इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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राष्ट्र और पूंजी

ध्‍यान देने की बात यह है कि ये पूंजीवादी धनिक उन्हीं चीज़ों में अपने रुपये लगाते हैं या दूसरों से लेकर लगाते हैं, जहां इनको जल्दी से जल्दी ज़्यादा से ज़्यादा मुना़फा नज़र आता है. देश के लिए क्या काम करना अच्छा है, इसमें इनकी तनिक भी आस्था नहीं.

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वितरण का माध्यम मुद्रा

साम्यवाद के संबंध में अख़बारों से पढ़कर आपने शायद सोचा होगा कि यह रूस द्वारा चलाई गई भयानक आर्थिक नीति है, जिसके द्वारा मानव की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एकांत रूप से उपेक्षित होती है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है. साम्यवाद तो वित्त वितरण का बड़ा ही आदरणीय और सुगम मार्ग है, जो हज़ारों वर्षों से, किसी न किसी रूप में, कुछ अंशों में भारत में विद्यमान रहा है.

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समाजवाद क्या है

समाजवाद का मूल सिद्धांत है देश की कमाई को नए ढंग से बांटना. आपने शायद लक्ष्य नहीं किया हो, पर यह सत्य है कि देश की आय प्रत्येक दिन प्रत्येक क्षण बंटती रहती है और उस आय का बंटवारा होता ही रहेगा. जब तक देश में एक से अधिक व्यक्ति मौजूद रहेंगे, तब तक अहर्निश यह बंटवारा होता ही रहेगा.

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जादुई संख्या के भरोसे चलती सरकार

हिच्हाइकर्स गाइड टू द गैलेक्सी के दीवाने यह जानते हैं कि ज़िंदगी का रहस्य क्या है? उनके मुताबिक़, यह एक जादुई संख्या 42 है. इसी तरह यूपीए सरकार के पास भी एक जादुई संख्या है. यह जादुई संख्या जीडीपी विकास दर है. जब भी सरकार किसी मुसीबत में ख़ुद को पाती है, तब उस व़क्त यही जीडीपी उसके लिए आशा की किरण बन जाती है.

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राष्ट्रमंडल खेल का हिसाब मांगें

राष्ट्रमंडल खेल खत्म हो गए हैं. इन खेलों पर जो पैसा ख़र्च हुआ है, वह हमारा-आपका पैसा था. अगर यह पैसा करों के रूप में न वसूला गया होता तो हम-आप इसे अपने परिवार के लिए कई तरह की सुविधाएं और सामान जुटाने पर ख़र्च कर सकते थे, इसे अपने क्षेत्र, अपने गांव या शहर की बेहतरी पर ख़र्च कर सकते थे.

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मिलिए लोकतंत्र के राजाओं से

राजनीति पेशा है या समाजसेवा का ज़रिया, इसका जवाब इस साल संसद के मानसून सत्र को देखकर पता लग जाता है. सत्र के दौरान सांसदों ने जिस तरीक़े से अपना वेतन और भत्ता बढ़ाने की मांग की, उससे यह साफ हो गया कि इन माननीयों के लिए राजनीति समाजसेवा का ज़रिया तो कतई नहीं हो सकती.

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गोदामों में सड़ता अनाज और सरकार

हमारे मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर अनाज की बर्बादी पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. गोदामों और खुले आसमान के नीचे रखे अनाज के लगातार सड़ने की घटनाओं पर सख्त रवैया अपनाते हुए अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि अनाज को सड़ने देने के बजाय बेहतर होगा कि उसे मुल्क की ग़रीब जनता में बांट दिया जाए.

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मुशर्ऱफ की सुरक्षा पर प्रतिदिन 25 हज़ार पौंड का ख़र्च!

एक निजी टेलीविज़न की रिपोर्ट के अनुसार, बेनज़ीर भुट्टो हत्याकांड पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट सामने आने के बाद पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ से सरकारी प्रोटोकॉल और सुरक्षा वापस ले ली गई है. ब्रिटिश सरकार ने रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद परवेज़ मुशर्ऱफ की सुरक्षा में लगे जवानों की वीज़ा अवधि बढ़ाने से भी इंकार कर दिया.

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