जनरल वी के सिंह का आहृवान : भ्रष्‍टाचार के समूल नाश का संकल्‍प लीजिए

देश को बचाने के लिए आज़ादी के संकल्पों को याद करके भ्रष्टाचार के समूल नाश का संकल्प युवा पीढ़ी को लेना होगा, भ्रष्टाचार का कीड़ा देश की रूह को खाए जा रहा है. यह बात पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने अयोध्या-फैज़ाबाद दौरे के दौरान कही. उन्होंने कहा कि सेना को उच्च तकनीक का इस्तेमाल करके ख़ुद को मज़बूत करते रहना चाहिए. पड़ोसी देश चीन यदि अपनी सेना को मज़बूत करता है तो यह उसका हक़ है, हमें भी ख़ुद को तैयार करना होगा.

Read more

मिशन 2020

भारत ने लंदन ओलंपिक में 2 रजत और 4 कांस्य पदक जीतकर आज तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. अच्छे प्रदर्शन के बावजूद सबके सामने एक बड़ा प्रश्न है कि सवा अरब की आबादी वाला देश महज़ 6 ओलंपिक पदक ही जीत पाया. लेकिन क्या आबादी मेडल जीतने का सही पैमाना हो सकती है. क्या यह संभव है कि हर देश अपनी आबादी के हिसाब से ओलंपिक पदकों पर क़ब्ज़ा कर सके.

Read more

पंसारी पंचायत : जिसने लोगों की ज़िंदगी बदल दी

गांव के विकास में पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि पंचायतें अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीक़े से नहीं करती हैं, जिसके कारण लोगों के मन में यह धारणा घर कर गई है कि पंचायत के स्तर पर कुछ नहीं किया जा सकता है.

Read more

समाज को आईना दिखाती रिपोर्ट

हाल में यूनीसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 22 फीसदी लड़कियां कम उम्र में ही मां बन जाती हैं और 43 फीसदी पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बच्चे कमज़ोर और एनीमिया से ग्रसित हैं. इन क्षेत्रों के 48 प्रतिशत बच्चों का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में बहुत कम है. यूनिसेफ द्वारा चिल्ड्रन इन अर्बन वर्ल्ड नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी ग़रीबों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां गंभीर बीमारियों का स्तर गांव की तुलना में अधिक है.

Read more

नागपुरः मरीज का शोषण अस्‍पताल का पोषण

देश के विकसित राज्यों में एक महाराष्ट्र में उन तमाम बड़े अस्पतालों की हालत ख़राब है, जो दावा करते हैं कि उनके यहां ग़रीबों के लिए इलाज की मुकम्मल व्यवस्था है, जबकि इसके उलट इन बड़े कारपोरेट अस्पतालों में ग़रीबों के लिए कोई जगह नहीं है. कमाल की बात तो यह है कि अस्पतालों को ज़मीन सरकार ने ही दी है.

Read more

व्यक्ति और समाज

मान लीजिए देश की समस्त संपत्ति आपके हाथ में सौंप दी जाए और कह दिया जाए कि आप उचित ढंग से उसका वितरण कर दीजिए. आप बंटवारा किस ढंग से करेंगे? एक बार आप अपने परिवार के आदमियों और इष्ट मित्रों को भूल जाइए, क्योंकि आप वितरणकर्ता हैं. तो लाज़िमी तौर पर आपको पक्षपात रहित होकर सर्वसाधारण को एक समान मानकर वितरण करना होगा. आपको पंच परमेश्वर का बाना पहनना होगा.

Read more

जनगणना के साथ नज़रिया बदलने की जरुरत

पच्चीस फीट ऊंची रस्सी पर चलता एक इंसान, सड़क के किनारे करतब दिखाता एक बच्चा. शहर के किनारे तंबू डाले कुछ परिवार. आज यहां, कल कहीं और. बिस्तर के नाम पर ज़मीन, छत आसमान. महीने-दो महीने पर शहर बदल जाता है और शायद ज़िंदगी के रंग भी, लेकिन यह कहानी सैकड़ों सालों से बदस्तूर जारी है. यह कहानी है भारत के उन 6 करोड़ घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की, जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में यायावर कहते हैं.

Read more

राजा का एक और कारनामा

दूरसंचार मंत्रालय और घोटालों का मानो चोली-दामन का साथ है. टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच से अभी दूरसंचार विभाग उबरा भी नहीं था कि एक और नया मामला सामने आ गया.

Read more

सारणः एक अस्‍पताल के भरोसे पूरा जिला

आम आदमी की बुनियादी सुविधाओं में स्वास्थ्य और चिकित्सा बेहद महत्वपूर्ण होती है. इसकी ज़रूरत कब पड़ जाए, कहना मुश्किल है. धनी लोग तो ज़्यादातर निजी चिकित्सालयों में जाना मुनासिब समझते हैं, मगर ग़रीबों के लिए तो सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा होता है.आम आदमी की बुनियादी सुविधाओं में स्वास्थ्य और चिकित्सा बेहद महत्वपूर्ण होती है. इसकी ज़रूरत कब पड़ जाए, कहना मुश्किल है. धनी लोग तो ज़्यादातर निजी चिकित्सालयों में जाना मुनासिब समझते हैं, मगर ग़रीबों के लिए तो सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा होता है.

Read more

काम के नाम पर खानापूर्ति

सरकार जनता का जीवन स्तर सुधारने के लिए उन्हें सड़क, पेयजल, बिजली, नाला, पुल जैसी मूलभूत सुविधा देने के लिए चाहे लाख कल्याणकारी योजनाएं बना ले, लेकिन सही मायने में ऐसी योजनाएं उसी के कारिदों की कारस्तानी के कारण पूरी तरह से धरातल पर उतरती नज़र नहीं आ रही है.

Read more

जातिगत आरक्षण : व्यवस्थागत खामियों का प्रतिबिंब

सरकारी एवं ग़ैर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा बार-बार हमारे सामने आता रहा है. ठीक उसी दैत्य की तरह, जो हर बार अपनी राख से ही दोबारा पैदा हो जाता है. इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की ज़रूरत है. हमें यह सोचना होगा कि क्या आरक्षण वाकई ज़रूरी है.

Read more