अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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बैंकों का राष्ट्रीयकरण

पिछले कुछ वर्षों से एक और क़िस्म की बैंकिंग प्रणाली भारत में चालू हुई है. यह है सहकारिता बैंक. कुछ किसान, मज़दूर अथवा उपभोक्ता अपने-अपने सीमित दायरे में सहकारिता बैंक खोल लेते हैं. सारे सदस्य थोड़ा-थोड़ा करके अपना फंड जमा करते हैं. शासन से मान्यता मिलने पर सरकार का सहकारी विभाग उस बैंक को पर्याप्त आर्थिक मदद दे देता है.

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सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.

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