शिविरों में नवजात बच्चों की मां से मिलने आनंद भारती निकलते हैं तो उनकी भी आंखें नम हो जाती हैं. नूरजहां बेगम से जब वह मुख़ातिब होते हैं तो उसके चेहरे पर बच्ची जनने की मुस्कान अनुपस्थित है. बावजूद इसके उसने अपनी बेटी का नाम मुस्कान रखा है. कहती है कि अंधेरा हमेशा नहीं रहता है. अफसाना बानू का आशियाना उजड़ चुका है. आशियाने की उसके अंदर ललक है.
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जनसंघर्ष मोर्चा देश की लोकतांत्रिक और बदलाव चाहने वाली ताक़तों का राष्ट्रीय मंच है. इसमें समाजवादी, दलित, आदिवासी-वनवासी और वामपंथी आंदोलन से जुड़ी ताक़तें शामिल हैं. इसका सबसे प्रमुख आंदोलन है, दाम बांधो-काम दो अभियान.
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चौथी दुनिया ने पिछले अंक से अपने पाठकों एवं आम लोगों तक सूचना का अधिकार क़ानून की जानकारी पहुंचाने के रूप में एक नई पहल की है. चौथी दुनिया आपको देगा वह ताक़त, जिससे आप पूछ सकेंगे सही सवाल.
Tags: Information, PIO, Post Office, Public Information Officer, RTI, information officers, law, rights, अधिकार, आंदोलन, आरटीआई, जन सूचना अधिकारी, जनता, डाकघर, पीआईओ, सूचना, क़ानून Posted in जरुर पढें, विधि-न्याय by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | 1 Comment » | Read More... |
गोरखा जन मुक्ति मोर्चे के मुखिया विमल गुरुंग अपने आंदोलन को गांधीवादी करार देते हैं, पर ज़रूरत पड़ने पर वह सुभाषपंथी होने में देर नहीं करते. ऐसा एक बार नहीं, बार-बार दिखा है. पहाड़ पर चलने वाले वाहनों में गोरखालैंड की नंबर प्लेट लगाने, अपने इलाक़े में समानांतर पुलिस व्यवस्था बहाल करने और हाल में [...]
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ईद पर हमने प्रार्थना की थी कि सभी के घर ख़ुशियां दस्तक दें, लेकिन दस्तक महंगाई ने दी, दरवाज़ा ऩफरत ने खटखटाया, यहां तक कि देश में होने वाले कॉमन वेल्थ खेलों को न होने देने की धमकी बाहर से भी मिली और अंदर से भी.
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एक थे जॉर्ज फर्नांडिस, जिन्होंने समाजवादी आंदोलन को भारत में डॉक्टर लोहिया के नेतृत्व में मधुलिमए के साथ मिलकर शानदार शक्ल दी. समाजवादी आंदोलन ने भारतीय राजनीति में नेतृत्व करने वाले ऐसे व्यक्तियों को पैदा किया, जिन्होंने अपने शुरुआती दिनों में आम आदमी और उसकी परेशानियों को दूर करने के लिए का़फी संघर्ष किए.
Tags: BJP, Bihar, Congress, George Fernandes, India, Lok Sabha, Movement, Nitish Kumar, Rajya Sabha, Samajwadi Party, Sharad Yadav, Union Minister, elections, strikes, आंदोलन, कांग्रेस, केंद्रीय मंत्री, चुनाव, जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार, बिहार, भाजपा, भारत, राजनीति, राज्यसभा, लोकसभा, शरद यादव, हड़ताल Posted in जब तोप मुकाबिल हो, जरुर पढें, राजनीति, संपादकीय, साक्षात्कार by Author: संतोष भारतीय | No Comments » | Read More... |
जिस देश के नेताओं पर चारा, खाद, चीनी खा जाने और कोलतार पी जाने तक के आरोप लगते हों, वहां की जनता (अपेक्षाकृत अमीर) अगर ग़रीबों का राशन हड़प ले तो ज़्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिए. लेकिन आश्चर्य तब होता है, जब यह सब कुछ देश की राजधानी यानी दिल्ली में हो रहा हो.
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कोलकाता की सड़कों से हाथ रिक्शा हटाने की अब कोई हड़बड़ी नहीं दिखती. शायद अगले विधानसभा चुनाव तक सरकार को इसकी ज़रूरत नहीं लगती. कभी हावड़ा पुल के साथ-साथ हाथ रिक्शा को भी कोलकाता की पहचान के तौर पर प्रस्तुत किया जाता था. गणतंत्र दिवस की झांकियों में गनेसी अपनी टुनटुनिया गाड़ी लिए राजपथ पर टहलता दिखता था.
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आचार्य राममूर्ति हमारे बीच में हैं और उसी शिद्दत के साथ हैं, जैसे 1954 में थे. 1938 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए इतिहास में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर उन्होंने बनारस के क्वींस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. 1954 में कॉलेज की नौकरी छोड़कर वह श्री धीरेंद्र मजूमदार के आह्वान पर श्रमभारती खादीग्राम (मुंगेर, बिहार) पहुंचे, जहां उन्होंने श्रम-साधना, जीवन-शिक्षण और सादा जीवन के अभ्यास के साथ एक नए जीवन की शुरुआत की.
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आज जो हो रहा है, उससे मुझे घबराहट होती है. अहिंसात्मक आंदोलन का प्रयोग करने के पहले ही लोग मन बना लेते हैं कि अहिंसा से कुछ होने वाला नहीं है, इसलिए हिंसात्मक आंदोलन शुरू करो. अनुभव से लोगों ने सीखा है कि स़िर्फ हिंसा के सामने सरकारें झुकती हैं. नक्सली समस्या पर का़फी लिखा जा चुका है. पक्ष-विपक्ष में लिखा जा रहा है. ऐसा लगता है कि इस देश के लोग इस मुद्दे को लेकर दो भागों में बंट चुके हैं. एक समूह की मान्यता है कि देश में ग़रीबों के सामने का़फी परेशानियां हैं, इसलिए उन्होंने बंदूक़ उठा ली है तो ठीक ही किया है. दूसरे पक्ष की मान्यता है कि समस्या कितनी भी गंभीर हो, बंदूक़ उठाने का अधिकार आम जनता को नहीं है और स़िर्फ सरकार ही बंदूक़ उठा सकती है. मैं बार-बार इस कोशिश में लगा हूं कि इस खेल में जो तीसरा पक्ष है,
Tags: Movement, Naxalite, Pakistan, nonviolence, अहिंसा, आंदोलन, जनता, नक्सलवाद, पाकिस्तान Posted in आंदोलन, जरुर पढें, पड़ोस by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
बीते 19 नवंबर को दिल्ली का नज़ारा आम दिनों से अलग था. स़डक पर वाहनों की जगह जनसैलाब. हाथों में गन्ने का पौधा लेकर सरकार के खिला़फ नारा लगाते हज़ारों किसान. जंतर-मंतर के एक तऱफ हुक्का गु़डगु़डाते किसान यूनियन के नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत तो दूसरी ओर राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख चौधरी अजीत सिंह अपने-अपने समर्थकों के साथ डटे थे. उसी दिन संसद का सत्र शुरू होकर अगले दिन तक के लिए स्थगित भी हो चुका था. सो, नेताओं के पास समय की कमी नहीं थी. अलग-अलग घाट का पानी पीने वाले विभिन्न नेता यानी समूचा विपक्ष एक साथ, एक ही मंच से यूपीए सरकार का मर्सियां प़ढने में जुटा हुआ था. ज़ाहिर है, ऐसा मौक़ा बार-बार नहीं मिलता, वह भी बिना कुछ किए-धरे. दरअसल यह सारा विरोध केंद्र सरकार की नई गन्ना नीति को लेकर है. केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया है, जिसके तहत गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) साल 2009-10 के लिए 129 रुपये 85 पैसे प्रति क्विटल तय किया गया है. साथ ही इस अध्यादेश के मुताबिक़, अगर राज्य सरकारें गन्ने का मूल्य एफआरपी से अधिक तय करती हैं तो उसकी भरपाई भी राज्य सरकार को ही करनी प़डेगी.
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आप सांसद हैं, देवता नहीं |
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