जन्‍मदिन मुबारक : देश की इज्जत की खातिर सलमान ने उठाए हथियार

बॉलीवुड के सुल्तान सलमान खान आज 52 साल हो चुके हैं। सलमान को चौथी दुनिया की ओर से उन्‍हें जन्‍मदिन की हार्दिक

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श्रीनगर की बाढ़ मोदी के लिए वरदान

कश्मीर में आई बाढ़ ने घाटी में काफी कुछ बदल कर रख दिया है. इस बाढ़ ने तबाही तो खूब

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पंजाब सरकार को बाबू की चुनौती

पंजाब  और हरियाणा उच्च न्यायालय में चल रहे मुक़दमे का ़फैसला देश के बाबुओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है.

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बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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शादी से लंबा तलाक़

एक दंपत्ति का वैवाहिक जीवन 24 घंटे से भी कम चला और शादी के 30 सालों बाद तलाक़ पर हाईकोर्ट ने पिछले दिनों मुहर लगाई. निचली अदालत ने पति की अर्जी पर 1996 में तलाक़ की डिक्री दी थी, जिसे महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. हाईकोर्ट ने महिला की अर्जी ख़ारिज करते हुए तलाक़ के फैसले को सही ठहराया.

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कमल मोरारका का ब्लॉग : पुलिस तंत्र मे सुधार समय की मांग है

दिल्ली हाईकोर्ट के निकट हुए बम विस्फोट ने एक बार फिर से एक बड़े खतरे के तौर पर आतंकवाद की ओर लोगों का ध्यान खींचा है. इसी तरह के बम विस्फोट मुंबई, पुणे एवं जयपुर आदि शहरों में भी हुए थे. लेकिन 9/11 के बाद अमेरिका में कोई बड़ा बम धमाका नहीं हुआ और न 2005 के विस्फोट के बाद ब्रिटेन में ही ऐसी कोई घटना घटी.

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पूरे तंत्र को सुधारने की ज़रूरत है

बार-बार कहने के बावजूद सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है. सरकार से मतलब सिर्फ मंत्री नहीं, बल्कि सरकार से मतलब पूरा सिस्टम, दारोगा से लेकर गृह सचिव तक. ये सब नशे की गोली खाकर सो रहे हैं और देश हर दूसरे-तीसरे महीने खतरे का सामना कर रहा है. दिल्ली हाईकोर्ट में तीन महीने के भीतर हुआ दूसरा बम धमाका हमारे सिस्टम के खोखलेपन और सबसे अंत में प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के नकारेपन को चीख-चीखकर बयान कर रहा है.

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महाराष्‍ट्रः हर्षवर्द्धन को हाईकोर्ट की फटकार

मुंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल के होश उड़ा दिए हैं. स़िर्फ हर्षवर्धन पाटिल ही ऐसे मंत्री नही हैं. अगर आप मंत्रियों के वातानुकूलित कक्ष के पास से गुजरें तो आपको हर जगह एक जैसा अनुभव होगा. अधिकतर मंत्री विलासी प्रवृत्ति के होते हैं. उनकी इस प्रवृत्ति से आम आदमी अचंभित और हैरान-परेशान होता है, परंतु सत्ताधीशों को इस संदर्भ में कोई अफसोस नहीं होता.

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नीतीश सरकार को अदालत की फटकार

बिहार में नीतीश सरकार विकास एवं बेहतर कार्य संस्कृति के भले ही लाख दावे कर रही है, पर पटना हाईकोर्ट को लगता है कि सरकार में राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है. अदालत ने तो यहां तक कह दिया कि पटना जंगल है और यहां अफसरों की मिलीभगत से हर काम कराना संभव है.

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न्‍याय के लिए हम कहां जाएं

कुछ ही दिन पहले की बात है, जब सुबह-सुबह मेरे पास एक फोन आया. गुजरात के मुंद्रा समुद्र तट से मेरे एक मित्र ने फोन किया और एक ऐसा सवाल किया, जिसका जवाब हमें पहले ही मिल गया होना चाहिए था. कच्छ के मुंद्रा तटीय क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संरचना वैसे ही कमज़ोर हो चुकी है, इसके बावजूद इस इलाक़े में 300 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट को ग़लत तरीक़े से एन्वॉयरोंमेंटल क्लियरेंस दे दिया गया. स्थानीय मछुआरे समुदायों ने इसके विरोध में अपनी सारी ताक़त लगा दी, लेकिन मेरे मित्र ने सूचना दी कि प्लांट को लेकर काम शुरू किया जा रहा है. उसने मुझसे यह भी पूछा कि मामले की अगली सुनवाई कब होनी है. मैंने उसे यह समझाने की भरपूर कोशिश की कि हम आज असहाय होकर क्यों रह गए हैं, लेकिन मेरा अंदाज़ा है कि ऐसी परिस्थितियों से रूबरू लोगों को समझाना खासा मुश्किल होता है, खासकर यदि वे ऐसी परियोजनाओं से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हों. मैं उसे यह कैसे समझा सकती थी कि थर्मल प्लांट को पर्यावरणीय क्लियरेंस दिए जाने के ख़िला़फ जिस संस्थान में मामला दर्ज किया गया है, वह अब अस्तित्व में ही नहीं है. फिर उन्हें यह भी कैसे समझाया जा सकता है कि पुराने निकाय की जगह जिस नए निकाय का गठन किया जाना है और जहां इस मामले की सुनवाई होनी है, उसका गठन अभी तक नहीं किया गया है.

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दिल्ली हाईकोर्ट की अनोखी पहल

हमारे देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मुक़दमों के शीघ्र निपटारे को लेकर न्यायविदों की तऱफ से समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है. यहां तक कि पिछले दिनों सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में ख़ुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुक़दमों के निस्तारण में लगने वाले लंबे समय पर चिंता जताई थी. एक तऱफ अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई धीमी रफ़्तार से आगे चल रही है, वहीं दूसरी तऱफ नए मुक़दमों का अंबार लगता चला जा रहा है, जिसके चलते अदालतों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है. ऐसा नहीं है कि सरकार इस समस्या से निबटने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रही है. कोशिशें हो रही हैं, लेकिन समस्या के विकराल रूप को देखते हुए वे काफी कम हैं. लंबित मुक़दमों को तेजी से निपटाने की दिशा में ऐसी ही एक अच्छी कोशिश अभी हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने की.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय: ग़ैर वैज्ञानिक सोच और अंधविश्वास को बढ़ावा

भारत का संविधान लागू होने के बाद से आज तक न्यायपालिका के किसी निर्णय पर शायद ही इतनी परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं हुई हों, जितनी हाल में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच द्वारा अयोध्या मामले में दिए गए निर्णय पर हुईं. जहां अनेक लोग निर्णय का स्वागत कर रहे हैं, वहीं ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो उसे ग़लत ठहरा रहे हैं.

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अब पेंशन की टेंशन नहीं

बिहार के जमालपुर से आर के निराला ने हमें पत्र के माध्यम से दो मामलों के बारे में सूचित किया है. दोनों मामले नगर परिषद जमालपुर से संबंधित हैं. पहला मामला चंपा देवी का है. चंपा देवी नगर परिषद जमालपुर में सफाई मज़दूर के तौर पर नियुक्त थीं.

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मक़बूल पर फिदा क्यों हों?

जब मैंने मक़बूल फिदा हुसैन के भारत छोड़ने और क़तर की नागरिकता स्वीकार करने पर सेक्युलरवादियों के दोहरे चरित्र को उजागर करता हुआ लेख चौथी दुनिया में लिखा तो मेरे विवेक और मेरी समझ, मेरी विचारधारा, मेरी शिक्षा, मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए.

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सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई आशा

चलिए, आशा की किरण तो दिखाई दी. भारत में जैसा राजनैतिक माहौल है और जिस तरह राजनैतिक दल अपनी सोच बदल रहे हैं, उससे नहीं लगता कि कुछ बुनियादी बदलाव आसानी से हो पाएंगे. वाई एस आर ने आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण दिया था, जिसका वायदा उन्होंने अपने घोषणापत्र में किया था.

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सीबीआई जांच से इंकार क्यों?

झारखंड की शिबू सरकार की कुंडली अर्जुन मुंडा एवं मधु कोड़ा की सरकारों से कहीं न कहीं ज़रूर मिलती है. इतना ही नहीं, कई गुण और अवगुण एक जैसे हैं. इसलिए वह आय से अधिक संपत्ति के आरोपों में फंसे पूर्व मंत्रियों के मामलों को निगरानी जांच में ही निपटा देना चाहती है और सीबीआई जांच की ज़रूरत से इंकार करती है.

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करमापा विवाद की गुत्थी और उलझी

बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच धर्मगुरुओं के प्रति अथाह आस्था के कारण ही बौद्धों के कई पंथों के धर्मगुरुओं को लेकर पिछले कई वर्षों से विवाद होता आ रहा है. कुछ वर्ष पूर्व जापान के एक पंथ के धर्मगुरु द्वारा खुद को भगवान बुद्ध घोषित किए जाने पर विवाद हो गया था. इसी प्रकार बौद्धों एवं तिब्बतियों के पंथ काग्यू कर्मा के धर्मगुरु 17वें करमापा को लेकर पिछले एक दशक से विवाद चरम पर है.

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