साहित्य में उठाने गिराने का खेल

अगर हम देखें, तो नहीं पढ़ना या कम पढ़ना एक बड़ी समस्या के तौर पर साहित्य में उपस्थित हो गया

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विभाजन, युद्ध और प्यार की फिल्में

हिंदी फिल्मों में भारत-पाकिस्तान के विभाजन और उसमें हिंदू-मुस्लिम, पारसी, सिख परिवारों के द्वंद्व पर भी कई फिल्में आईं. भारत-पाकिस्तान

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ठोस पहल से सार्थक परिणाम

ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के मॉरीशस आयोजन को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं. इसका आयोजन संभवतः इस वर्ष अगस्त

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साहित्य में गंगा-जमुनी तहज़ीब!

साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब के झंडाबरदारों ने इतने सालों से ये सवाल नहीं उठाया, उनकी चुप्पी भी सवालों के कठघरे

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साहित्य के ‘अखाड़े’ में ‘कमज़ोर समानांतर साहित्य उत्सव’

दरअसल अगर हम पूरे आयोजन को लेकर समग्रता में विचार करें, तो यह बात समझ में आती है कि इसकी

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साहित्योत्सव से संस्कृति निर्माण?

पिछले कई सालों से देशभर में साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर एक प्रकार का अनुराग उत्पन्न होता दिखाई दे

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सम्मान के बहाने अंतर्विरोधों पर ऩजर

उम्र के नब्बे पड़ाव पार कर चुकी लेखिका कृष्णा सोबती जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया. ज्ञानपीठ

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‘मैं और मेरा’ के चक्रव्यूह में सृजन

आज के साहित्यिक परिदृष्य पर अगर नजर डालें तो ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरी’ की ध्वनियों का कोलाहल सुनाई देता हैं.

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यश-भारती के यश पर सवाल

उत्तर प्रदेश के समाजवादी कुनबे में कलह जारी है. सियासत से लेकर अंतःपुर में खेले जाने वाले दांव-पेंच पर पूरे

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कहानियों का नया बा़जार

सनी लियोनी और साहित्य. सुनकर कुछ अजीब लगता है, क्योंकि एक एडल्ट फिल्मों की नायिका जो इन दिनों बॉलीवुड फिल्मों

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हिंदी साहित्य में मठाधीशी

मुंबई के ऐतिहासिक सेंट जेवियर्स कॉलेज के प्रांगण में दो दिनों तक साहित्य, कला, संस्कृति और संगीत का बेहतरीन समागम

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एक और सालाना कर्मकांड

हिंदी के साथ दूसरी बड़ी समस्या है कि इसे हमेशा अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी की दुश्मन के तौर पर

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कॉकस के कब्जे में अकादमी

भारतीय जनता पार्टी के केंद्र में सरकार बनाने के बाद इस बात की आशंका तेज हो गई थी कि सांस्कृतिक

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एक नए अध्याय की शुरुआत

जिस समय देश में सांप्रदायिक सद्भाव कम हो रहा है. लोगों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं. ऐसे समय में

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कौशल विकास से जुड़े आवंटन

मोदी सरकार के पहले बजट से साहित्य, संस्कृति एवं कला क्षेत्र को भी काफी अपेक्षाएं थीं. साहित्य, संस्कृति एवं कला

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साहित्य पत्रिकाओं की सार्थकता

यदा-कदा साहित्यिक आयोजनों और विचार गोष्ठियों में जाने-बोलने का अवसर मिलता है. ज्यादातर गोष्ठियों में वामपंथी विचारधारा के अनुयायी या

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हिंसा हमारी संस्कृति का अंग नहीं है

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के परिप्रेक्ष्य में राहुल गांधी का हालिया बयान सुनाने के बाद एक विषय दिमाग में उथल-पुथल मचाने लगा

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प्रबंधन पर आधारित काव्य संग्रह

पांखी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित चंद्रसैन प्रबलजी की पुस्तक प्रबंध चेतना अपने आप में अनूठी है, क्योंकि रचनाकार ने एक प्रबंधक

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कालजयी रचनाकार फ्योदोर दोस्तोयेवस्की…

मशहूर रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेवस्की की गिनती शेक्सपियर, दांते, गेटे और टॉलस्टॉय जैसे महान लेखकों के साथ होती है. फ्योदोर

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पाश्चारत्य काव्य-चिंतन पर एक दस्तावेज़

कविता का जन्म कब हुआ, इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है. मगर इतना ज़रूर है कि जब से

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तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.

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पूरे चांद की रात…

भारतीय साहित्य के प्रमुख स्तंभ यानी उर्दू के मशहूर अ़फसानानिग़ार कृष्ण चंदर का जन्म 23 नवंबर, 1914 को पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले के वज़ीराबाद में हुआ. उनका बचपन जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाक़े में बीता. उन्होंने तक़रीबन 20 उपन्यास लिखे और उनकी कहानियों के 30 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके प्रमुख उपन्यासों में एक गधे की आत्मकथा, एक वायलिन समुंदर के किनारे, एक गधा नेफ़ा में, तूफ़ान की कलियां, कॉर्निवाल, एक गधे की वापसी, ग़द्दार, सपनों का क़ैदी, स़फेद फूल, प्यास, यादों के चिनार, मिट्टी के सनम, रेत का महल, काग़ज़ की नाव, चांदी का घाव दिल, दौलत और दुनिया, प्यासी धरती प्यासे लोग, पराजय, जामुन का पेड़ और कहानियों में पूरे चांद की रात और पेशावर एक्सप्रेस शामिल है. 1932 में उनकी पहली उर्दू कहानी साधु प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा.

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मन को छूते मेरे गीत

गीत मन के भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं. साहित्य ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेरे गीत में सतीश सक्सेना ने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर गीतों की रचना की है. वह कहते हैं कि वास्तव में मेरे गीत मेरे हृदय के उद्‌गार हैं. इनमें मेरी मां है, मेरी बहन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं. मैं उन्हें जो देना चाहता हूं, उनसे जो पानी चाहता, वही सब इनमें है.

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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रिश्तों की गर्माहट का संग्रह

चौथी दुनिया में लगभग तीन साल से ज़्यादा समय से लिख रहे अपने स्तंभ में कविता और कविता संग्रह पर बहुत कम लिखा. साहित्य से जुड़े कई लोगों ने शिकायती लहज़े में इस बात के लिए मुझे उलाहना भी दिया. कइयों ने कविता के प्रति मेरी समझ पर भी सवाल खड़े किए.

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सौ साल का हिंदी सिनेमा

सौ साल पहले रूपहले पर्दे पर वर्ष 1913 में 21 अप्रैल को पहली श्वेत-श्याम हिंदी मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र को दर्शकों ने देखा, तो सबको अजूबा लगा. फिल्मी पर्दे पर पहले-पहल वह नज़ारा सचमुच स्वप्न लोक जैसा ही था. राजा हरिश्चंद्र फिल्म के निर्देशक, निर्माता और लेखक दादा साहब फाल्के थे, जिन्होंने इंग्लैंड जाकर फिल्म तकनीक सीखने के लिए ज़ेवर बेच दिए थे और उनका यह प्रयास मील के पत्थर की तरह साबित हुआ.

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मूल्यांकन में आलस क्यों

कौन जानता था कि सिमरिया घाट के बालू की रेत पर खेलने वाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा- लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर तू आंसू के कण बरसाता चल. यह वही बालक था, जो बाद में राष्ट्रकवि बना और जिनका नाम था रामधारी सिंह दिनकर. रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के कवि थे.

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किताबों की दुनिया और बच्चे

दौड़ती-भागती दुनिया और तेज़ी से होता आधुनिकीकरण. बच्चों की तो दुनिया ही बदल गई है. टीवी और इंटरनेट ने उन्हें किताबों और साहित्य से कोसों दूर कर दिया है. ऐसे में केंद्र सरकार ने बच्चों की साहित्यक रूचि का मंच प्रदान करने और वरिष्ठों के बीच बिठाकर उनकी प्रतिभा को निखारने की योजना बनाई है. इसकी शुरुआत राजस्थान माध्यमिक शिक्षा परिषद ने कर भी दी है.

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अदम गोंडवी : आम आदमी का शायर

शब्द-शब्द संघर्ष करने वाले साहित्य जगत के शिल्पकार रामनाथ सिंह उ़र्फ अदम गोंडवी नहीं रहे. ग़ुरबत में ज़िंदगी ग़ुजार कर साहित्य की सेवा करने वाले अदम गोंडवी ने अभाव में ज़िंदगी के ताप को महसूस कराने के लिए अपने गांव आटा परसपुर (गोंडा, उत्तर प्रदेश) की ओर से साहित्यानुरागियों का ध्यान खींचने के लिए क़लम को तलवार बनाते हुए कहा था

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