राम रहीम विवाद मामले से सीएम खट्टर की कुर्सी हिली, तेज हुई सुगबुगाहट!

नई दिल्ली। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम इंसा की गिरफ्तारी के मामले ने हरियाणा सरकार की पोल खोल के

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प्रजातंत्र बना लाठीतंत्र

एक बार लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारी पूर्वांचल के अलग-अलग शहरों से लखनऊ पहुंचे थे, उनकी संख्या क़रीब 1500 रही होगी, उनमें किसान, मज़दूर एवं छात्रनेता भी थे, जो अपने भाषणों में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे. वे सब अपने भाषणों में सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे थे. उस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी नेता चंद्रशेखर कर रहे थे.

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किसानों पर गोलियां चलाने से हल नहीं निकलेगा

भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.

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मारुति, मजदूर और तालाबंदी : कामगारों की अनदेखी महंगी पड़ेगी

मज़दूरों की गहमागहमी और मशीनों की घरघराहट से गुलज़ार रहने वाले मानेसर (गुड़गांव) के मारुति सुजुकी प्लांट में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है. प्लांट के भीतर मशीनें बंद हैं और काम ठप पड़ा है. पिछले महीने मारुति सुजुकी प्रबंधन और मज़दूरों के बीच हुए विवाद में कंपनी के एचआर हेड की मौत हो जाने के बाद हिंसा भड़क उठी. दोनों पक्षों के बीच हुई मारपीट में कई दर्जन लोग घायल हो गए.

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असम : क्‍यों भड़की नफरत की आग

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संसदीय क्षेत्र असम एक के बाद एक, कई घटनाओं के चलते इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. महिला विधायक की सरेआम पिटाई, एक लड़की के साथ छेड़खानी और अब दो समुदायों के बीच हिंसा. कई दिनों तक लोग मरते रहे, घर जलते रहे. राज्य के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार का मुंह ताकते रहे और हिंसा की चपेट में आए लोग उनकी तऱफ, लेकिन सेना के हाथ बंधे थे.

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ऑस्‍ट्रेलिया में नस्‍लीय हिंसाः हाई कमीशन, मीडिया, पुलिस, सरकार सब जिम्‍मेदार है

यह कहानी एक भारतीय जयंत डागोर की है. एक ऐसा संघर्षशील आदमी, जिसने भारत में रहकर, अपनी ज़िद से ऑस्ट्रेलियाई सरकार को झुका दिया. एक ऐसा संघर्ष, जिसके लिए आम आदमी के पास न व़क्त होता है और न हौसला, लेकिन जयंत का यह संघर्ष ऑस्ट्रेलिया पहुंच कर भी खत्म नहीं हुआ और वह वहां जाकर अपनी जीती हुई बाज़ी हार गया. यह कहानी एक अकेले भारतीय की नहीं है.

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सीरिया : गृह युद्ध के आसार

सीरिया की समस्या बढ़ती जा रही है. हिंसा और प्रतिहिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. अरब लीग के विशेष दूत को़फी अन्नान की शांति योजना भी सफल होती दिखाई नहीं दे रही है. को़फी अन्नान ने कहा है कि सीरिया गृह युद्ध की ओर बढ़ रहा है.

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सुलगता लंदन और पुलिस की भूमिका

ब्रिटेन की राजधानी लंदन के कई शहरों में पिछले दिनों हुए दंगे बेहद दुखद नज़ारे बयां कर रहे थे. आश्चर्य की बात यह है कि मैंने दो हफ्ते पहले ही लंदन छोड़ दिया था. भीषण गर्मी से बचने के लिए हम सभी लंदन में शानदार मौसम का लुत्फ़ ले रहे थे. लंदन में हिंसा उस समय भड़की है, जब वहां ओलंपिक शुरू होने में महज एक साल का वक्त रह गया है. हालांकि लंदन पुलिस पर आरोप है कि उसकी गोलीबारी में मार्क दुग्गन नामक एक ब्रिटिश युवक की मौत हो गई.

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सांप्रदायिक दंगे रोकने के लिए कानून नहीं, इंसाफ की जरुरत

भारत दुनिया का एक मज़बूत लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसने सभी महत्वपूर्ण धर्मों के मानने वालों को अपने यहां शरण दी. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय धार्मिक और आध्यात्मिक रहनुमाओं ने इस सरज़मीं को अपना आशियाना बनाया और पूरा जीवन मानवता के कल्याण, शांति और भाईचारे के लिए अर्पित कर दिया.

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दंगा मुक्त भारत की ओर

विभाजन के बाद भारत में पहला सांप्रदायिक दंगा 1961 में जबलपुर में हुआ, तबसे दंगों का सिलसिला अनवरत जारी है. 1980 के दशक में सांप्रदायिक हिंसा में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई. विभिन्न समुदायों के बीच शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे बहुत बड़ा रोड़ा बन गए हैं.

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सांप्रदायिक दंगे और 2010

स्‍वतंत्रता के बाद के भारत में शायद ही कोई ऐसा साल गुजरा हो, जो पूरी तरह से दंगामुक्त रहा हो. कुछ साल तो सांप्रदायिक दंगों की भयावहता और व्यापकता के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. इनमें शामिल हैं 1992-93 (बाबरी विध्वंस के बाद हुए दंगे), 2002 (गुजरात) और 2008 (कंधमाल में ईसाई विरोधी हिंसा).

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हमारा गणतंत्र कहां जा रहा है?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण में सुनाया गया हालिया निर्णय भारत के न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर है. एक अर्थ में यह बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की घटना का समापन पर्व है, क्योंकि अदालत ने इस ग़ैर क़ानूनी कृत्य को विधिक स्वीकृति प्रदान कर दी है.

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कश्‍मीरियों के सिर पर गोली मत मारो

पिछले चुनाव के बाद जब उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर की सत्ता संभाली थी, तो लोगों ने उनसे बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगाई थीं. आम धारणा यही थी कि उमर नई पीढ़ी के हैं, जवान हैं, केंद्र सरकार में मंत्री रहने का अनुभव उनके पास है, इसलिए उनके काम करने का तरीका कुछ अलग होगा.

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जम्‍मू- कश्‍मीरः क्‍यों बिगड़े हालात?

तीन माह से हिंसा की भट्ठी में जल रही कश्मीर घाटी में हर गुज़रने वाले दिन के साथ हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. जब कश्मीर के हालात पर नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बैठक चल रही थी, तब भी घाटी के विभिन्न क्षेत्रों में हिंसा जारी थी. इस दिन पुलिस और सेना की फायरिंग में 17 लोग मारे गए और 100 घायल हो गए.

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उदयपुर सांप्रदायिक दंगाः राजस्‍थान पुलिस ने गुजरात दोहराया

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की राजस्थान के उदयपुर ज़िले के सारदा नामक क़स्बे में हुई सांप्रदायिक हिंसा की जांच रिपोर्ट मेरे सामने है. यह हिंसा एक मीणा आदिवासी की हत्या के बाद भड़की. यह हत्या विशुद्ध आपराधिक थी. पीयूसीएल के दल में वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश नंदवाना, विनीता श्रीवास्तव, अरुण व्यास, श्यामलाल डोगरा, श्रीराम आर्य, हेमलता, राजेश सिंह एवं रशीद शामिल थे.

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कंधमाल हिंसा: यह आग कब और कैसे बुझेगी?

ईसा मसीह की टूटी मूर्ति, अधजले धर्मग्रंथ, जले घर, घर से बाहर झांकता एक मासूम चेहरा और तिलक-चंदन लगाकर लोगों को फिर से हिंदू बनाने का आयोजन. यह कहानी वे तस्वीरें ख़ुद बयां करती हैं, जो कंधमाल में अल्पसंख्यक ईसाइयों के ख़िला़फ हिंसा के दौरान या उसके बाद ली गई हैं.

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कश्‍मीर: कैसे रूके अंतहीन हिंसा का सिलसिला?

कश्मीर में जारी विवाद का कोई अंत नज़र नहीं आ रहा है. हमारे सशस्त्र बल, विशेषकर सीआरपीएफ समस्या को बढ़ा रहे हैं. दुर्भाग्यवश, कश्मीर समस्या को आज भी केवल क़ानून और व्यवस्था की समस्या माना जा रहा है. आम लोगों की महत्वाकांक्षाओं, उनके सपनों और उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

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संघ पर आखिर निर्णायक कार्रवाई कब?

हिंदुस्तानी अवाम को बरसों से सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने का दावा करने वाले संघ का असली चेहरा एक बार फिर सारे मुल्क के सामने उजागर हुआ है. अभी हाल ही में एक अंग्रेज़ी दैनिक के स्टिंग ऑपरेशन में संघ से मुताल्लिक जो सच्चाइयां निकल कर आई हैं, वे इतनी खतरनाक हैं कि हुकूमत के होश उड़ा दें.

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…ताकि आतंकवादी हमले न होने पाएं

पाक़िस्तान में आतंकवाद का एक और उत्पात. लाहौर छावनी में दो धमाके और रिहायशी इलाक़ों में छिटपुट विस्फोट. इन धमाकों ने चंद लम्हों में ही दर्ज़नों मासूमों को मौत के मुंह में धकेल दिया. इसके कुछ देर बाद ही मिन्गोरा में भी धमाका हुआ और फिर से कुछ मासूम ज़िंदगियां मौत के मुंह में समा गईं.

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ऑपरेशन ग्रीन हंट सफलता पर सवालिया निशान

काफी जद्दोजहद के बाद झारखंड में ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू हुआ. केंद्र सरकार के दिशानिर्देश पर सूबे में उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने और नक्सलियों पर नकेल कसने के उद्देश्य से यह अभियान जारी है.

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सांप्रदायिक हिंसा विधेयक रोग से बदतर इसका इलाज है

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकार को संसद के बजट सत्र में सांप्रदायिक हिंसा विधेयक प्रस्तुत करने की मंज़ूरी दे दी है. इस विधेयक का मूल प्रारूप सन्‌ 2005 में तैयार हुआ था. सन्‌ 2002 के गुजरात क़त्लेआम में भाजपा सरकार व नरेंद्र मोदी की भूमिका से नाराज़ मुसलमानों ने 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस को बड़े पैमाने पर अपना समर्थन दिया, जिसके कारण एन.डी.ए गठबंधन को धूल चाटनी पड़ी.

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आत्मसमर्पण का मतलब शांति की बहाली नहीं

पिछले डेढ़ दशकों से असम के दो पहाड़ी ज़िलों में दहशत फैला रहे उग्रवादी संगठन डी एच डी (जे) उ़र्फ ब्लैक विडो के आत्मसमर्पण के साथ ही दोनों ज़िलों में शांति बहाली की उम्मीद पैदा हुई है. नृशंसतापूर्वक नरसंहारों को अंजाम देने वाले इस उग्रवादी संगठन के हथियार डाल देने के बावजूद आम लोग उत्तर कछार पर्वतीय ज़िले और कार्बी आंग्लांग ज़िले में स्थायी रूप से शांति की बहाली को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. असम की जनता इस तरह के आत्मसमर्पण और संघर्ष विराम के कई प्रसंगों को देख चुकी है और उसे इस बात का कड़वा अनुभव है कि हथियार डाल देने के बावजूद उग्रवादी संगठन हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ पाते. दूसरी तऱफ शांति प्रक्रिया के प्रति ढुलमुल रवैया अपनाकर सरकार भी उग्रवादियों को नए सिरे से हथियार उठाने का मौक़ा प्रदान करती है. जनता के मन में सवाल है कि डीएचडी (जे) के हथियार डाल देने से शांति क़ायम हो पाएगी या पहले की तरह उग्रवाद का आतंक

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ईरान में हिंसात्मक कार्रवाइयों का सच

आम धारणा यह है कि ईरान में 1979 में जो इस्लामी इंक़लाब आया था उसके सर्वेसर्वा अयातुल्लाह खुमैनी थे. पहली बात तो यह है कि यह धारणा पूरी तौर से सही नहीं है. ईरान में 1979 में होने वाली क्रांति की बुनियाद 1954 में सोशलिस्ट लीडर और प्रधानमंत्री रहे मुसाद्दीक़ ने रखी थी,

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