जब तोप मुकाबिल हो : सत्ता के गलियारों से निकलता भ्रष्टाचार

वे फाइलें, जिनका सीधा रिश्ता कोल ब्लॉक के आबंटन से है और जिन पर कोयला मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री

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प्रधानमंत्री को पारदर्शी होने की ज़रूरत है

देश के लिए यह काफी सुखद है कि आखिरकार प्रधानमंत्री ने अपनी चुप्पी तोड़ी. ससंद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री

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किसान क़र्ज़ माफ़ी घोटाला : सच साबित हुई चौथी दुनिया की रिपोर्ट

पहले सीडब्लूजी, 2-जी, कोयला और अब सीएजी की एक और रिपोर्ट. न तो घोटालों का सिलसिला थमने का नाम ले

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48 लाख करोड़ का महाघोटाला

जबसे यूपीए सरकार बनी है, तबसे देश में घोटालों का तांता लग गया है. देश के लोग यह मानने लग गए हैं कि मनमोहन सिंह सरकार घोटालों की सरकार है. एक के बाद एक और एक से बड़ा एक घोटाला हो रहा है. चौथी दुनिया ने जब 26 लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले का पर्दाफाश किया था, तब किसी को यह यकीन भी नहीं हुआ कि देश में इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया जा सकता है.

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यूपीए सरकार का नया कारनामा : किसान कर्ज माफी घोटाला

आने वाले दिनों में यूपीए सरकार की फिर से किरकिरी होने वाली है. 52,000 करोड़ रुपये का नया घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में ग़रीब किसानों के नाम पर पैसों की बंदरबांट हुई है. किसाऩों के ऋण मा़फ करने वाली स्कीम में गड़बड़ी पाई गई है. इस स्कीम का फायदा उन लोगों ने उठाया, जो पात्र नहीं थे. इस स्कीम से ग़रीब किसानों को फायदा नहीं मिला. आश्चर्य इस बात का है कि इस स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा उन राज्यों को हुआ, जहां कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें मिली. इस स्कीम में सबसे ज़्यादा खर्च उन राज्यों में हुआ, जहां कांग्रेस या यूपीए की सरकार है.

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एक अफसर का खुलासाः ऐसे लूटा जाता है जनता का पैसा

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एवं शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने अपने पद से इस्ती़फा दे दिया है. हालांकि उनके इस्ती़फे के बाद राज्य में सियासी भूचाल पैदा हो गया है. अजीत पवार पर आरोप है कि जल संसाधन मंत्री के रूप में उन्होंने लगभग 38 सिंचाई परियोजनाओं को अवैध तरीक़े से म़ंजूरी दी और उसके बजट को मनमाने ढंग से बढ़ाया. इस बीच सीएजी ने महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले की जांच शुरू कर दी है.

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यह खामोशी देश के लिए खतरनाक है

कोयला घोटाला अब स़िर्फ संसद के बीच बहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश का विषय हो गया है. सारे देश के लोग कोयला घोटाले को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इसमें पहली बार देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति का नाम सामने आया है. मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे और यह फैसला चाहे स्क्रीनिंग कमेटी का रहा हो या सेक्रेट्रीज का, मनमोहन सिंह के दस्तखत किए बिना यह अमल में आ ही नहीं सकता था.

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सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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सीएजी के प्रति कांग्रेस का रवैया यह प्रजातंत्र पर हमला है

सीएजी (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2006-2009 के बीच कोयले के आवंटन में देश को 1.86 लाख करोड़ का घाटा हुआ. जैसे ही यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई, कांग्रेस के मंत्री और नेता सीएजी के खिला़फ जहर उगलने लगे. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सीएजी ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया.

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चौथी दुनिया की रिपोर्ट सच साबित हुई : कोयला घोटाले का सच

चौथी दुनिया ने अप्रैल 2011 में कोयला घोटाले का पर्दा़फाश किया था. उस व़क्त न सीएजी रिपोर्ट आई थी, न किसी ने यह सोचा था कि इतना बड़ा घोटाला भी हो सकता है. उस व़क्त इस घोटाले पर किसी ने विश्वास नहीं किया. जिन्हें विश्वास भी हुआ तो आधा अधूरा हुआ. चौथी दुनिया ने आपसे अप्रैल 2011 में जो बातें कहीं, उस पर वह आज भी अडिग है.

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सीएजी रिपोर्ट पर राजनीतिः प्रजातंत्र के लिए खतरा है

सीएजी (कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित विपक्ष के निशाने पर आ गईं. रिपोर्ट ने देश की जनता के सामने सबूत पेश किया कि कैसे कॉमनवेल्थ गेम्स नेताओं और अधिकारियों के लिए लूट महोत्सव बन गया.

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दिल्‍ली का बाबूः फैसले के पीछे क्या है?

देश के शीर्ष नौकरशाहों की जमात पहले ही कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर को एक साल के सेवा विस्तार से हैरत में थी, लेकिन कैबिनेट सचिव के लिए चार साल की निश्चित कार्यावधि के केंद्र सरकार के फैसले ने तो मानों उनके पैरों तले की ज़मीन ही खिसका दी है.

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दिल्‍ली का बाबूः चंद्रशेखर के बाद पुलक चटर्जी!

कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर को अप्रत्याशित रूप से मिले एक साल के एक्सटेंशन ने लगातार दो बैचों के नौकरशाहों को इस पद की दौड़ से ही बाहर कर दिया. हालांकि इस फैसले से यह भी स्पष्ट है कि चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विश्वास हासिल है.

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