वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना: अब हिरणों की बारी

जब हम किसी हिरण को लाठी से तड़पा-तड़पा कर मारते हैं तो सबसे ज़्यादा क़ीमत उसकी खाल की मिलती है. एक खाल के पंद्रह-बीस हज़ार रुपये मिल जाते हैं. गोली से मारने पर बहुत कम दाम मिलते हैं और खतरा भी बढ़ जाता है. यह काम मैं अकेले नहीं करता, पूरी टीम काम करती है. टीम का नेतृत्व हमारा मुखिया करता है. उसके पास दूरदराज से बड़े-बड़े बाबू लोग आते हैं, दाम तय करते हैं. उसके बाद उनके ठिकाने तक माल पहुंचाने की ज़िम्मेदारी हमारी होती है. यह कहना है हिरणों को मारकर उनकी खाल और अंगों की तस्करी करने वाले गिरोह के एक सदस्य का.

Read more