एंबेसडर की हत्या से बौखलाया रूस, पुतिन बोले-लेंगे बदला

तुर्की की राजधानी अंकारा में एक शख्स ने रूसी एम्बेसडर आंद्रेई कार्लोव की गोली मारकर हत्या कर दी. मारने के

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बांग्लादेश : गृहयुद्ध के हालात

बांग्लादेश में हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें 80 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. एक तरफ़ विपक्षी

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सुशासन का सच या फरेब

बिहार के चौक-चौराहों पर लगे सरकारी होर्डिंग में जिस तरह सुशासन का प्रचार किया जाता है, वह एनडीए सरकार की शाइनिंग इंडिया की याद दिलाता है. बिहार से निकलने वाले अ़खबार जिस तरह सुशासन की खबरों से पटे रहते हैं, उसे देखकर आज अगर गोएबल्स (हिटलर के एक मंत्री, जो प्रचार का काम संभालते थे) भी ज़िंदा होते तो एकबारगी शरमा जाते. ऐसा लिखने के पीछे तर्क है.

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दहेज प्रथा की शिकार बेटियां

हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम अभिभावक लड़की के गुणों से ज़्यादा दहेज को तरजीह दे रहे हैं. एक तऱफ जहां बहुसंख्यक तबक़ा दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहा है, वहीं मुस्लिम समाज में दहेज का दानव महिलाओं को निग़ल रहा है. दहेज के लिए महिलाओं के साथ मारपीट करने, उन्हें घर से निकालने और जलाकर मारने तक के संगीन मामले सामने आ रहे हैं.

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एक दिन जिसने ओलंपिक की तस्‍वीर बदल दी

म्‍युनिख में 1972 में हुए ओलंपिक खेलों के दौरान छह फिलीस्तीनी आतंकवादी खेलगांव में घुस गए थे. इस दौरान उन्होंने इजराइल के दो खिलाड़ियों की हत्या कर दी थी और 9 खिलाड़ियों को बंधक बना लिया था. इस घटना को फिलीस्तीन के ब्लैक सितंबर नाम के संगठन ने अंजाम दिया था. यह पहला मौक़ा था, जब आतंकवादियों ने किसी अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धा को अपना निशाना बनाया था.

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सच का सिपाही मारा गया

सच जीतता ज़रूर है, लेकिन कई बार इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ती है. सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, यशवंत सोणावने एवं नरेंद्र सिंह जैसे सरकारी अधिकारियों की हत्याएं उदाहरण भर हैं. इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है इंजीनियर संदीप सिंह का. संदीप एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में हो रहे घोटाले को उजागर करना चाहते थे.

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बिहारः ब्रहमेश्‍वर सिंह की हत्‍या, लाशों पर राजनीति की नई कड़ी

आरा में रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखियाजी की हत्या ने एक साथ कई सवालों को जन्म दिया है. सबसे पहला सवाल इस बात को लेकर है कि उनकी हत्या के पीछे किसका हाथ है. रणवीर सेना पर राज्य में कई नरसंहार करने का आरोप है.

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शक का लाभ

ओसामा बिन लादेन का कहना था कि अमेरिका के खिला़फ उसके जिहाद को रोकने का एकमात्र रास्ता है कि अमेरिका के लोग इस्लाम कबूल कर लें. इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है. लादेन को यह विश्वास उसके क़ुरान पढ़ने से आया. उसने इतिहास से भी यह पाठ सीखा. उसका सोचना था कि अगर सोवियत संघ को अ़फग़ानिस्तान में विफल किया जा सकता है तो अमेरिका को क्यों नहीं हराया जा सकता है.

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समाज को आईना दिखाती रिपोर्ट

हाल में यूनीसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 22 फीसदी लड़कियां कम उम्र में ही मां बन जाती हैं और 43 फीसदी पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बच्चे कमज़ोर और एनीमिया से ग्रसित हैं. इन क्षेत्रों के 48 प्रतिशत बच्चों का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में बहुत कम है. यूनिसेफ द्वारा चिल्ड्रन इन अर्बन वर्ल्ड नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी ग़रीबों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां गंभीर बीमारियों का स्तर गांव की तुलना में अधिक है.

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आरटीआई का इस्तेमाल ऐसे करें

हमारे पास पाठकों के ऐसे कई पत्र आए, जिनमें बताया गया कि आरटीआई के इस्तेमाल के बाद किस तरह उन्हें परेशान किया गया या झूठे मुक़दमे में फंसाकर उनका मानसिक और आर्थिक शोषण किया गया. यह एक गंभीर मामला है और आरटीआई क़ानून के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद से ही इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं.

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बिहारः आरटीआई कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं

सूचना के अधिकार के सिपाही रामविलास सिंह अपनी जान की सुरक्षा की गुहार लगाते रहे, पर लखीसराय सहित बिहार का सारा पुलिस अमला आराम से सोता रहा. राज्य मानवाधिकार आयोग में भी उनकी फरियाद अनसुनी रह गई. अपराधी उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे थे और प्रशासन ने आंखें मूंद लेने में भलाई समझी.

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फ़र्ज़ी एंकाउंटर: दोषी पुलिसवालों को फांसी हो

गत दिनों राजस्थान में दारा सिंह की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे का प्रयोग करते हुए कहा है कि फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में संलिप्त पुलिस वालों को फांसी पर लटका देना चाहिए. दारा सिंह एक संदिग्ध डाकू था, जिसकी राजस्थान पुलिस ने 23 अक्टूबर को एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी थी.

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उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमलाः सच कहने की सजा

मायावती सरकार और उसके नुमाइंदों ने हर उस आवाज़ को कुचल देने की कसम खाई है, जो मुख्यमंत्री मायावती या उनके राजकाज के ख़िला़फ उठाई गई हो. विरोधियों पर लाठी-डंडों की बौछार और व्यापारियों का उत्पीड़न करने, क़ानून के रक्षकों एवं शिक्षा मित्रों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटने वाले मायावती के कथित गुर्गों का निशाना अबकी बार मीडिया बना.

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दंगा मुक्त भारत की ओर

विभाजन के बाद भारत में पहला सांप्रदायिक दंगा 1961 में जबलपुर में हुआ, तबसे दंगों का सिलसिला अनवरत जारी है. 1980 के दशक में सांप्रदायिक हिंसा में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई. विभिन्न समुदायों के बीच शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे बहुत बड़ा रोड़ा बन गए हैं.

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पत्रकारिता की क़ीमत जान हो सकती है

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है, जिसकी क़ीमत क्या है, अभी यह तय नहीं हुआ है. पत्रकारिता में जो लोग आते हैं उन्हें कम से कम यह ध्यान में रखकर आना चाहिए कि पत्रकारिता के पेशे की क़ीमत उनकी अपनी जान हो सकती है. मुंबई में मिड डे के पत्रकार जेडे की हत्या इस सत्य को एक बार फिर रेखांकित कर रही है.

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भागलपुर दंगाः जख्‍म हैं कि भरने का नाम नहीं लेते

21 साल, एक महीना और एक दिन! आप कह सकते हैं, इतना समय कोई भी ज़ख्म भरने के लिए काफी होता है, मगर कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं, जिनके भरने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं. बिहार के भागलपुर शहर को भी एक ऐसी ही चोट लगी, जिसके घाव आज भी यहां के बाशिंदों की आंखों से रिसते रहते हैं. दर्द ख़त्म होने का नाम नहीं लेता. कभी मस्ज़िद की अजान से, कभी मंदिरों की घंटियों से तो कभी अदालत के फैसले से यह और भी बढ़ जाता है.

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असमः अब उग्रवाद नहीं अंधविश्वास हावी

असम में अब उग्रवाद से कहीं ज़्यादा हत्याएं अंधविश्वास से हो रही हैं. राज्य की कांग्रेस सरकार स्वास्थ्य सेवा में आमूलचूल परिवर्तन का दावा करती है, पर हक़ीक़त इससे कोसों दूर है. गांवों में आज भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए लोग कविराज की झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं.

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लाइन में खडा़ किया गोली मारी और लाशें बहा दीं

अगर न्याय में देरी का मतलब न्याय से वंचित होना है तो यह कह सकते हैं कि मेरठ के मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ है. मई 1987 में हुआ मेरठ का दंगा पच्चीसवें साल में आ चुका है. इस दंगे की सबसे दर्दनाक दास्तां मलियाना गांव और हाशिमपुरा में लिखी गई. खाकी वर्दी वालों का जुर्म हिटलर की नाजी आर्मी की याद दिलाता है.

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निशाने पर खिलाडी़

यह बिल्कुल वैसा है कि मंदिरों के नाम पर देश भर में दंगे होते हैं और भगवान को सच्चे मन से मानने वाला कोई नहीं मिलता. सब उनका नाम अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. तीज-त्योहारों पर उनके नाम का हल्ला शुरू कर देते हैं. ऐसा ही कुछ हमारे देश में खेल प्रतिभाओं के साथ हो रहा है. हमारे देश में खेल को किसी धर्म से कम नहीं आंका जा सकता है.

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जनता बदलाव चाहती है

सत्ता की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप एक आम बात है, लेकिन जब समय चुनाव का हो तो इनकी अहमियत भी बढ़ जाती है. यही आरोप चुनावी मुद्दे तक बन जाते हैं. मसलन, पश्चिम बंगाल में चुनाव का शंखनाद हो चुका है और विपक्ष यानी तृणमूल कांग्रेस वामपंथी शासन की जमकर बखिया उधेड़ने में जुटी हुई है.

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महिलाएं दुर्व्यवहार सहती रही हैं

जिस दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ साल पूरे हो रहे थे, उसी दिन दिल्ली में एक युवती की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. कुछ समय पहले ख़बर आई कि जोधपुर के एक अस्पताल में सोलह महिलाओं की मौत हो गई.

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साहित्‍यकार की हत्‍या से उठे सवालः डॉ. अनिल सुलभ

साहित्यकार तथा आकाशवाणी, पटना मे कार्यक्रम अधिशासी रहे सीताराम यादव की हत्या ने क़ानून और राज्य सरकार के दावों की पोल खोल दी है. डॉ. अनिल सुलभ ने सदाक़त आश्रम में बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा आयोजित शोक-गोष्ठी में शोक जताते हुए कहा.

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तथ्य फिर से निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं

किसी की भी संदिगध हालत में हुई मौत के पीछे कोई न कोई कारण ज़रूर होता है. अचानक हुई मौत को अनायास कहकर नहीं टाला जा सकता. अगर कारणों पर सही तरीक़े से जांच हो तो उस मौत के पीछे के कारणों से सहज़ ही पर्दा उठाया जा सकता है.

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ईश निंदा कानूनः कितना धर्म, कितनी राजनीति

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या से पाकिस्तान के ईश निंदा क़ानून के औचित्य के बारे में परंपरावादियों एवं उदारवादियों के बीच कटु बहस छिड़ गई है. यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी तत्व तासीर के हत्यारे के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं.

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सोनावणे की हत्या से उपजे सवाल

क्‍या इस देश से ईमानदारी और वफ़ादारी का जनाज़ा ही उठ जाएगा? क्या भारत में ईमानदार अधिकारी पैदा होने ही बंद हो जाएंगे? स्थिति देखकर तो ऐसा ही महसूस होता है. चारों ओर बेईमानी, रिश्वतख़ोरी, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और लूट-खसोट का बोलबाला है.

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