कटनी के विजय राघवगढ़ एवं बरही तहसीलों के दो गांवों डोकरिया और बुजबुजा के किसानों की दो फसली खेतिहर ज़मीनें वेलस्पन नामक कंपनी के ऊर्जा उत्पादक उद्योग हेतु अधिग्रहीत करने के संबंध में दाखिल सैकड़ों आपत्तियों एवं असहमति को शासन ने दरकिनार कर दिया.
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शहर हो या गांव, सरकारी विभागों को लेकर हर आदमी की परेशानी एक सी होती है. कभी बिजली विभाग, कभी जल विभाग, कभी टेलीफोन विभाग. चूंकि इन सभी विभागों से आपका साबका पड़ता है और जब कोई काम समय से न हो रहा हो, तब परेशान होना स्वाभाविक है.
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बाढ़ और पानी से शहरी जनता हलकान है, वहीं किसान परेशान. किसी के खेत पानी में डूब गए हैं तो किसी का घर-मकान और राशन-पानी बाढ़ लील गई. क़रीब 24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं. लोग छतों पर तिरपाल लगाकर, स्कूलों के बरामदों में, कुछ नहीं तो खुले में ही जीवनयापन कर रहे हैं.
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बापू जब मोहनदास करमचंद गांधी थे, नौजवान वकील थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने गए तो उनके साथ एक हादसा हुआ. गोरों ने उन्हें प्रथम श्रेणी में बैठने के लायक़ नहीं समझा और ज़बरदस्ती गाड़ी से धक्का देकर बाहर फेंक दिया. जब वह हिंदुस्तान वापस आए, उनके मन में हिंदुस्तान में कुछ काम करने की इच्छा जागी.
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हाल में जम्मू-कश्मीर में संपन्न हुए पंचायत चुनाव से राज्य में एक नई बयार देखने को मिली. बड़ी तादाद में घरों से निकल कर लोगों ने मतदान करके न स़िर्फ लोकतंत्र में अपनी आस्था व्यक्त की, बल्कि चुनाव बहिष्कार करने वालों को स्पष्ट संकेत भी दे दिया.
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बेतवा, शहजाद, केन, धसान, मंदाकिनी, यमुना, जामनी, एवं सजनाम जैसी सदा नीरा नदियां होने के बावजूद पानी के लिए तरस रहे लोगों के दर्द को समझना बड़ा कठिन है. बुंदेलखंड में जल युद्ध होने से कोई रोक नहीं सकता.
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शादी के ग्यारह साल बाद ससुराल जाने का मौक़ा मिला. लंबा अंतराल इस वजह से कि ससुराल के सब लोग बिहार के ऐतिहासिक शहर गया में बस गए थे. शादी भी वहीं से हुई और जब भी जाना हुआ गया ही गया. पत्नी के पैतृक गांव यानी अपनी असली ससुराल जाने का अवसर, जैसा कि ऊपर बता चुका हूं, शादी के ग्यारह साल बाद मिला.
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वर्ष 1857 के आंदोलन को अंग्रेजों ने किसी तरह दबा तो दिया, लेकिन यह बात उनकी समझ से बाहर थी कि आख़िर यह सब हुआ कैसे. यह आंदोलन कैसे हुआ, कैसे इतना फैला और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. ये सारी बातें समझने के लिए अंग्रेजों ने एक आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता सर ए ओ ह्यूम को सौंपी गई.
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आंध्र प्रदेश के वारंगल ज़िले की मचापुर ग्राम पंचायत का एक छोटा सा क्षेत्र था गंगादेवी पल्ली. ग्राम पंचायत से दूर और अलग होने के चलते विकास की हवा या कोई सरकारी योजना यहां के लोगों तक कभी नहीं पहुंची. बहुत सी चीजें बदल सकती थीं, लेकिन नहीं बदलीं, क्योंकि लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि कोई आएगा और उनकी ज़िंदगी संवारेगा, बदलाव की नई हवा लाएगा.
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आदिवासी समुदाय के हौसले को तो हमेशा ही सराहा जाता रहा है. एक बार फिर से उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जो काबिले तारी़फ है. हम बात कर रहे हैं मिर्जापुर ज़िले की आदिवासी महिलाओं की. जी हां मिर्जापुर ज़िले के लालगंज क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से इस गांव की तस्वीर बदल दी है.
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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया |
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