शिरडी पहुंचने के प्रथम दिन ही बाला साहेब और हेमाड पंत के बीच गुरु की आवश्यकता पर वाद-विवाद छिड़ गया. हेमाड पंत इस वाक़िये को कुछ इस प्रकार बयां करते हैं. उस समय मेरा मत था कि स्वतंत्रता त्याग कर पराधीन क्यों होना चाहिए और जब कर्म करना ही पड़ता है, तब गुरु की आवश्यकता ही कहां रही. प्रत्येक को पूर्ण प्रयत्न कर स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिए.
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सुबह, दोपहर और शाम, तीन समय बाबा की आरती होती थी और बाबा के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती थी. ठीक उसी समय मस्जिद में घंटी बजने लगी. बाबा के भक्त रोज़ाना दोपहर को बाबा की पूजा और आरती करते थे, यह घंटी दोपहर की जा-आरती की सूचक थी.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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