बलूचिस्तान का इतिहास : दमन और संघर्ष की कहानी है

भारत में बलूचिस्तान का मुद्दा सबसे पहले तब गरमाया, जब 2009 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी

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दिल्‍ली का बाबूः मुखिया विहीन बैंकिंग सेक्टर

पिछले 9 महीने से पंजाब एंड सिंध बैंक के सीएमडी का पद रिक्त है, लेकिन अब तक इस मसले को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय के बीच जारी तनातनी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. अब तक ये दोनों मिलकर यह तय नहीं कर पाए हैं कि चली आ रही परंपरा के अनुसार इस पद पर एक सिख को बैठाया जाए या नहीं.

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सिख दंगा पीडि़तः कब मिलेगा न्‍याय

वर्ष 1984 के दंगों के शिकार सिखों को मुआवज़ा दिलाने के लिए दाखिल मूल याचिका के संवेदनशील पन्ने और सात-सात अन्य याचिकाएं अदालत से ग़ायब हैं. मूल याचिका के महत्वपूर्ण पन्ने फाड़ डालने और सात-सात सेकेंडरी रिटें ग़ायब किए जाने जैसे सनसनीखेज मामले की जांच की बात तो छोड़िए, सिखों के मुआवज़े पर जिस भी बेंच ने सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाया, वह बेंच ही ऐन फैसले के वक्त बदल दी गई.

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सबका मालिक एक

हेमाड पंत जी साई सच्चरित्र में लिखते हैं, बाबा अक्सर कहा करते थे कि सबका मालिक एक. आख़िर इस संदेश का मतलब क्या था? आइए बाबा के इसी संदेश पर कुछ बातें करें. बाबा के विषय में हम जितना मनन करते जाते हैं, उनके संदेशों को समझना उतना ही आसान होता जाता है. बाबा के बारे में लिखना और पढ़ना हम साई भक्तों को इतना प्रिय है कि उनकी एक लेखिका भक्त ने तो अपनी एक किताब में बाबा को ढेर सारे पत्र लिखे हैं. मेरा मानना है कि साई को पतियां लिखूं जो वह होय बिदेस. मन में, तन में, नैन में ताको कहा संदेस. लेकिन साई के विषय में बातें करना जैसे आत्म साक्षात्कार करना है. बाबा ने बहुत सहजता से कहा है, सबका मालिक एक. ऐसा कह पाना शायद बाबा के लिए ही संभव था, क्योंकि समस्त आसक्तियों और अनुरागों से मुक्त एक संत ही ऐसा कह सकता है. प्रचलित धर्म चाहे हिंदू, इस्लाम, सिख, ईसाई, जैन एवं बौद्ध हो या कोई अन्य, प्रश्न यह है कि जो ये धर्म सिखा रहे हैं, क्या वह ग़लत है? अगर ग़लत न होता तो बाबा को इस धरती पर अवतार लेने की आवश्यकता ही न होती.

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पेशावर में इस्लाम का क़त्लेआम हुआ

पाकिस्तान के पेशावर प्रांत में दो सिख युवकों को खुलेआम क़त्ल किए जाने की खबर मार्मिक भले हो, लेकिन आश्चर्यजनक कतई नहीं है. हिंसा और घृणा की खुराक़ पर पले-बढ़े तालिबान से भला हम और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं. लेकिन इतना ज़रूर है कि इस घटना के बाद पाकिस्तानी सरकारी तंत्र के तालिबान के खतरे को नियंत्रित कर लेने संबंधी दावों की असलियत उजागर हो गई है.

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अल्‍पसंख्‍यकों की हालत समझना जरूरी

संयुक्त राष्ट्र संघ में लगभग दो सौ सदस्य देश हैं, लेकिन इनमें शायद ही कोई मुल्क ऐसा हो, जिसकी पूरी आबादी एक ही मज़हब, भाषा, नस्ल या फिर संस्कृति की हो. यानी इन सभी मुल्कों में बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ अल्पसंख्यक आबादी भी है. ऐसे कुछ मामले हो सकते हैं कि एक राज्य में किसी एक समूह का बहुमत न हो, लेकिन एक अल्पसंख्यक समूह कई अन्य के साथ मिलकर पूरी आबादी का पचास फ़ीसदी से कम हो सकता है.

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अल्लाह शब्द पर किसी का एकाधिकार नहीं

मलेशिया एक बार फिर से ग़लत कारण से अंतरराष्ट्रीय ख़बर की सुर्ख़ियों में है. पिछले दो सप्ताह के दौरान असामाजिक तत्वों ने पूजा के दस स्थलों को अपना निशाना बनाया है. इन स्थलों में ईसाइयों के गिरिजाघर और सिखों के गुरुद्वारे शामिल हैं. बहरहाल इस हमले में वहां कोई हताहत नहीं हुआ और संपत्तियों को जो नुक़सान पहुंचा उसकी क्षतिपूर्ति की जा सकती है

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