आज से तीन तलाक पर खत्म, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

नई दिल्ली। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने तीन तलाक को खत्म कर दिया। अपने

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लोकतंत्र के खलनायक बनने से बचिए

आज आपकी ओर से पूरी राजनैतिक व्यवस्था से बात करेंगे. इसमें सभी राजनैतिक दल, क्या सरकार और क्या विपक्ष, ऐसा हो गया है कि शर्म से कह सकते हैं कि हमाम में सब नंगे हैं. सरकार को एक पैराग्राफ पढ़ने के लिए लिख देते हैं.

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मृत्यु दंड : अमानवीय या ज़रूरत

कैपिटल पनिशमेंट, जिसे मृत्यु दंड या फांसी के नाम से भी जाना जाता है, का मुद्दा उसके समर्थकों और विरोधियों के बीच अक्सर गर्मागर्म बहस का कारण बनता रहा है. मृत्यु दंड के ख़िला़फ तर्क देते हुए एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है, मृत्यु दंड मानवाधिकारों के उल्लंघन की पराकाष्ठा है. वास्तव में यह न्याय के नाम पर व्यवस्था द्वारा किसी इंसान की सुनियोजित हत्या का एक तरीक़ा है.

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दोस्तों ने जॉर्ज को बचाने की अपील की

जॉर्ज फर्नांडिस. एक ऐसा नाम, जो ग़रीब मज़दूरों, दलितों, समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों, मानवाधिकारों और हर तरह के अन्याय के खिला़फ संघर्ष में पिछले क़रीब तीन दशकों से हमेशा सबसे आगे रहा, आज खुद अपनी ज़िंदगी के लिए संघर्ष को मजबूर है. अथवा यूं कहें कि ज़िंदगी नहीं, जॉर्ज अपनी मौत के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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महिलाओं को समान दर्जा समाज की हक़ीक़त नहीं

आज हर कोई भारतीय समाज में महिलाओं को समानता की बात करता है, लेकिन जो बातें की जा रही हैं या जिस बात की वकालत की जा रही है, हक़ीक़त उससे का़फी अलग है. पुरुष प्रधान भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक प्रतिबंधों के चलते महिलाएं हाशिए पर हैं.

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सर्वोच्च न्यायालय का विभाजन : एक खतरनाक खेल

कानून मंत्रालय द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक खंड और अपीलीय खंड में बांटने के मुद्दे का बारीक़ी से परीक्षण किए जाने की ख़बर है. यह विधि आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है. विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को विभाजित करने और संविधान संबंधी मामलों एवं इससे जुड़े दूसरे मसलों को देखने के लिए दिल्ली में एक संवैधानिक पीठ और चार अलग-अलग जगहों पर अभिशून्य पीठ स्थापित करने की अनुशंसा की है.

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बीते साल के न्यायिक फै़सले : कुछ अच्छे तो कुछ बुरे भी

अगर न्यायिक इतिहास की दृष्टि से देखें तो बीते साल 2009 को हम मील के पत्थर के तौर पर याद कर सकते हैं. विगत वर्ष की कुछ न्यायिक प्रगतियों और फैसलों की बात करें तो आने वाले वर्षों में वे न्यायपालिका की दिशा को तय करेंगे. न्यायिक संस्थाओं का अगर एक ओर सम्मान बढ़ा तो दूसरी ओर कुछ ऐसी बातें भी हुईं, जिसने आम आदमी की नज़रों में न्यायपालिका की छवि और प्रतिष्ठा को धूमिल करने का काम किया.

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क्या दया मौत को वैधानिक स्वीकृति मिलनी चाहिए?

देश में मौत का अधिकार दिए जाने की मांग एक बार फिर से सु़र्खियों में है. इस मांग ने सर्वोच्च न्यायालय का भी ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है. मामला 61 वर्षीय एक महिला से जुड़ा है. तक़रीबन 36 साल पहले बर्बर बलात्कार की शिकार यह महिला

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