अन्ना हजारे मूल बातें कहते हैं, इसलिए बड़े-बड़े विद्वान उनसे बहस नहीं कर सकते. सांसद सेवक हैं और देश की जनता मालिक है. अगर सेवक मालिक की बात न माने तो मालिक को यह हक़ है कि वह उसे बाहर कर दे. यही दलील अन्ना हजारे की है. देश को भ्रष्ट सांसदों से छुटकारा दिलाने के लिए राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की मांग लेकर अन्ना हजारे और उनकी टीम आंदोलन करने वाली है.
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक मंत्रिमंडलीय साथी से कहा कि अन्ना बदमाश हैं और उनके साथी बदमाशी कर रहे हैं. आम तौर पर मनमोहन सिंह इस भाषा के लिए जाने नहीं जाते, लेकिन शायद देश में चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन का दबाव इतना था कि वह भाषा की शालीनता भूल गए. उसी तरह, जैसे मनीष तिवारी उम्र और राजनैतिक शिष्टाचार के सामान्य नियम भूलकर अन्ना हजारे को तुम और भ्रष्टाचार में लिप्त बता बैठे.
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भारतीय जनता पार्टी अब पार्टी विथ डिफरेंस के बजाय पार्टी इन डिलेमा बन गई है. दूसरे दलों से अलग होने का दंभ भरने वाली पार्टी अब असमंजस और विरोधाभास से ग्रसित हो चुकी है. वह भीषण गुटबाज़ी की चपेट में है, जिसकी वजह से पार्टी कार्यकर्ता आम जनता से दूर होते जा रहे हैं और पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में दूरियां बढ़ गई हैं. पार्टी के अंतर्द्वंद्व का हाल यह है कि नेता प्रतिपक्ष का कोई बयान आता है तो पार्टी के दूसरे नेता नाराज़ हो जाते हैं.
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लीबिया के हालात अभी भी गंभीर बने हुए हैं. न तो देश की जनता का विश्वास खो देने वाले मुअम्मर ग़द्दा़फी पीछे हटने को तैयार हैं और न जनता की तऱफ से सत्ता परिवर्तन के लिए लड़ रहे लड़ाके. इस बीच संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव से लैस नाटो की सेनाएं भी लड़ाकों के साथ मिलकर गद्दा़फी की सत्ता पलटने में जुट गई हैं. यह परिस्थिति अपने आप में विस्मयकारी है.
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हिंदुस्तान सबसे बड़ा प्रजातंत्र होने के बावजूद दुनिया का 72 वां सबसे भ्रष्ट देश है. दुनिया में 86 ऐसे देश हैं, जहां भारत से कम भ्रष्टाचार है. आज़ादी के बाद से ही हम भ्रष्टाचार के साथ जूझ रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिला़फ कारगर क़ानून बनाने की योजना इंदिरा गांधी के समय से चल रही है. 42 साल गुज़र गए, फिर भी हमारी संसद लोकपाल क़ानून बना नहीं सकी.
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मैंने दो पत्रकारों को बात करते सुना था. एक ने दूसरे से कहा कि उसने शेयर बाज़ार घोटाले के एक आरोपी को प्रधानमंत्री के पास चार करोड़ रुपये ले जाते देखा था. दूसरे ने तपाक से कहा कि उसे विश्वास नहीं होता, क्योंकि प्रधानमंत्री इतनी छोटी रकम पर तो छींक भी नहीं मारेंगे.
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पीवी नरसिम्हाराव के समय की एक बात मुझे हमेशा याद आती है. मैंने दो पत्रकारों को बात करते सुना था. एक ने दूसरे से कहा कि उसने शेयर बाज़ार घोटाले के एक आरोपी को प्रधानमंत्री के पास चार करोड़ रुपये ले जाते देखा था. दूसरे ने तपाक से कहा कि उसे विश्वास नहीं होता, क्योंकि प्रधानमंत्री इतनी छोटी रकम पर तो छींक भी नहीं मारेंगे.
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प्रजातंत्र में कोई भी सरकार तब तक प्रजातांत्रिक नहीं मानी जा सकती, जब तक वह अपने देश के नागरिकों के प्रति उत्तरदायी न हो, क्योंकि वह उन्हीं के लिए और उन्हीं के नाम पर राज्य करती है. एक संसदीय व्यवस्था में वह संसद के प्रति उत्तरदायी होती है. चलिए, बात शुरू से करते हैं.
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भारत ने पिछले दो दशकों में जिस ऊर्जा के साथ विकास किया है, सराहनीय है. लेकिन इस विकास का एक काला पक्ष भी है, जिसे न तो मीडिया देखना चाहता है और न ही देश का मध्यम वर्ग. इस विकास यात्रा के दौरान ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली गई. भारत में विश्व के 25 फीसदी ग़रीब लोग थे और आज यह प्रतिशत 39 हो गया है.
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जब भी किसी देश में लोग सड़कों पर बेरोज़गारी, महंगाई, ग़रीबी या किसी अन्य मांग को लेकर सरकार के खिला़फ लामबंद होते हैं तो उसे आंदोलन कहा जाता है. लेकिन जब कोई आंदोलन विद्रोह का रूप ले लेता है, जब किसी आंदोलन का मक़सद सत्ता परिवर्तन होता है तो उसे क्रांति कहते हैं.
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भारत के मुसलमान देश के सबसे पीड़ित और शोषित वर्गों का हिस्सा बन चुके हैं. राजनीति में मुसलमान हाशिए पर हैं. प्रशासन, सेना और पुलिस में मुसलमानों की संख्या शर्मनाक रूप से कम है, न्यायालयों में मुसलमानों की उपस्थिति बहुत कम है और बाकी कसर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की आर्थिक नीति ने पूरी कर दी है, जिसकी मार मुसलमानों पर सबसे ज़्यादा पड़ रही है.
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उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ने वाले उत्तर-दक्षिण गलियारे का भविष्य केंद्रीय मंत्री कमलनाथ की जिद के कारण खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है. व्यक्तिगत लाभ के लिए व्यास नदी की धारा को मोड़ने वाले कमलनाथ अब विशेषज्ञों द्वारा स्वीकृत उत्तर-दक्षिण गलियारे को अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा की ओर मोड़ना चाहते हैं.
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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया |
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