वजूद खो रही है भाषाएं

जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का खत्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे ब़डा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी.

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आत्‍महत्‍या की कीमत हम सब चुकाते हैं

वर्ष 2006 में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री नवीन जिंदल ने संसद में एक मुद्दा उठाया कि भारतीय छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं की वजह क्या है और सरकार किस तरह आत्महत्या के आंकड़े बढ़ने से रोक सकती है. इसके बाद संसद की तऱफ से कुछ विशेष क़ानून बनाए गए. सबसे पहले तो परीक्षाओं से जुड़ी हेल्पलाइन शुरू की गई, जो परीक्षा से पहले विद्यार्थियों को फोन पर साइकोलॉजिकल एडवाइस देती है.

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वैजयंती माला : अभिनय और नृत्य का संगम

दक्षिण भारत की कई अभिनेत्रियों ने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय की अपिट छाप छो़डी है. उनके सौंदर्य, नृत्य कौशल और अभिनय ने हिंदी सिनेमा के दर्शकों का मन मोह लिया और वे यहां भी उतनी ही कामयाब हुईं, जितनी दक्षिण भारतीय फिल्मों में. इन अभिनेत्रियों की लंबी फेहरिस्त है, जिनमें से एक नाम है वैजयंती माला का. वैजयंती माला में वह सब था, जो उन्हें हिंदी सिनेमा में बुलंदियों तक पहुंचा सकता था.

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मूल्यांकन में आलस क्यों

कौन जानता था कि सिमरिया घाट के बालू की रेत पर खेलने वाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा- लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर तू आंसू के कण बरसाता चल. यह वही बालक था, जो बाद में राष्ट्रकवि बना और जिनका नाम था रामधारी सिंह दिनकर. रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के कवि थे.

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राज कुमार निदेशक बने

1989 बैच के आईडीएसई अधिकारी राज कुमार को शहरी विकास मंत्रालय में निदेशक बनाया गया है. वह अशोक कुमार सरोहा की जगह लेंगे.

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किताबों की दुनिया और बच्चे

दौड़ती-भागती दुनिया और तेज़ी से होता आधुनिकीकरण. बच्चों की तो दुनिया ही बदल गई है. टीवी और इंटरनेट ने उन्हें किताबों और साहित्य से कोसों दूर कर दिया है. ऐसे में केंद्र सरकार ने बच्चों की साहित्यक रूचि का मंच प्रदान करने और वरिष्ठों के बीच बिठाकर उनकी प्रतिभा को निखारने की योजना बनाई है. इसकी शुरुआत राजस्थान माध्यमिक शिक्षा परिषद ने कर भी दी है.

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यात्रा साहित्य माला में एक और मोती

मनुष्य-जातियों का इतिहास उनकी यायावरी प्रवृत्ति से संबद्ध है. यात्रा का मुख्य आकर्षण-बिंदु मनुष्य के सौंदर्य बोध के विकास के साथ-साथ चतुर्दिक्‌ व्याप्त जगत का विस्तार भी है. प्रस्तुत कृति के लेखक अनिल सुलभ ने सौंदर्य बोध की दृष्टि से उल्लास की भावना द्वारा प्रेरित होकर उत्तर और दक्षिण भारत की यात्रा की.

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तेलंगाना : राज्य के नाम पर सियासत

नए राज्य बनाने के लिए देश में अब तक कई आंदोलन हो चुके हैं. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इससे स्थानीय लोगों का विकास होगा और कानून व्यवस्था में सुधार भी. कभी सांस्कृतिक एकता की बात की जाती है तो कभी भाषाई एकता की.

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‘सांस्‍कृतिक क्रांति’ पर बवाल

चौथी दुनिया के अपने इसी स्तंभ में कुछ दिनों पहले मैंने बिहार सरकार के कला और संस्कृति मंत्रालय की कॉफी टेबल बुक-बिहार विहार के बहाने सूबे में सांस्कृतिक संगठनों की सक्रियता, उसमें आ रहे बदलाव और सरकारी स्तर पर उसके प्रयासों की चर्चा की थी.

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बिहार में सांस्कृतिक क्रांति

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि विद्रोह, क्रांति या बग़ावत कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका विस्फोट अचानक होता है. घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है. दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृहराज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती हैं.

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पाटलिपुत्र का दर्द

ईसा से 304 वर्ष पूर्व भारत आए प्रसिद्ध ग्रीक राजदूत मेगास्थनीज ने यदि यह न लिखा होता कि भारत के इस महानतम नगर पाटलिपुत्र (पटना) की सुंदरता और वैभव का मुक़ाबला सुसा और एकबताना जैसे नगर भी नहीं कर सकते, तो शायद आज भारत के गंदे नगरों में गिना जाने वाला पटना कभी इतना सुंदर था, यह मानने के लिए लोग तैयार न होते.

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साहित्यकार फोसवाल में ऊबे दिखे

कला और साहित्य ज़मीन पर खींची गई किसी लकीर के दायरे में नहीं बांधे जा सकते. ऐसा ही कुछ देखने को मिला सार्क देशों से आए साहित्यकारों के सम्मेलन में. लगा जैसे इस कार्यक्रम के लंबे सत्र से अनेक साहित्यकार ऊब गए थे. जो सुबह आए,वे शाम तक रुक नहीं सके. फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर (फोसवाल) की ओर से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित इस सालाना आयोजन में सार्क के आठ देशों से आए नए और पुराने साहित्यकारों ने तीन दिनों तक (26-28 मार्च) अपनी-अपनी कविताओं, कहानियों और नज्मों से लोगों को रूबरू कराया.

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