साहित्य के ‘अखाड़े’ में ‘कमज़ोर समानांतर साहित्य उत्सव’

दरअसल अगर हम पूरे आयोजन को लेकर समग्रता में विचार करें, तो यह बात समझ में आती है कि इसकी

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‘मैं और मेरा’ के चक्रव्यूह में सृजन

आज के साहित्यिक परिदृष्य पर अगर नजर डालें तो ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरी’ की ध्वनियों का कोलाहल सुनाई देता हैं.

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Video: आखिर शोएब अख्तर को क्यों लगानी पड़ी लिपिस्टक और आई लाइनर, वजह जानकर दंग रह जाएंगे आप

नई दिल्ली। क्रिकेट की दुनिया में शोएब अख्तर का नाम एक ऐसी शख्सियत के तौर पर जाना जाता है जिसने

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मुड़ने वाली स्क्रीन का स्मार्ट फोन, सैमसंग जल्द ला सकता है बाजार में

सैमसंग गैलक्सी नोट के फटने की खबर के बाद से बाजार में Samsung की छवि को खासा नुकसान हुआ है। जिसकी

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मशहूर होने की ललक का दबाव

जब कोई लेखक अपने सर्वश्रेष्ठ दौर में होता है, उस वक्त लिखना छोड़ दे ऐसा सुनने में कम ही आता

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एक और सालाना कर्मकांड

हिंदी के साथ दूसरी बड़ी समस्या है कि इसे हमेशा अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी की दुश्मन के तौर पर

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कॉकस के कब्जे में अकादमी

भारतीय जनता पार्टी के केंद्र में सरकार बनाने के बाद इस बात की आशंका तेज हो गई थी कि सांस्कृतिक

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सियासत की आग पर भाषा की हांडी

केंद्रीय गृह मंत्रालय के हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने का विरोध शुरू हो गया है. गृह मंत्रालय ने सोशल

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हिंदी की सरकार से अपेक्षा

वर्ष 2012 में हुए विश्‍व हिंदी सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित किया गया था कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ

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एम जे ने तोड़ा अंग्रेजी पत्रकारिता का पाखंड

एम जे अकबर ने पहली बार हिंदी की रिपोर्ट को अंग्रेजी में अनुवाद कर छापा. उन्होंने अंग्रेजी पत्रकारिता के उस

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कबीर बानी से बुनी कविताएं

हिंदी साहित्य जगत पर रचनात्मकता के संकट की बहुत बातें होती रहती हैं. नब्बे के दशक में राजेंद्र यादव ने

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पत्रकार गढ़ते थे एस पी सिंह

आज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं, बदल रहे हैं अथवा बदल दिए गए हैं, नतीजतन, उन पत्रकारों के सामने

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राजनीति, महिला और विद्रूपता

राजेंद्र यादव को अपने जीवनकाल में इस बात का अफ़सोस था कि भारत में राजनीतिक साजिशों या हत्या पर हिंदी

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आरएसएस क्या है?

मैंने राजनीति में 1937 में प्रवेेश किया. उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी,  चूंकि मैंने मैट्रिक की परीक्षा जल्दी पास

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नियमित हो तो बात बने

मैने चौथी दुनिया के अपने इस स्तंभ में कई बार हिंदी में निकल रही साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में विस्तार

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अलविदा महामानव मदीबा

पिछले साल विश्‍व हिंदी सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका जाने का मौक़ा मिला तो इस बात को लेकर रोमांचित था कि

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विचारधारा की बेड़ियों से उनमुक्त एक लेखिका

सुजाता शिवेन अनुवाद के क्षेत्र में तो अहम काम कर ही रही हैं, उन्होंने अपनी कविता संग्रह के माध्यम से

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विवाद के साये में पुस्तक मेला

हर साल आयोजित दिल्ली विश्‍व पुस्तक मेला इस बार कई मायनों में अहम है. नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक एमए

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पुस्तक मेले लेखकों का प्रचार मंच बन चुके हैं

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.

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मैरी कॉम पर आधारित फिल्‍म जोड़ पाएगी दिलों की?

मणिपुर में पीपुल लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की राजनीतिक शाखा रिबोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ) ने हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन और हिंदी चैनल पर हिंदी फिल्मों के प्रसारण पर सितंबर 2000 से प्रतिबंध लगाया हुआ है. उनका मानना है कि हिंदी फिल्में मणिपुरी कल्चर को बिगाड़ती हैं. इससे यहां के लोगों की मानसिकता दूषित होती है. इसी प्रतिबंध के कारण 15-18 अप्रैल, 2012 को इंफाल में आयोजित इंटरनेशनल सोर्ट फिल्म फेस्टिवल में 18 हिंदी फिल्मों को नहीं दिखाया गया था.

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पुरानी तकनीक, कमज़ोर कहानी

समकालीन हिंदी कहानी के परिदृष्य पर नज़र डालें तो युवा कथाकारों ने अपनी कहानियों में शिल्प के अलावा उसके कथ्य में भी चौंकाने वाले प्रयोग किए हैं. आज की नई पीढ़ी के कहानीकारों के पास अनुभव का एक नया संसार है जिसको वे अपनी रचनाओं में व्यक्त कर रहे हैं. इस व़क्त के जो नए कथाकार हैं, उनके अनुभव में आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में जो बदलाव आया है उसको सा़फ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है.

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ए के हंगल हिंदी सिनेमा का रौशन सितारा

यादगार चरित्र, सशक्त अभिनय और बेमिसाल संवाद अदायगी के लिए पहचाने जाने वाले एके हंगल फिल्मी दुनिया का एक ऐसा सितारा थे, जिसकी चमक से यह दुनिया बरसों तक रौशन रही. वह पहले भी कलाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत थे और आगे भी रहेंगे. अवतार किशन हंगल यानीएके हंगल का जन्म एक फरवरी, 1917 में पाकिस्तान के स्यालकोट में कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ. जब वह चार साल के थे, तब उनकी मां का साया उनके सिर से उठ गया.

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समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

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हिंद, हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व

वर्ष 1940 के दशक में जब हम लोग बच्चे थे तो गाया करते थे, हिंदी हैं हम चालीस करोड़. 1940 के दशक के चालीस करोड़ लोग अपने आपको हिंदी यानी हिंद के रहने वाले समझते थे. सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया और उनका नारा जयहिंद था. यही नारा प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल क़िले से देते हैं. भारत का एक अलग अस्तित्व है.

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राइमा सेन की जानदार वापसी

अभिनेत्री राइमा सेन ने अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में काम किया है. इसमें उनका किरदार बेहद सशक्त है. पिछले कुछ समय से हिंदी सिनेमा से लगभग ग़ायब हो चुकी राइमा की यह बेहतरीन वापसी है.

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मेक अप आर्टिस्ट : रिक बेकर

क्या कभी किसी ने सोचा था कि बचपन में अपने घर की रसोई के सामान से राक्षस का मेकअप करने वाले रिक बेकर किंग कांग (1976), एन अमेरिकन वेरेवोल्फ इन लंदन, स्टार वार्स, हेलबॉय, द वोल्फ मैन जैसी बड़ी-बड़ी फिल्मों में बतौर मेकअप आर्टिस्ट काम करेंगे.

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हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे

यह महीना हलचल का महीना रहा है. मुझसे बहुत सारे लोगों ने सवाल पूछे, बहुत सारे लोगों ने जानकारियां लीं. लेकिन जिस जानकारी भरे सवाल ने मुझे थो़डा परेशान किया, वह सवाल पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने किया. उसने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं.

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कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा-खासा विवाद होता रहा है. लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों की बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं. दूसरी तऱफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं. बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं, लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए.

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औरत की बोली

पिछले कई सालों से हिंदी में साहित्येतर विधाओं की किताबों के प्रकाशन में का़फी तेज़ी आई है. प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी इस ओर गंभीरता से ध्यान दिया है. कई लेखकों ने कहानी, कविता, उपन्यास से इतर समाज के उन विषयों को छुआ है, परखा है, जो अब तक हिंदी समाज की नज़रों से ओझल थे.

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लेखको, मा़फी मांगो

पिछले दिनों लखनऊ में हिंदी के महान रचनाकारों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी का निधन हो गया. मैं श्रीलाल जी से दो बार मिला. एक बार राजकमल प्रकाशन के लेखक से मिलिए कार्यक्रम में और दूसरी बार राजेंद्र यादव की जन्मदिन की पार्टी में.

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