की नजर

मुलायम सिंह यादव ने बेटे अखिलेश को उत्तर प्रदेश का ताज दिलाकर अपना धर्म-कर्म पूरा कर दिया. अब अखिलेश यादव की पुत्र धर्म निभाने की बारी है. समाजवादी पार्टी के तमाम नेता चाहते हैं कि वर्षों से प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे उम्रदराज़ मुलायम के लिए अखिलेश राह निष्कंटक बनाएं. इसके लिए ठीक वैसी ही तैयारियां शुरू की जाएं, जैसी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मुलायम सिंह यादव ने की थीं.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह ग्राम सभा, मोहल्ला सभा और स्वराज

इस बार पर्चे की शुरुआत मैं शिकायत से शुरू करना चाहता हूं. हमने चर्चा समूह की शुरुआत दोतरफा संवाद शुरू करने के लिए की थी, ताकि हम अपनी बात आप तक पहुंचा सकें और आप अपनी बात हम तक पहुंचा सकें. मुझे शिकायत है कि आप लोगों की तऱफ से बहुत कम प्रतिक्रिया आ रही है. पिछले हफ्ते हमने चर्चा की कि किस तरह झारखंड के कई स्कूलों में अध्यापकों की संख्या कम है, शहरों में सरकार द्वारा नियुक्त सफाई कर्मचारी अपने काम पर नहीं आते, इन समस्याओं का क्या समाधान है, इस पर चर्चा करें.

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युवा भ्रष्‍टाचार को लेकर चिंतित हैं

देश का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि युवा वर्ग हमेशा से अपने हक़ के लिए ल़डता रहा है. संचार के इस युग में भी युवाओं में इस लक्षण को देखा जा रहा है. दुनिया एक प्लेटफॉर्म तक सीमित होकर रह गई है, जहां से सूचनाओं का संचार व्यापक स्तर पर हो रहा है.

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सांसद निधि के पैसों का क्या हुआ

विकास कार्य के लिए आपके सांसद को हर साल करोड़ों रुपये मिलते हैं, जिसे सांसद स्थानीय विकास फंड कहा जाता है. इस फंड से आपके क्षेत्र में विभिन्न विकास कार्य किए जाने की व्यवस्था होती है. क्या कभी आपने अपने लोकसभा क्षेत्र में सांसद निधि से हुए विकास कार्यों के बारे में जानने की कोशिश की? क्या आपने कभी यह सवाल पूछा कि आपके इलाक़े में सांसद फंड से कितना काम हुआ है?

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भारत यानी डॉ. जैकेल और मिस्टर हाइड

पाकिस्तान भारत की तरह किस मायने में समान है? इसमें कोई शक नहीं कि वह क्रिकेट में बेहतर है. इंग्लैंड से हुए मुक़ाबले में उसे जीत मिली, जबकि ऑस्ट्रेलिया में भारत का सूपड़ा सा़फ हो गया. जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है तो निश्चित तौर पर वह भी भारत के सुप्रीम कोर्ट की तरह अच्छा है.

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पूर्वांचल के बुनकरों का दर्दः रिश्‍ता वोट से, विकास से नहीं

केंद्र की यूपीए सरकार से पूर्वांचल के लगभग ढ़ाई लाख बुनकरों को का़फी उम्मीदें थीं. बुनकरों के लिए करोड़ों रुपये के बजट का ऐलान सुनते ही बुनकरों को यक़ीन हो गया कि उनकी हालत अब सुधरने वाली है, लेकिन जब हक़ीक़त सामने आई तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे.

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जब पीआईओ सूचना न दे

एक आरटीआई आवेदक के लिए सबसे बड़ी समस्या होती है सूचना का न मिलना, ग़लत सूचना मिलना या आधी-अधूरी सूचना मिलना. ज़ाहिर है, इसके पीछे लोक सूचना अधिकारी यानी पीआईओ की लापरवाही या जानबूझ कर सूचना न देने की मंशा होती है. कई बार आवेदकों को परेशान करने के लिए भी ऐसा किया जाता है.

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बेकारी की समस्या

सामान वित्त वितरण तो दरकिनार, आज तो भारत में सबसे बड़ी समस्या बेकारी की है. तृतीय पंचवर्षीय योजना सफलतापूर्वक संपादित हो जाने के बाद भी योजना आयोग को आशा है कि 2 करोड़ नए रोज़गार पैदा हो जाएंगे

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लोकपाल समस्या का समाधान नहीं है

जब हमने समाज में सुधार के लिए संसदीय लोकतंत्र को स्वीकार कर लिया है तो फिर इसके लिए किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी करने की आवश्यकता नहीं है. हमें सांसदों और विधायकों की गुणवत्ता में सुधार के लिए लगातार प्रयास करना है, जिससे शासन की गुणवत्ता में सुधार होगा.

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ग़रीबी घटाने के लिए रणनीति बदलनी होगी

अन्ना हजारे एक टेलीविजन कार्यक्रम में गए और उन्होंने कहा कि भारत में दो तरह के लोग हैं. पहले तरह के लोग वे हैं, जो कहते हैं कि क्या खाऊं, मतलब यह कि उनके पास खाने को इतना कम है कि उन्हें यह सोचना पड़ता है कि वे क्या खाएं. दूसरे तरह के लोग वे हैं, जो कहते हैं कि क्या-क्या खाऊं, मतलब यह कि उनके पास खाने की इतनी चीजें उपलब्ध हैं कि उन्हें उनमें चुनना पड़ता है कि क्या-क्या खाएं.

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जैविक खेती समय की जरूरत

राजस्थान के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे. खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे नहीं है. शेखावाटी में आए इस बदलाव के पीछे मोरारका फाउंडेशन की वर्षों की मेहनत है.

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पाकिस्तान में स्थानीय निकायों की बदहाली

विकेंद्रीकरण संघीय व्यवस्था को एक मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन पाकिस्तान में तो विकेंद्रीरण कहीं दिखता ही नहीं है. सवाल यह है कि क्या राज्य सभी शक्तियां अपने पास रखने का अधिकारी है और वह स्थानीय निकायों को कोई भी अधिकार देना अस्वीकार कर सकता है? 18वें संविधान संशोधन के अनुसार, अनुच्छेद 270-एए का क्लॉज-1 लोकल गवर्नमेंट ऑर्डिनेंस 2001 को निरस्त करता है.

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लद्दाख का बदलता पर्यावरण

प्रदूषण वायु, जल और धरती की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का एक ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है, जो जीवन को हानि पहुंचा सकता है. दुनिया भर में हो रहे तथाकथित विकास की प्रक्रिया ने प्रकृति एवं पर्यावरण के सामंजस्य को झकझोर दिया है. इस असंतुलन के चलते लद्दा़ख जैसे सुंदर क्षेत्र भी प्रदूषण जैसी समस्या से प्रभावित हुए हैं.

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आज उदयन होते तो क्या करते

नई पीढ़ी के पत्रकारों और पाठकों के लिए उदयन शर्मा को जानना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों वर्ग आज पत्रकारिता के उस स्वरूप से रूबरू हो रहे हैं, जहां स्थापित मूल्यों में क्षरण देखने को मिल रहा है. उद्देश्य में भटकाव और विचलन की स्थिति है. युवा वर्ग के साथ ही वह पीढ़ी भी, जिसने कभी रविवार और उदयन शर्मा के धारदार लेखन को पढ़ा, देखा या उसके बारे में जाना है, पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नज़र नहीं आ रही है.

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आपकी समस्याएं और सुझाव

आपके पत्र हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. इस अंक में हम उन पाठकों के पत्र शामिल कर रहे हैं, जिन्होंने बताया है कि आरटीआई के इस्तेमाल में उन्हें किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है और सूचना अधिकार क़ानून को लेकर उनके अनुभव क्या हैं. इसके अलावा इस अंक में मनरेगा योजना और जॉब कार्ड से संबंधित एक आवेदन भी प्रकाशित किया जा रहा है, ताकि आप इसका इस्तेमाल समाज के ग़रीब तबक़े के हित में करके भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारने की एक कोशिश कर सकें.

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बुंदेलखंड : पैकेज के बावजूद बदहाली बरकरार

देश के बीमारू राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश के सात ज़िलों में फैला बुंदेलखंड आज भी जल, ज़मीन और जीने के लिए तड़पते लोगों का केंद्र बना हुआ है. रोज़ी-रोटी और पानी की विकट समस्या से त्रस्त लोग पलायन के लिए मजबूर हैं. प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का आठवां हिस्सा खुद में समेटे यह समूचा अंचल भूमि के उपयोग-वितरण, सिंचाई, उत्पादन, सूखा, बाढ़ और आजीविका जैसे तमाम मामलों में बहुत पीछे है.

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आवासीय ईलाकों में गैरकानूनी व्यवसायिक गतिविधियां

यह समस्या लगभग हर छोटे-बड़े शहर की है. आवासीय-रिहायशी इलाक़ों में लालची और स्वार्थी क़िस्म के लोग ऐसे-ऐसे व्यवसाय शुरू कर देते हैं, जिनकी वजह से उस इलाक़े में रहने वाले लोगों के लिए कई सारी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं. मसलन, जहां अवैध गोदाम, पार्किंग, मोटर वर्कशॉप चल रहे हैं, जिनकी वजह से वहां प्रदूषण तो बढ़ ही रहा है, साथ ही वहां रहने वाले लोग भी परेशान रहते हैं.

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आपका और आपकी मुस्कराहट का शुक्रिया

अपने साथियों पर लिखना या टिप्पणी करना बहुत दु:खदायी होता है, क्योंकि हम इससे एक ऐसी परंपरा को जन्म देते हैं कि लोग आपके ऊपर भी लिखें. आप उन्हें आमंत्रित करते हैं. मैं यही करने जा रहा हूं. मैं अपने साथियों को आमंत्रित करने जा रहा हूं कि हमारे ऊपर जहां उन्हें कुछ ग़लत दिखाई दे, वे लिखें.

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सरकारी स्कूलों का लें हिसाब

शिक्षा का अधिकार क़ानून के तहत छह साल से लेकर 14 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा उनका मौलिक अधिकार होगा. इस क़ानून से उन करोड़ों बच्चों को फायदा मिलेगा, जो स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्राथमिक स्कूलों की मौजूदा संख्या पर्याप्त है? शायद नहीं.

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जलवायु परिवर्तनः सबसे ज़्यादा असर ग़रीबों पर

इस बात से सभी सहमत हैं कि हमारे वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि ही जलवायु परिवर्तन की वजह है. इस नीले ग्रह (पृथ्वी) पर जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी यही है. यदि कोई संदेह रह गया है तो भारत में मानसून की आंख मिचौली और पूरी दुनिया में जलवायु का अनिश्चित व्यवहार इसके प्रमाण हैं.

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समस्याएं अनेक समाधान एक

आज देश में एक धारणा बन गई है कि किसी भी सरकारी कार्यालय में बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं कराया जा सकता है. बहुत हद तक यह विचार सही भी है, क्योंकि भ्रष्टाचार उस सीमा तक पहुंच गया है, जहां एक ईमानदार आदमी का ईमानदार बने रह पाना मुश्किल हो गया है. लेकिन इस भ्रष्ट व्यवस्था में भी आप यदि चाहें तो अपना काम बिना रिश्वत दिए करा सकते हैं.

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व्यक्ति और समाज

मान लीजिए देश की समस्त संपत्ति आपके हाथ में सौंप दी जाए और कह दिया जाए कि आप उचित ढंग से उसका वितरण कर दीजिए. आप बंटवारा किस ढंग से करेंगे? एक बार आप अपने परिवार के आदमियों और इष्ट मित्रों को भूल जाइए, क्योंकि आप वितरणकर्ता हैं. तो लाज़िमी तौर पर आपको पक्षपात रहित होकर सर्वसाधारण को एक समान मानकर वितरण करना होगा. आपको पंच परमेश्वर का बाना पहनना होगा.

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