तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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अधिकारों से वंचित हैं मुस्लिम महिलाएं

दुनिया की तक़रीबन आधी आबादी महिलाओं की है. इस लिहाज़ से महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है. कमोबेश दुनिया भर में महिलाओं को आज भी दोयम दर्जे पर रखा जाता है. अमूमन सभी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की प्रवृत्ति है, ख़ासकर मुस्लिम समाज में तो महिलाओं की हालत बेहद बदतर है.

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कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा-खासा विवाद होता रहा है. लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों की बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं. दूसरी तऱफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं. बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं, लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए.

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2011: उल्लेखनीय कृति का रहा इंतज़ार

वर्ष 2011 ख़त्म हो गया. देश के विभिन्न समाचारपत्र-पत्रिकाओं में पिछले वर्ष प्रकाशित किताबों का लेखा-जोखा छपा. पत्र-पत्रिकाओं में जिस तरह के सर्वे छपे, उससे हिंदी प्रकाशन की बेहद संजीदा तस्वीर सामने आई. एक अनुमान के मुताबिक़, तक़रीबन डेढ़ से दो हज़ार किताबों का प्रकाशन पिछले साल भर में हुआ.

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जहां चाह, वहां राह

एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है.

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श्रीलाल शुक्ल हमेशा याद रहेंगे

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल अब हमारे बीच नहीं हैं. उन्हें हाल में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बीते 18 अक्टूबर को राज्यपाल बीएल जोशी ने साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल को अस्पताल जाकर अपने हाथों से स्मृति चिंह भेंट कर उनका सम्मान किया था.

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अमिताभ का विरोध क्यों?

हमारे देश के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार को लेकर विवाद पैदा किया जा रहा है. विवाद और आपत्ति इस बात को लेकर है कि शहरयार और अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन के हाथों दिया गया.

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साहित्य जगत में तकनीकी क्रांति

वर्तमान समय तकनीक का युग हो गया है. इससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया बहुत तेज़ी से सिकुड़ती और नज़दीक आती जा रही है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम हैं, जहां कथा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध हो सकता है. हर क्षेत्र में तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. यही हमें साहित्य में भी देखने को मिल रहा है.

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…किसी से हो नहीं सकता

हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद ख़ास दिन होता है. इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है, लेकिन हिंदी पट्टी में अपने इस गौरव को लेकर कोई उत्साह देखने को मिलता हो, यह ज्ञात नहीं है. प्रेमचंद के गांव लमही में कुछ सरकारी किस्म के कार्यक्रम हो जाते हैं, जिनमें मंत्री वग़ैरह भाषण देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं.

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साहित्यिक डॉन का कारनामा

साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने के लिए अक्सर मैं दिल्ली के मयूर विहार इलाक़े में जाता हूं, जहां लोक शॉपिंग सेंटर के पास फुटपाथ पर तीन दुकानें लगती हैं. बिपिन के बुक स्टॉल पर मैं तक़रीबन डे़ढ दशक से जा रहा हूं. इस बीच वहां पत्र-पत्रिकाओं की तीन दुकानें सजने लगीं. जैसे ही मैं बिपिन की दुकान पर पहुंचता हूं, वहां मौजूद शख्स मुझे या तो हंस या कथादेश या फिर पाखी पकड़ा देगा.

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साहित्य की क्लियोपेट्राएं

विश्व राजनीति के पटल पर क्लियोपेट्रा एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी खूबसूरती और अपने शरीर का इस्तेमाल अपने करियर को बढ़ाने में बेहतरीन तरीक़े से किया. उसने सेक्स पॉवर को पहचानते हुए खुलकर उसका उपयोग किया और उसे अपनी सफलता की सीढ़ी बनाकर बुलंदी पर जा पहुंची. उसने सत्ता और शक्ति हासिल करने के लिए अपने भाई से ही विवाह किया और मिस्र की सत्ता हासिल की, लेकिन भाई से मनमुटाव के चलते उसे देश छोड़कर निर्वासित होना पड़ा.

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जन्‍मदिवस 31 जुलाई पर विशेषः प्रेमचंद के सपनों का भारत

मुंशी प्रेमचंद के सपनों का भारत निश्चित ही गांधी के सपनों का भारत था. गांधी ने आज़ाद भारत का बड़ा तल्ख तजुर्बा किया. प्रेमचंद इस मायने में भाग्यशाली थे कि उन्होंने आज़ाद भारत का दु:ख और पराभव नहीं देखा. बेकल उत्साही के एक गीत का यह मुखड़ा प्रेमचंद के सपनों के भारत को सजीव करता है:

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निज भाषा पर अभिमान करो

हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति-उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है, जिस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है. क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं. हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं, जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है.

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‘सांस्‍कृतिक क्रांति’ पर बवाल

चौथी दुनिया के अपने इसी स्तंभ में कुछ दिनों पहले मैंने बिहार सरकार के कला और संस्कृति मंत्रालय की कॉफी टेबल बुक-बिहार विहार के बहाने सूबे में सांस्कृतिक संगठनों की सक्रियता, उसमें आ रहे बदलाव और सरकारी स्तर पर उसके प्रयासों की चर्चा की थी.

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दिलचस्प अनुभवों की शाम

बात अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है. पुस्तकों को पढ़ते हुए बहुधा मन में विचार आता था कि उस पर कुछ लिखूं, लेकिन संकोचवश कुछ लिख नहीं पाता था. ज़्यादा पता भी नहीं था कि क्या और कैसे लिखूं और कहां भेजूं. मैं अपने इस स्तंभ में पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि किताबों को पढ़ने के बाद चाचा भारत भारद्वाज को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था.

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साहित्यकार समाज सुधारक नहीं होता

नवोदित उपन्यासकार महुआ माजी का मानना है कि साहित्यकार समाज सुधारक नहीं होता. वह सिर्फ लिखता है, ताकि लोग उस विषय पर मंथन करें कि क्या सही है और क्या ग़लत. अपने उपन्यास मैं बोरिशाइल्ला के लिए वर्ष 2007 में अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान पाने वाली महुआ माजी रांची की रहने वाली हैं.

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विचारों की ‘परिक्रमा’

हिंदी में पत्रिकाओं का बेहद लंबा इतिहास रहा है. उन्नीसवीं सदी को हिंदी भाषा और साहित्य में नवजागरण का काल माना जाता है. यह भी तथ्य है कि हिंदी के पहले समाचारपत्र उदंत मार्तंड के प्रकाशन की शुरुआत 30 मई, 1826 को कलकत्ता से हुई थी, जिसके प्रथम संपादक बाबू जुगुल किशोर सुकुल थे.

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पत्रिकाओं से बनता परिवेश

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक समृद्ध इतिहास रहा है और हिंदी के विकास में इनकी एक ऐतिहासिक भूमिका भी रही है. व्यवसायिक पत्रिकाओं के विरोध में शुरू हुए लघु पत्रिकाओं के इस आंदोलन ने एक व़क्त हिंदी साहित्य में विमर्श के लिए एक बड़ा और अहम मंच प्रदान किया था, लेकिन बदलते व़क्त के साथ इन पत्रिकाओं की भूमिका भी बदलती चली गई.

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उदय प्रकाश नहीं थे पहली पसंद

इस वर्ष के साहित्य अकादमी पुरस्कारों का ऐलान हो गया है. हिंदी के लिए इस बार का अकादमी पुरस्कार यशस्वी कथाकार और कवि उदय प्रकाश को उनके उपन्यास मोहनदास (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया गया. उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार डिज़र्व करते हैं, बल्कि उन्हें तो अरुण कमल, राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति से पहले ही यह सम्मान मिल जाना चाहिए था.

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अप्रासंगिक लेखक संगठन

वर्ष 1935 में लंदन के नानकिंग रेस्तरां में बैठकर सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद, ज्योति घोष, प्रमोद सेन गुप्ता एवं मोहम्मद दीन तासीर जैसे लेखकों ने एक संगठन की बुनियाद रखने की बात पर विचार विमर्श किया था और यही विमर्श बाद में इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का आधार बना और इसी नाम से संगठन की नींव पड़ी.

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आलोचक का अकेलापन

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है, माधुरी, कल्पना एवं रूपाभ से लेकर हंस, पहल एवं तद्‌भव तक. साठ के दशक में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसने कई दशकों तक साहित्यिक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप किया. 86 के दशक में जब राजेंद्र यादव ने हंस पत्रिका का संपादन शुरू किया तो वह एक बेहद अहम साहित्यिक घटना साबित हुई.

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साहित्य में नैतिकता: सवाल पुराने, विमर्श नया

हिंदी के मूर्धन्य कवि, आलोचक, स्तंभकार, कला मर्मज्ञ एवं पूर्व नौकरशाह अशोक वाजपेयी ने एक बार फिर से साहित्य में नैतिकता का राग छेड़ा है. विभूति-कालिया प्रकरण पर लिखते हुए अशोक वाजपेयी ने इस पूरे प्रसंग को नैतिकता से जोड़ने की कोशिश की. दरअसल यह एक पुराना सवाल है, जिस पर अशोक वाजपेयी ने नया विमर्श शुरू करने की कोशिश की है.

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बयासी साल का ज़िंदादिल जवान

दिल्ली के साहित्य प्रेमियों को हर साल 28 अगस्त का इंतज़ार रहता है. साहित्यकारों को तो खासतौर पर. हर साल यह दिन दिल्ली में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है. दिल्ली के सारे साहित्यकार एक जगह इकट्ठा होते हैं, जमकर खाते-पीते हैं. महानगर की इस भागदौड़ और आपाधापी की ज़िंदगी में कई लोग तो ऐसे भी होते हैं, जो साल भर बाद इस दिन ही मिलते हैं.

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न्याय की स्थापित मान्यताओं को चुनौती

समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में हिंदी अनुवाद की हालत बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है. पिछले दिनों हिंदी के कई प्रकाशकों ने साहित्येत्तर किताबों का प्रकाशन भी शुरू किया, जो एक स्वागत योग्य क़दम है. लेकिन जैसा कि मैंने ऊपर संकेत किया है कि हिंदी में स्तरीय अनुवाद नहीं हो रहे हैं.

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साहित्यकार फोसवाल में ऊबे दिखे

कला और साहित्य ज़मीन पर खींची गई किसी लकीर के दायरे में नहीं बांधे जा सकते. ऐसा ही कुछ देखने को मिला सार्क देशों से आए साहित्यकारों के सम्मेलन में. लगा जैसे इस कार्यक्रम के लंबे सत्र से अनेक साहित्यकार ऊब गए थे. जो सुबह आए,वे शाम तक रुक नहीं सके. फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर (फोसवाल) की ओर से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित इस सालाना आयोजन में सार्क के आठ देशों से आए नए और पुराने साहित्यकारों ने तीन दिनों तक (26-28 मार्च) अपनी-अपनी कविताओं, कहानियों और नज्मों से लोगों को रूबरू कराया.

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