फ्लायड मेवैदर आजकल अपनी गर्लफ्रेंड से बॉक्सिंग पर उतारू हैं. वर्ल्ड बॉक्सिंग काउंसिल वेल्टरवेट चैंपियन फ्लायड मेवैदर को पिछले दिनों लास वेगास की एक अदालत ने अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड पर हमला करने के आरोप में तीन महीने कैद की सज़ा सुनाई है.
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कई बार लोक सूचना अधिकारी किसी आरटीआई आवेदन के जवाब में कहता है कि फलां सूचना तीसरे पक्ष से जुड़ी है, इसलिए आपको नहीं दी जा सकती या मामला अदालत में विचाराधीन है या फिर अमुक सूचना सार्वजनिक करने से संसद की अवमानना होगी
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मुंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल के होश उड़ा दिए हैं. स़िर्फ हर्षवर्धन पाटिल ही ऐसे मंत्री नही हैं. अगर आप मंत्रियों के वातानुकूलित कक्ष के पास से गुजरें तो आपको हर जगह एक जैसा अनुभव होगा. अधिकतर मंत्री विलासी प्रवृत्ति के होते हैं. उनकी इस प्रवृत्ति से आम आदमी अचंभित और हैरान-परेशान होता है, परंतु सत्ताधीशों को इस संदर्भ में कोई अफसोस नहीं होता.
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जमीन वह संपत्ति है, जो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को बस हस्तांतरित करती है यानी कोई इसका मालिक नहीं होता. हां, केयर टेकर कह सकते हैं. ज़मीन और किसान के बीच कुछ ऐसा ही संबंध था. लेकिन 90 के दशक की शुरुआत में उदारीकरण और निजीकरण की आंधी आने के साथ ही ज़मीन और किसान के इस सनातन संबंध को कमज़ोर बनाने का प्रयास किया जाने लगा, जो सरकार, ब्यूरोक्रेसी और उद्योगपतियों की साठगांठ का नतीजा था.
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भारत की न्यायपालिका पर काम का बोझ बहुत है, जिसकी वजह से बहुत सारी परेशानियों ने जन्म लिया है. आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इसका तोड़ निकालें. साथ ही ज़रूरत है कुछ और विषयों पर सोचने की, जैसे उच्च स्तर पर न्यायपालिका में पारदर्शिता. इसी से जुड़ा हुआ मुद्दा है न्यायपालिका की जवाबदेही का.
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बीती 22 फ़रवरी को सत्र न्यायालय ने गोधरा रेल आगज़नी मामले में अपना फैसला सुनाया. अदालत ने गुजरात सरकार के इस आरोप को सही ठहराया कि स्थानीय मुसलमानों ने साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाने का षड्यंत्र रचा था. जिन 94 आरोपियों पर मुक़दमा चल रहा था, उनमें से 63 को बरी कर दिया गया और 31 को साज़िश के तहत कारसेवकों को ज़िंदा जलाने का दोषी ठहराया गया
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न्याय के साथ विकास और अपराध-भ्रष्टाचार मुक्त बिहार बनाने की बातें अच्छी लगती हैं तथा नीतीश कुमार ने अपना यह वादा पूरा करने की हर मुमकिन कोशिश भी की, लेकिन क़ानून का राज अभी पूरी तरह क़ायम नहीं हुआ है. क़ानून का पालन कराने वाली एजेंसी ईमानदारी से काम नहीं कर रही है.
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अरुणा शानबाग के बहाने देश में इच्छा मृत्यु के मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई है, मगर क्या कभी सरकार ने यह सोचा है कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कोताही के कारण कितने लोग नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हैं. ये लोग किससे इच्छा मृत्यु की फरियाद करें.
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हमारे देश में ज़्यादातर मुक़दमे छोटे झगड़ों और आपसी अहम की लड़ाइयों के नतीजे होते हैं. इनमें कई मुकदमे ऐसे होते हैं, जिन्हें अदालत की जगह घंटों की बातचीत में आसानी से निपटाया जा सकता है.
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बिहार में नीतीश सरकार विकास एवं बेहतर कार्य संस्कृति के भले ही लाख दावे कर रही है, पर पटना हाईकोर्ट को लगता है कि सरकार में राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है. अदालत ने तो यहां तक कह दिया कि पटना जंगल है और यहां अफसरों की मिलीभगत से हर काम कराना संभव है.
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छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के उपाध्यक्ष बिनायक सेन को राजद्रोह के मामले में उम्रकैद की सज़ा सुनाई. बिनायक सेन को यह सज़ा कट्टर नक्सलियों के साथ संबंध रखने और उनको सहयोग देने के आरोप में सुनाई गई है.
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आम बड़ा स्वादिष्ट फल है. यह जब कच्चा होता है तो हम इसे नमक के साथ बड़े चाव से खाते हैं और जब पक जाता है तो यह मीठा हो जाता है, तो और भी खाने लायक हो जाता है. कहने का मतलब यह है कि आम प्राकृतिक तरीक़े से बढ़ता है. अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कच्चा खाएं, अचार बनाएं या फिर पकने का इंतज़ार करें. आम हर हाल में स्वादिष्ट होता है. अगर इसी आम को हम छोड़ दें तो यह सड़ने लग जाएगा. इसका स्वाद ख़त्म हो जाएगा. बीमारी फैलाने वाला फल बन जाएगा. कोई भी तंत्र इसी थ्योरी पर चलता है. किसी तंत्र के सड़ने का मतलब है आंतरिक विरोधाभास पैदा होना. देश में फैले भ्रष्टाचार के साम्राज्य में अंतर्विरोध पैदा होने लगा है. अब यह पूरा तंत्र सड़ने लगा है, इसलिए यह टूटने और बिखरने लगा है. जो लोग पहले मिल-जुलकर देश को लूट रहे थे, आज आपस में लड़ रहे हैं. यही वजह है कि एक अदालत दूसरी अदालत को भ्रष्ट बता रही है, एक राजनीतिक दल दूसरे को घोटालेबाज़ बता रहा है, उद्योगपति एक-दूसरे को जालसाज बता रहे हैं, एक अधिकारी दूसरे अधिकारी के बारे में ख़ुलासा कर रहा है. मीडिया भी इस सड़न से बदबूदार हो रहा है. राजनीतिक दल, सरकारें, अदालतें, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, उद्योगजगत या फिर फिल्मी सितारे सब सड़ चुके हैं. आम का रसास्वादन करने वाले, सरकारी तंत्र से नाजायज फायदा उठाने वाले अब एक-दूसरे पर वार कर रहे हैं. हर तरफ चाकू निकल रहे हैं. यही वजह है कि पिछले पांच महीने में एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं.
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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया |
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