ग़रीबों के लिए नहीं है गोरखपुर मेडिकल कॉलेज

नवगठित मोदी सरकार ने देश के सभी सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाएं मुफ्त देने की बात कही थी, लेकिन बाबा

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दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती? यानी दवा इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी बदन दर्द के नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर.

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कश्मीर और कश्मीरियों से दिल का रिश्ता जोड़िए

कश्मीर हमारे लिए कभी प्राथमिकता नहीं रहा. कश्मीर की क्या तकली़फ है, वह तकली़फ क्यों है, उस तकली़फ के पीछे की सच्चाई क्या है, हमने कभी जानने की कोशिश नहीं की. हमने हमेशा कश्मीर को सरकारी चश्मे से देखा है, चाहे वह चश्मा किसी भी सरकार का रहा हो. हम में से बहुत कम लोग श्रीनगर गए हैं. श्रीनगर में पर्यटक के नाते जाना एक बात है और कश्मीर को समझने के लिए जाना दूसरी बात है.

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जेलों में बढ़ती मुसलमानों की आबादी

आज से 65 वर्ष पूर्व जब देश स्वतंत्र हुआ था तो सबने सोचा था कि अब हम विकास करेंगे. आज़ाद देश में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की जाएगी. छुआछूत, जाति-पांत और भेदभाव का अंत होगा. हर धर्म से जुड़े लोग एक भारतीय के रूप में आपस में भाईचारे का जीवन व्यतीत करेंगे. धार्मिक घृणा को धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान प्राप्त नहीं होगा. यही ख्वाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था और यही आश्वासन संविधान निर्माताओं ने संविधान में दिया था, लेकिन आज 65 साल बीत जाने के बाद यह देखकर पीड़ा होती है कि जाति-पांत की सियासत हमारे देश की नियति बन चुकी है.

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स्कूल की हालत कैसे सुधरेगी

सरकारी स्कूल इस देश के करोड़ों बच्चों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं हैं. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के लिए बहुत ही मुश्किल है, जो रोज़ाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर अपना जीवन यापन करती है.

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एक आवेदन से समाधान मिल जाएगा

आज देश में एक धारणा बन गई है कि किसी भी सरकारी कार्यालय में बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं कराया जा सकता है. बहुत हद तक यह विचार सही भी है, क्योंकि भ्रष्टाचार उस सीमा तक पहुंच गया है, जहां एक ईमानदार आदमी का ईमानदार बने रह पाना मुश्किल हो गया है. लेकिन इस भ्रष्ट व्यवस्था में भी आप यदि चाहें तो अपना काम बिना रिश्वत दिए करा सकते हैं.

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कश्मीर में नशे की फ़सल

धरती का स्वर्ग कहलाने वाला कश्मीर अ़फग़ानिस्तान की राह पर चल पड़ा है. क्षेत्र में नशे की खेती जोर पकड़ती जा रही है. नशे का सेवन न स़िर्फ एक गंभीर समस्या है, बल्कि इसका कारोबार और उत्पादन ग़ैरक़ानूनी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2010 में पुलिस ने 8831.5 कनाल भूमि पर फैली नशे की खेती नष्ट की. 2011 में 7444 कनाल भूमि पर की जा रही अवैध खेती नष्ट की गई.

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बिहार: एसी-डीसी बिल : सीबीआई जांच की तलवार

पटना उच्च न्यायालय के बाद बिहार में एसी-डीसी बिल में 67 हज़ार करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में गूंज रहा है. आम भाषा में समझें तो यह मामला खर्च के लिए सरकारी खज़ाने से निकाली गई राशि का हिसाब न देने का है. इसे लेकर सरकार पर घोटाले का शक किया जा रहा है.

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राजनीति में नैतिकता बहुत ज़रूरी

पिछले साल देश भ्रष्टाचार और विदेश में रखे काले धन की चर्चा में व्यस्त रहा. कुछ मंत्री जेल गए और अन्ना हज़ारे ने भ्रष्टाचार के खिला़फ आंदोलन शुरू किया. हालांकि भ्रष्टाचार एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, देश में रोजग़ार के अवसरों का अभाव.

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बेहतर स्वास्थ्य सेवा कैसे मिलेगी

पिछले अंक में हमने आपको बताया था कि सूचना अधिकार क़ानून का इस्तेमाल करके आप किस तरह सरकारी अस्पतालों से मुफ्त या कम दामों पर दवाइयां प्राप्त कर सकते हैं. इस बार हम आपको बता रहे हैं कि सरकारी अस्पतालों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर सूचना अधिकार क़ानून किस तरह आपकी मदद कर सकता है.

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मनरेगा : सरकारी धन की बंदरबाट

नक्सलवाद, भौगोलिक स्थिति और पिछड़ापन आदि वे कारण हैं, जो विंध्याचल मंडल को प्रदेश के विकसित हिस्सों से अलग करते हैं. मंडल के तीन ज़िलों में से एक भदोही को विकसित कहा जा सकता है, किंतु कालीन उद्योग में आई मंदी ने जनपद की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया.

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जब सरकारी अस्पताल में दवा न मिले

गरीबों के लिए महंगा इलाज करा पाना या महंगी दवाइयां ख़रीद पाना आसान नहीं होता. इसके लिए सरकार ने सरकारी अस्पताल और सरकारी डिस्पेंसरी (दवाखाना) की व्यवस्था की है, लेकिन देश के कुछ राज्यों में सरकारी अस्पताल का नाम लेते ही एक बदहाल सी इमारत की तस्वीर जेहन में आ आती है.

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भ्रष्टाचार का चस्का और आम आदमी

सही मायनों में अपनी आवाज़ को सीधे संवाद के ज़रिये जन-जन तक पहुंचाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम आज भी नाटक को ही माना जाता है. नाटक मंचन और इसी की एक विधा नुक्कड़ नाटकों के ज़रिये न स़िर्फ दर्शकों से सीधा संवाद होता है, बल्कि उसी व़क्त नाटक की विषयवस्तु से संबंधित सारी जानकारी भी मिल जाती है.

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घूस का जवाब आरटीआई

घूस का जवाब आरटीआई. चौंकिए मत. यही इलाज है भ्रष्ट और रिश्वत़खोर कर्मचारियों का जो आपसे किसी भी काम के बदले घूस की मांग करते हैं. हर आम या खास आदमी का पाला कभी न कभी, किसी न किसी सरकारी विभाग से प़डता ही है.

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स्कूल की इमारत ख़स्ताहाल क्यों है

सरकारी स्कूल देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण जगह है. यह छात्रों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के वश की बात नहीं, जो रोजाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर जीवनयापन करती है.

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पाठकों के पत्र समस्या और सुझाव

शहर हो या गांव, सरकारी विभागों को लेकर हर आदमी की परेशानी एक सी होती है. कभी बिजली विभाग, कभी जल विभाग, कभी टेलीफोन विभाग. चूंकि इन सभी विभागों से आपका साबका पड़ता है और जब कोई काम समय से न हो रहा हो, तब परेशान होना स्वाभाविक है.

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वक्त की नज़ाकत को समझने की ज़रूरत

2 अक्टूबर बीत गया. पहली बार देश में 2 अक्टूबर सरकारी फाइलों और सरकारी समारोहों से बाहर निकल करके लोगों के बीच में रहा. लोगों ने गांधी टोपी लगाकर महात्मा गांधी को याद किया. न केवल महात्मा गांधी को याद किया, बल्कि उनके विचारों के ऊपर चर्चाएं कीं, सेमिनार किए. 2 अक्टूबर बीतने के बाद ऐसा लग रहा है कि इस देश में बहुत सालों के बाद गांधी का नाम गांधीवादियों द्वारा नहीं, बल्कि गांधी के विचारों की ताक़त के आधार पर लोगों के मन में घर कर रहा है.

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दिल्‍ली का बाबूः कैसे घटेगा सरकारी खर्च

वित्त मंत्री प्रणब दा इन दिनों खासे परेशान हैं. उनकी परेशानी की वजह विपक्षी दल नहीं, बल्कि बढ़ रहा सरकारी खर्च है. उन्होंने केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों के लिए एक सर्कुलर भी जारी किया है, जिसमें फिजूलखर्ची पर ध्यान देने की हिदायत दी गई है.

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सरकारी लोकपाल बनाम जन लोकपाल

आखिर क्या है जन लोकपाल? क्यों सरकार जन लोकपाल को लेकर परेशान है? असल में जन लोकपाल बिल एक ऐसा क़ानून है, जो भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के लिए किसी ताबूत से कम नहीं साबित होगा. पिछले 42 सालों में यह विधेयक कई बार क़ानून बनते-बनते नहीं बन पाया. यूपीए सरकार ने बिल का मसौदा तैयार तो किया, लेकिन सिविल सोसायटी के लोग और अब तो आम आदमी भी बिल के प्रावधानों से खुश नहीं है.

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सरकारी भूमि पूजन का औचित्या

पुलिस स्टेशनों, बैंकों एवं अन्य शासकीय-अर्द्ध शासकीय कार्यालयों एवं भवनों में हिंदू देवी-

देवताओं की तस्वीरें-मूर्तियां आदि लगी होना आम बात है. सरकारी बसों एवं अन्य वाहनों में भी देवी-देवताओं की तस्वीरें अथवा हिंदू धार्मिक प्रतीक लगे रहते हैं. सरकारी इमारतों, बांधों एवं अन्य परियोजनाओं के शिलान्यास एवं उद्घाटन के अवसर पर हिंदू कर्मकांड किए जाते हैं.

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सरकारी भूमि पूजन का औचित्‍य

पुलिस स्टेशनों, बैंकों एवं अन्य शासकीय-अर्द्ध शासकीय कार्यालयों एवं भवनों में हिंदू देवी- देवताओं की तस्वीरें-मूर्तियां आदि लगी होना आम बात है. सरकारी बसों एवं अन्य वाहनों में भी देवी-देवताओं की तस्वीरें अथवा हिंदू धार्मिक प्रतीक लगे रहते हैं.

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आख़िर स्कूल बदहाल क्यों?

सरकारी स्कूल इस देश के करोड़ों बच्चों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं हैं. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के लिए बहुत ही मुश्किल है, जो रोजाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर अपना जीवनयापन करती है.

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सरकारी संरक्षण में चल रहा है अवैध खनन

मध्य प्रदेश की खनिज सम्पदा पर लगातार डकैती डालने का सिलसिला जारी है. देश भर के खनिज मा़फिया से संबंधित व्यक्ति इन दिनों कटनी व जबलपुर क्षेत्र के खदान क्षेत्रों में सक्रिय हैं. यहा कायम किए गए एक आपराधिक तंत्र के भरोसे बिना रॉयल्टी चुकाये अवैध रूप से उत्खनन का सिलसिला जारी है

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सरकारी रिकॉर्ड से गायब बस स्‍टैंड और जमीन

बिलासपुर शहर के पंडरी स्थित नए बस स्टैंड का सरकारी रिकॉर्ड मे कोई अता-पता नहीं मिल रहा. आश्चर्य है कि नगर का एक बस स्टैंड सरकारी रिकॉर्ड में लापता है और राजस्व नजूल और लगभग सभी सरकारी विभाग इस बस स्टैंड को खोजने में लगे हुए हैं.

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सरकारी घोषणाएं कहां और क्यों गुम हो जाती हैं?

आमतौर पर एक सरकार जनता की सुविधाओं के लिए कोई योजना बनाती है या उसकी घोषणा करती है और बाद की कोई सरकार आकर उस योजना को ठंडे बस्ते में डाल देती है. इसके अलावा कई मौक़ों पर (ख़ासकर किसी आपदा के व़क्त) सरकार की तऱफ से मदद की घोषणा की जाती है, लेकिन व़क्त बीतने के साथ ही वह अपना वायदा भूल जाती है.

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सरकारी दस्तावेज़ देखना आपका अधिकार है

आरटीआई क़ानून में कई प्रकार के निरीक्षण की व्यवस्था है. निरीक्षण का मतलब है कि आप किसी भी सरकारी विभाग की फाइल, किसी भी विभाग द्वारा कराए गए काम का निरीक्षण कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, यदि आपके क्षेत्र में कोई सड़क बनाई गई है और आप उसके निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री से संतुष्ट नहीं हैं या सड़क की गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं हैं तो आप निरीक्षण के लिए आवेदन कर सकते हैं.

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सरकारी स्कूल : इमारतें जर्जर हालत में हैं, क्यों?

एक अप्रैल (मूर्ख दिवस) का दिन गंभीर नहीं माना जाता. इसी दिन केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार नाम से एक नया क़ानून लोगों को तोह़फे में दिया है. क़ानून के मुताबिक़, छह साल से लेकर 14 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा उनका मौलिक अधिकार होगा. इस क़ानून से क़रीब एक करोड़ ऐसे बच्चों को फायदा मिलेगा, जो स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.

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