आज़ादी की गाथा को ब़खूबी बयां करती ये देशभक्ति फिल्में

बॉलीवुड स्टार्स को जब हम किसी सैनिक या आर्मी ऑफिसर्स का रोल प्ले करते देखते हैं, तो दिल में देशभक्ति

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गंगा बचाओ अभियान : लौटा द नदिया हमार

बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित लंगट सिंह कॉलेज में बीते दिनों गंगा समाज के प्रतिनिधियों, साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, समाजशास्त्रियों, संस्कृतिकर्मियों,

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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सीमेंट कारखानों के लिए भूमि अधिग्रहण : किसान आखिरी दम तक संघर्ष करें

देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है, तो सरकार का इशारा आम आदमी और किसान की तऱफ होता है. आज़ादी के बाद से दस करोड़ लोग भूमि अधिग्रहण की वजह से विस्थापित हुए हैं. अपनी माटी से अलग होने वालों में कोई पूंजीपति वर्ग नहीं होता. विकास की क़ीमत हमेशा आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है. जिनके पास धन है, वे दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अपने मनमाफिक मकान ख़रीद सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आख़िर वह कहां जाएगा? ऐसे कई ज्वलंत सवालों पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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जन सत्‍याग्रह- 2012 अब सरकार के पास विकल्‍प नहीं है

जन सत्याग्रह मार्च ग्वालियर से 3 अक्टूबर को शुरू हुआ. योजना के मुताबिक़, क़रीब एक लाख किसान ग्वालियर से चलकर दिल्ली पहुंचने वाले थे. इस मार्च में शामिल होने वालों में सभी जाति-संप्रदाय के अदिवासी, भूमिहीन एवं ग़रीब किसान थे. ग्वालियर से आगरा की दूरी 350 किलोमीटर है. हर दिन लगभग दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ यह मार्च दिल्ली की तऱफ बढ़ रहा था.

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सीमेंट फैक्ट्रियों के लिए भूमि अधिग्रहणः खूनी मैदान में तब्‍दील हो सकता है नवलगढ़

करीब पांच दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 को जिस राजस्थान के नागौर ज़िले में पंचायती राज का शुभारंभ किया था, उसी सूबे की पंचायतों और ग्राम सभाओं की उपेक्षा होना यह साबित करता है कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने देखा था, वह आज़ादी के 65 वर्षों बाद भी साकार नहीं हो सका.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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जनता को चिढ़ाइए मत, जनता से डरिए

शायद सरकारें कभी नहीं समझेंगी कि उनके अनसुनेपन का या उनकी असंवेदनशीलता का लोगों पर क्या असर पड़ता है. फिर चाहे वह सरकार दिल्ली की हो या चाहे वह सरकार मध्य प्रदेश की हो या फिर वह सरकार तमिलनाडु की हो. कश्मीर में हम कश्मीर की राज्य सरकार की बात इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि कश्मीर की राज्य सरकार का कहना है कि वह जो कहती है केंद्र सरकार के कहने पर कहती है, और जो करती है वह केंद्र सरकार के करने पर करती है.

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल: काला कानून, काली नीयत

उदारीकरण का दौर शुरू होते ही जब सवा सौ साल पुराने भूमि अधिग्रहण क़ानून ने अपना असर दिखाना शुरू किया, तब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को यह मुद्दा अपनी छवि बनाने के एक अवसर के रूप में दिखा. नतीजतन, अपनी तऱफ से उन्होंने इस कानून में यथाशीघ्र संशोधन कराने की घोषणा कर दी. घोषणा चूंकि राहुल गांधी ने की थी, इसलिए उस पर संशोधन का काम भी शुरू हो गया.

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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राजस्‍थान का नंदीग्राम नवलगढ़ : सीमेंट फैक्‍ट्री के लिए भूमि अधिग्रहण

बिन पानी सब सून. राजस्थान के अर्द्ध मरुस्थलीय इलाक़े शेखावाटी की हालत कुछ ऐसी ही है. यहां के किसानों को बोरवेल लगाने की अनुमति नहीं है. भू-जल स्तर में कमी का खतरा बताकर सरकार उन्हें ऐसा करने से रोकती है. दूसरी ओर राजस्थान सरकार ने अकेले झुंझुनू के नवलगढ़ में तीन सीमेंट फैक्ट्रियां लगाने की अनुमति दे दी है. इसमें बिड़ला की अल्ट्राटेक और बांगड़ ग्रुप की श्री सीमेंट कंपनी शामिल है.

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिलः ग्रामीण विकास या ग्रामीण विनाश

ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.

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जनरल की जंग जारी है

जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के इतिहास के एक ऐसे सिपाही साबित हुए हैं, जिसने सेना में रहते हुए भी देश हित में भ्रष्टाचार के खिला़फ जंग लड़ी और सेना से रिटायर होने के बाद भी अपनी उस लड़ाई को जारी रखा. जनरल वी के सिंह जब तक सेना में रहे, वहां व्याप्त भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाते रहे और पहली बार ऐसा हुआ कि सेना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के बारे में उस आम आदमी को पता चला, जिसके पैसों की खुली लूट सेना में मची हुई थी तथा अभी भी जारी है.

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कर्ज का कुचक्र और किसान

बीते 22 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद जनपद की तहसील रुदौली के सिठौली गांव में ज़मीन नीलाम होने के डर के चलते किसान ठाकुर प्रसाद की मौत हो गई. ठाकुर प्रसाद का बेटा अशोक गांव के एक स्वयं सहायता समूह का सदस्य था. उसने समूह से कोई क़र्ज़ नहीं लिया था. समूह के जिन अन्य सदस्यों ने क़र्ज़ लिया था, उन्होंने अदायगी के बाद नो ड्यूज प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया था.

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कब्रिस्तानों पर अवैध क़ब्ज़े : दफ़न के लिए दो गज़ ज़मीन भी मयस्सर नहीं

लोगों ने अपनी ज़मीन-जायदाद वक़्फ करते व़क्त यही तसव्वुर किया होगा कि आने वाली नस्लों को इससे फायदा पहुंचेगा, बेघरों को घर मिलेगा, ज़रूरतमंदों को मदद मिलेगी, लेकिन उनकी रूहों को यह देखकर कितनी तकली़फ पहुंचती होगी कि उनकी वक़्फ की गई ज़मीन-जायदाद चंद सिक्कों के लिए ज़रूरतमंदों और हक़दारों से छीनकर दौलतमंदों को बेची जा रही है.

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बंजर भूमि का बढ़ता खतरा

उपजाऊ शक्ति के लगातार क्षरण से भूमि के बंजर होने की समस्या ने आज विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है. सूखा, बाढ़, लवणीयता, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल और अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर में गिरावट आने से सोना उगलने वाली उपजाऊ धरती मरुस्थल का रूप धारण करती जा रही है.

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उत्तराखंडः पिंडरगंगा घाटी, ऐसा विकास किसे चाहिए

पिंडरगंगा घाटी, ज़िला चमोली, उत्तराखंड में प्रस्तावित देवसारी जल विद्युत परियोजना के विरोध में वहां की जनता का आंदोलन जारी है. गंगा की सहायक नदी पिंडरगंगा पर बांध बनाकर उसे खतरे में डालने की कोशिशों का विरोध जारी है. इस परियोजना की पर्यावरणीय जन सुनवाई में भी प्रभावित लोगों को बोलने का मौक़ा नहीं मिला. आंदोलनकारी इस परियोजना में प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं.

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मुंबई : पुनर्विकास के बहाने महाराष्ट्र सरकार आराम नगर को बेचना चाहती है

कहते हैं मुंबई में खाने को मिल जाता है, रहने की जगह आसानी से नहीं मिलती. ऐसे में अगर किसी मुंबईवासी को अपना 65 साल पुराना घर छोड़ने के लिए सरकार मजबूर करे तो इसे क्या कहेंगे? सरकार घर तोड़ने की धमकी दे तो किसी पर क्या बीतती होगी?

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श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़

मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.

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छोटा नागपुर काश्‍तकारी अधिनियमः मुंडा सरकार की नई परेशानी

छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम की धारा 46 पर बहस के पहले उस पृष्ठभूमि को समझना बहुत ज़रूरी है, जिसके अंतर्गत यह अधिनियम अंग्रेजों ने 1908 में पारित किया और जो 11 नवंबर, 1908 को लागू हुआ, परंतु संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम बहुत पहले 1860 में ही पारित कर दिया गया था.

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उत्तर प्रदेशः उत्‍पीड़न के खिलाफ वन गूजरों का आंदोलन

बीते 15 अगस्त को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, उसी दिन उत्तर प्रदेश के जनपद गोंडा में वन टांगिया महिलाओं ने एक बार फिर प्रशासन के जोर-जुल्म के खिलाफ जोरदार आंदोलन करके उन चार मजदूरों को रिहा करा लिया, जिन्हें डिप्टी रेंजर की फर्जी-झूठी तहरीर के आधार पर पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था.

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अब यमुना एक्स्प्रेस-वे के खिलाफ शंखनाद

ग्रेटर नोएडा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा किसानों को राहत मिलने के बाद अब यमुना एक्सप्रेस-वे प्राधिकरण से प्रभावित किसानों ने भूमि अधिग्रहण को लेकर आंदोलन का शंखनाद कर दिया है. नतीजतन नोएडा विस्तार की तरह यमुना एक्सप्रेस-वे पर बसाई जा रही एशिया की सबसे बड़ी शहरी बस्ती पर ख़तरे के बादल मंडराने लगे हैं.

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ग्रेटर नोएडा : सपने संजोने और बिखरने की दास्तां

भूमि अधिग्रहण मामले में सरकार का रवैया और आला अ़फसरों का लालच किसानों, बिल्डरों और अपने घर का सपना संजोने वाले लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गया है. सरकार की कोताही यह है कि भूमि अधिग्रहण संशोधित विधेयक को अब तक क़ानून का रूप नहीं दिया गया. अंग्रेज़ी शासनकाल के क़ानून आज भी लागू हैं, जिसके कारण अक्सर जनता और सरकार के बीच टकराव के हालात पैदा हो जाते हैं.

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बिहारः पांच हजार एकड़ भूमि पर माओवादी प्रतिबंध

प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने ज़िले के विभिन्न प्रखंडों में सौ से अधिक लोगों की लगभग पांच हज़ार एकड़ भूमि पर आर्थिक नाकेबंदी लगा रखी है, जिसके कारण पिछले कई वर्षों से इस भूमि पर खेती नहीं हो पा रही है. माओवादियों के डर से प्रतिबंधित भूमि पर कोई भी व्यक्ति बटाई खेती करने के लिए भी तैयार नहीं है. जिन लोगों की भूमि पर खेती प्रतिबंधित की गई है, उनमें अधिकांश अपने-अपने गांव छोड़कर ज़िला मुख्यालय गया अथवा अन्य शहरों में रह रहे हैं.

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इलाहाबाद हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसानों के हौसले बुलंद

सार्वजनिक विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन हथियाने के सरकारी मंसूबों पर पानी फिरता नज़र आ रहा है. इलाहबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ग्रेटर नोएडा के किसानों की ज़मीन के बारे में जो फैसले आए हैं, वे इंसाफ़ के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने की ताक़त रखते हैं.

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