सियासी भविष्य को लेकर चम्पारण के सांसदों में बेचैनी

केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह भाजपा से पूर्वी चंपारण से सांसद हैं. उन्होंने पांचवीं बार मोतिहारी (पू.चम्पारण) संसदीय क्षेत्र में

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स्वास्थ्य मंत्री के क्षेत्र में ही बीमार हैं सरकारी अस्पताल

बक्सर के सांसद तथा केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे के संसदीय क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग लकवाग्रस्त

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जानिए क्यों राजद और शरद दोनों को एक दूसरे की जरूरत है

संजय सोनी : पूरे कोसी में आजकल एक सवाल काफी चर्चा में है. जगह-जगह राजनीतिक मिजाज के लोग एक दूसरे

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मुस्लिम नेता ने पीएम मोदी की तुलना खुदा से की, बताया गांधी के बराबर का नेता!

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभालने से पहले नरेंद्र मोदी की छवि एक मुस्लिम विरोधी नेता की मानी जाती थी।

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चाय पर चर्चा के दौरान मोदी ने किया यूपी के सांसदों का सम्मान, दिया नया टास्क

नई दिल्ली (निरंजन मिश्रा)। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली भारी जीत से खुश प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य के

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पूंजीपतियों ने लूट लिया देश का धन : बैंकों की मिलीभगत से हड़प लिए पांच लाख करोड़ रुपये : असली राष्ट्रद्रोही

मीडिया, राजनीति और कमोबेश पूरा समाज आजकल सांसद व कारोबारी विजय माल्या के 9 हजार करोड़ रुपये के कर्ज को

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जनता को राजग सरकार से बड़ी उम्मीदें : महबूब अली कैसर

चौधरी महबूब अली कैसर खगड़िया से नवनिर्वाचित सांसद हैं. उन्होंने राजग गठबंधन के तहत लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार के

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कुछ ने थामा दल का दामन, कुछ के तेवर बरकरार

मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र में जार्ज के अलावा बिजेंद्र चौधरी भी निर्दलीय उम्मीदवार थे. वह भी पूर्व विधायक हैं. पिछले चुनाव

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प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

सेवा में,

श्रीमान् डॉ. मनमोहन सिंह जी,

प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली.

विषय : गैंगरेप-मानवता को कलंकित करने वाली शर्मनाक घटना घटी और देश की जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया. ऐसे हालात में आम जनता का क्या दोष है?

महोदय,

गैंगरेप की घटना से देशवासियों की गर्दन शर्म से झुक गई.

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए किया, क्योंकि मैं इसकी तह में जाना चाहता था. यह पत्रकारिता नहीं है और अफसोस की बात यह है कि जितना ओछापन भारत की राजनीति में आ गया है, उतना ही ओछापन पत्रकारिता में आ गया है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका ओछापन पूरे समाज को भुगतना पड़ता है. अगर न्यायाधीश ओछापन करें तो उससे देश की बुनियाद हिलती है.

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अन्‍ना हजारे की नाराजगी का मतलब

अचानक ऐसी क्या बात हो गई कि टीम अन्ना और अन्ना के बीच मतभेद सामने आ गए, ऐसा क्या हो गया कि अन्ना इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के लोगों से कहा कि न तो आप मेरे नाम का और न मेरे फोटो का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें दो बातें हैं. राजनीतिक दल बनाने की घोषणा जंतर-मंतर के आंदोलन के दौरान नहीं हुई थी.

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उत्तर प्रदेश : नवरत्‍नों के सहारे कांग्रेस

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कोई भी प्रयोग स़फल नहीं हो पा रहा है. सभी प्रयोग उसके लिए उलटे पड़ रहे हैं. दो दशक से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन कांग्रेस एक बार डूबी तो फिर आज तक उबर नहीं पाई है. इस दौरान सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा सभी ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. प्रदेश की कुर्सी पर कई अध्यक्ष बैठे. सबने बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कोई नहीं बदल पाया.

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देश को विजेता का इंतजार है

अगस्त का महीना भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण रहा. सरकार, विपक्ष, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस महीने के मुख्य पात्र थे. एक पांचवां पात्र भी था, जिसका ज़िक्र हम बाद में करेंगे. इन चार पात्रों ने अपनी भूमिका ब़खूबी निभाई. सरकार और विपक्ष ने अपनी पीठ ठोंकी, दूसरी ओर अन्ना और रामदेव ने अपने आंदोलन को सफल कहा. हक़ीक़त यह है कि ये चारों ही न हारे हैं, न जीते हैं, बल्कि एक अंधेरी भूलभुलैया में घुस गए हैं.

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भारतीय मीडिया संकट के दौर से गुज़र रहा है

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पत्रकारिता साल दर साल परिवर्तित हुई है. अगर हम 1947 में देश को मिली आज़ादी के बाद पिछले 65 सालों की बात करें तो पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए हैं. 1995 के मध्य में सेटेलाइट टीवी हमारे देश में आया. उसके बाद से 24 घंटे चलाए जाने वाले समाचार चैनलों ने अपना एक ब्रांड बनाया है, जिसमें एक ही समाचार बार-बार दिखाया जाता है.

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एंटनी कमेटी की रिपोर्ट : उपेक्षा, गुटबाज़ी और बयानबाज़ी कांग्रेस को ले डूबी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार की समीक्षा कर रही एंटनी कमेटी ने दिल्ली में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को तमाम सिफारिशों और हार के कारणों के ख़ुलासे के साथ सौंप दी. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हार के लिए बड़े नेताओं के नाते-रिश्तेदारों को टिकट देने, ज़मीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, कांग्रेसियों की आपसी गुटबाज़ी और बड़बोलेपन को मुख्य वजह बताया.

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हमारे सांसदों को इतनी इज़्ज़त क्यों चाहिए

बीते एक मई को द डेली मेल के एक पत्रकार क्वेनटीन लेट्‌स ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस के स्पीकर के बारे में एक टिप्पणी की. उन्होंने स्पीकर बेरकाऊ की तुलना एक कार्टून करेक्टर मटले से की, जो हमेशा कंफ्यूज्ड रहता था, जिसके कारण वह कभी सफल नहीं हो पाता था. इसी तरह कुछ साल पहले मैथ्यू पेरिस ने द टाइम्स में पार्लियामेंट्री स्केच नामक कॉलम शुरू किया था.

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पूर्वी चंपारणः महात्‍मा गांधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जनसंघर्ष और नेतागिरी

संघर्ष ज़मीन तैयार करता है और फिर उसी ज़मीन पर नेता अपनी राजनीतिक फसल उगाते हैं. कुछ ऐसा ही हो रहा है मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए बने संघर्ष मोर्चा के साथ. चंपारण की जनता केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दिन-रात एक करके संघर्ष करती है और जब दिल्ली आती है अपनी बात केंद्र तक पहुंचाने, तो वहां मंच पर मिलते हैं बिहार के वे सारे सांसद, जो संसद में तो इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलते, लेकिन जनता के बीच भाषणबाज़ी का मौक़ा भी नहीं छोड़ते.

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आप सांसद हैं, देवता नहीं

हमारे सांसद कुछ ज़्यादा ही सेंसेटिव हो गए हैं. उन्हें लगता है कि वे संसद के लिए चुन लिए गए हैं तो वे लोकतंत्र के देवता हो गए हैं. उन्हें कोई कुछ कह नहीं सकता है. अगर देश में भ्रष्टाचार की बात हो तो सांसदों को लगता है कि उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

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सचिन सांसद बने

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को राज्यसभा सदस्य के रूप में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने मनोनीत कर दिया है. अब सचिन तेंदुलकर संसद सदस्य बन गए हैं. फैंस को सचिन को सांसद के रूप में देखकर हर्ष हो रहा है. राजनीतिक गलियारा इस विषय में दो खेमों में विभाजित है.

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सेक्‍स, सीडी और खिलाड़ी

अभिषेक मनु सिंघवी, कांग्रेस के प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं. इससे भी बड़ा परिचय उनका यह है कि वह सांसद हैं. ऐसे-वैसे सांसद नहीं, बल्कि संसद की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन हैं. वह देश में क़ानून बनाने की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली केंद्र हैं.

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सांसद निधि के पैसों का क्या हुआ

विकास कार्य के लिए आपके सांसद को हर साल करोड़ों रुपये मिलते हैं, जिसे सांसद स्थानीय विकास फंड कहा जाता है. इस फंड से आपके क्षेत्र में विभिन्न विकास कार्य किए जाने की व्यवस्था होती है. क्या कभी आपने अपने लोकसभा क्षेत्र में सांसद निधि से हुए विकास कार्यों के बारे में जानने की कोशिश की? क्या आपने कभी यह सवाल पूछा कि आपके इलाक़े में सांसद फंड से कितना काम हुआ है?

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एक और पीसा

आजकल लंदन की एक पहचान कहे जाने वाले बिग बेन टॉवर के भी झुकने की बात सामने आ रही है. बीबीसी के मुताबिक़, ब्रिटिश सांसदों की एक समिति यह सुनिश्चित करने के लिए उपाय ढूंढ रही है कि आगे यह इमारत झुके नहीं. बिग बेन टॉवर को क्लॉक टॉवर के रूप में भी जाना जाता है.

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उत्तराखंड : कांग्रेस में गुटबंदी थम नहीं रही है

विधानसभा चुनाव सिर पर है, लेकिन पार्टी नेताओं को आपस में लड़ने से फुर्सत नहीं है. कांग्रेस हाईकमान की अब तक की सारी कोशिशें नाकाम सिद्ध हो रही हैं. इस गुटबाज़ी को कांग्रेस के पांच पांडवों में शुमार सांसद विजय बहुगुणा, हरीश रावत, सतपाल महाराज, नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत एवं यशपाल आर्य हवा दे रहे हैं.

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नीतीश को जगदानंद की सलाह

नाटक का पात्र मत बनिए, अज्ञानता के लिए माफी मांगिए. राजद सांसद जगदानंद सिंह कम बोलते हैं, पर जब बोलते हैं तो दो टूक. पिछले चुनाव में जब उन्होंने कहा था कि बेटे का नहीं, पार्टी का साथ दूंगा तो सहसा लोगों को यक़ीन नहीं हुआ, लेकिन जब राजद प्रत्याशी ने उनके पुत्र को हरा दिया तो सूबे की जनता ने माना कि जगदा बाबू जो कहते हैं, वह करते हैं.

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कांग्रेस को दोस्ती निभाना नहीं आता

वे सांसद कहां हैं, जो अन्ना हजारे को यह समझा रहे थे कि संसद की एक गरिमा होती है, उसे बाहर से डिक्टेट नहीं किया जा सकता है. वे आज चुप क्यों हैं? संसद की गरिमा बचाने के लिए, देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए. कैश फॉर वोट भारत के इतिहास का सबसे शर्मनाक स्कैम है. देश के सांसद बिकते हैं, ऐसा सोचकर ही घिन होती है.

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राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्‍ट के बिना यह प्रजातंत्र अधुरा है

अन्ना हजारे मूल बातें कहते हैं, इसलिए बड़े-बड़े विद्वान उनसे बहस नहीं कर सकते. सांसद सेवक हैं और देश की जनता मालिक है. अगर सेवक मालिक की बात न माने तो मालिक को यह हक़ है कि वह उसे बाहर कर दे. यही दलील अन्ना हजारे की है. देश को भ्रष्ट सांसदों से छुटकारा दिलाने के लिए राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की मांग लेकर अन्ना हजारे और उनकी टीम आंदोलन करने वाली है.

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