उम्‍मीद की रोशनी

एक तो ग़रीब, ऊपर से विकलांग. ज़मीन के नाम पर स़िर्फ उतना, जिस पर झोपड़ीनुमा घर बना हुआ है. बेरोज़गारी और मु़फलिसी इनकी नियति बन चुकी थी. कल तक कालू भाट और राधेश्याम की ज़िंदगी की कहानी कुछ ऐसी ही थी, लेकिन यह कल की कहानी है. आज कालू भाट और राधेश्याम की ज़िंदगी में रोशनी है, आंखों में चमक है, उम्मीद की किरण है, एक सपना है बेहतर भविष्य का.

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