नागरिकता (संशोधन) बिल : पूर्वोत्तर भारत में आग लगाने का काम करेगा

1947 में देश विभाजन की महान मानवीय त्रासदी के बाद धीरे-धीरे दिलों पर लगे हुए ज़ख्मों के दाग तो धुंधले

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लक्ष्‍मी सहगल : लड़ाई अब भी जारी है

कैप्टन लक्ष्मी सहगल कभी पहचान की मोहताज नहीं रहीं. उनकी ज़िंदगी का हर पड़ाव उनके राजनीतिक उदय की एक अप्रत्याशित कहानी कहता है. आज़ाद हिंद फौज में कैप्टन बनने से लेकर 2002 में राष्ट्रपति के चुनाव लड़ने तक वह भारतीय राजनीति में सकारात्मक भूमिका निभाती रहीं. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की क़रीबी मानी जाने वाली लक्ष्मी सहगल का 94 वर्ष की उम्र में कानपुर में निधन हो गया.

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इस बार सरकार ने गांधी को मारा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खून से सनी घास एवं मिट्टी, उनका चश्मा और चरखा सहित उनसे जुड़ी 29 चीज़ें ब्रिटेन में नीलाम हो गईं और इस देश का दुर्भाग्य देखिए, सरकार ने इस बारे में कुछ नहीं किया. इतना ही नहीं, इसके बारे में न तो सरकार ने किसी को बताया और न देश के मीडिया ने यह जानने की कोशिश की कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की धरोहर खरीदने वाला व्यक्ति कौन है,

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झीनी-झीनी बीनी नहीं, फटी चदरिया

बुनकर! स़िर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि प्रतीक भारतीयता का, मिट्टी की सोंधी महक का. स्वतंत्रता सेनानियों ने करघा के आसरे क्रांति का ख्वाब देखा और स्वतंत्रता प्राप्ति की तऱफ अग्रसर हुए. स्वतंत्र तो हम हुए, परंतु करघा दम तोड़ता गया. कपास से कपड़े तक के सफर में करघे पर ज़िंदगियां दम तोड़ती नज़र आती हैं. सिलसिला बदस्तूर जारी है. विकास और आधुनिकता की अंधी दौड़ के चलते हमने करघा, बुनकरों और खादी को लगभग बिसार दिया है.

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क्या हम स्वतंत्रता के लायक़ हैं?

गणतंत्र दिवस और महात्मा गांधी की पुण्यतिथि दोनों एक ही महीने में आते हैं. दोनों के बीच के निचोड़ को किस तौर देखा जाए. पाखंड और अतिश्योक्ति से मुक्ति के लिए किए गए कामों की सुरक्षा की जानी चाहिए या उन्हें केवल दस्तावेज़ों में रखा जाना चाहिए. हमने अहिंसा के नैतिक गुण को अपना लिया है, लेकिन जयपुर में हिंसा होने के डर के कारण जो हुआ, उससे तो यही लगता है कि यह सब कहने की बात है.

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प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

प्रेस काउंसिल के नए चेयरमैन ने कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया है, जिसकी वजह से मीडिया में अ़फरा-त़फरी का माहौल बन गया. इसके पीछे प्रेस काउंसिल का मक़सद स़िर्फ इतना था कि वह प्रेस के क्रिया-कलापों व मानकों पर नज़र रख सकेऔर अपने सीमित अधिकारों के सहारे शिकायतों को देख सके.

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रणबीर सिंह हुड्डा सच्चे देशभक्त थे

सिर पर पगड़ी, आंखों में चश्मा, तन पर खादी और निराला स्वभाव. यही पहचान थी प्रखर गांधीवादी नेता रणबीर सिंह

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स्‍वाधीनता संग्राम और मुसलमान

इस साल कांग्रेस अपना 125वां स्थापना दिवस मना रही है. भारत के सभी धर्मों के नागरिकों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ज़रिए स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया, परंतु हमारे नेताओं की बहुसंख्यकवादी मानसिकता और स्कूली पाठ्‌यक्रम तैयार करने वालों के संकीर्ण दृष्टिकोण के चलते भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अल्पसंख्यकों की भूमिका को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है.

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हैती की बर्बादी के लिए अमेरिका ज़िम्मेदार

भारत की जनता के लिए हैती कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा. इसके बावजूद भारत सरकार की हैती में मौजूदगी दक्षिण देशों की एकता का एक मज़बूत उदाहरण है. 2006 से ही दक्षिण अफ्रीका एवं ब्राजील के साथ भारत हैती में एक ऐसे कार्यक्रम में लगा है, जिसके तहत हैती के 80 फीसदी नागरिकों को आर्थिक तौर पर मज़बूत किया जा सके और वैकल्पिक रोज़गार के साधन मुहैया कराए जा सकें.इस कार्यक्रम के तहत हैती में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को विकसित किया जाना है.

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दिनाकरन प्रकरण: न्‍यायाधीश को बर्ख़ास्त करने की प्रक्रिया

सर्वोच्च न्‍यायालय यह समझ पाने में सक्षम है कि न्‍यापालिका की स्वतंत्रता कैसे बहाल हो सकती है. और, उसकी विश्वसनीता कैसे बरक़रार रखी जा सकती है. वह इस बात को भलीभांति समझ सकता है कि न्‍यायाधीशों की नियुक्ति के लिए वकीलों में से योग्‍य लोगों का चुनाव कैसे किया जा सकता है. लंबे समय से यह दुविधा बनी रही कि न्‍यायपालिका की स्वतंत्रता ख़त्‍म करने के लिए अकेले कार्यपालिका ही ज़िम्मेदार रही है, लेकिन यह भी तय नहीं हो पाया कि न्‍यायपालिका को किस बात से ज्‍यादा नुक़सान हो रहा है. पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ, वह इसी ओर संकेत करता है. हाल में न्‍यायमूर्ति दिनाकरन, न्‍यायमूर्ति मुखर्जी एवं न्‍यायमूर्ति चंद्रमौलि की पदोन्नति पर बड़े विवाद हुए थे. न्‍यायिक व्‍यवस्था में अंदर तक घुसा भ्रष्टाचार और न्‍याय को बाज़ार की चीज बना देना आदि भी न्‍यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है.

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