भारत-नेपाल को विभाजित करने वाली 1850 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा इन दिनों अतिक्रमण का शिकार होकर देश विरोधी तत्वों की शरणस्थली एवं तस्करों का एक प्रमुख अड्डा बन गई है. मालूम हो कि दोनों देशों के मध्य स्थित विभाजक रेखा को आम बोलचाल में नो मेंस लैंड कहा जाता है.
हमारा ईको सिस्टम तमाम जीवित प्राणियों के लिए का़फी अहम माना जाता है. इस व्यवस्था की सच्चाई से रूबरू होने के लिए आपको कृषि वैज्ञानिक होने की ज़रूरत नहीं है. कृषि तकनीक अगर जांची परखी न गई हो तो उसके असफल होने की आशंका रहती है.
पुराने दौर में बादशाह के फरमान को खुदा का फैसला माना जाता था. शासन के फैसले स़िर्फ एक शख्स के हाथ में होते थे. वही राज्य का पहला और आ़खिरी न्यायाधीश होता था. समय के साथ-साथ शासन चलाने का तरीक़ा बदला. फैसला कौन करे, इस निर्णय प्रक्रिया में लोग जुड़ने लगे. दुनिया के कई देशों में फैसले का अधिकार अब आम जनता के हाथों में आ गया है, जिसे हम प्रजातंत्र कहते हैं.
रतन टाटा इस देश की एक जानी-मानी हस्ती हैं. इनके और इन जैसे लोगों के बयान से देश की अर्थव्यवस्था का बैरोमीटर यानी सेंसेक्स का पारा ऊपर-नीचे होने लगता है. यही रतन टाटा तीन साल पहले मनमोहन सिंह सरकार को एक पत्र भेजते हैं. इस सुझाव के साथ कि भोपाल गैस कांड से प्रभावित स्थल की सा़फ-स़फाई के लिए 100 करो़ड रुपये का एक फंड या ट्रस्ट बनाया जाए.