32 रुपये में कैसे ज़िंदा रहा जा सकता है, यह कला योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को पूरे देश को सिखानी चाहिए. मोंटेक सिंह अहलुवालिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोस्त हैं. योजना आयोग की भूमिका देश के विकास में बहुत ही अहम है. इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या हम ऐसे देश में रह रहे हैं, जहां की सरकार को मालूम नहीं है कि देश में कितने ग़रीब हैं.
Tags: Inflation, growth, income, poor, poor planning, आय, गरीब, महंगाई, योजना, विकास, ग़रीब Posted in आर्थिक, कवर स्टोरी-2, कानून और व्यवस्था, विधि-न्याय, समाज by Author: डा. मनीष कुमार | No Comments » | Read More... |
हिंदुस्तान में एक अजीब चीज है. महंगाई बढ़ाने में सरकार को बहुत मज़ा आता है. सरकार जानबूझ कर महंगाई बढ़ाती है या ऐसा करना सरकार की मजबूरी है, यह सरकार जाने, वे अर्थशास्त्री जानें, जो झूठे आंकड़े तैयार करते हैं, लेकिन हिंदुस्तान के लोगों की ज़िंदगी कितनी मुश्किल हो रही है, यह बात न राजनीतिक दल समझ रहे हैं और न सरकार समझ रही है.
Tags: Economist, Hindustan, Inflation, Movement, party, political, अर्थशास्त्री, आंदोलन, दल, महंगाई, राजनीतिक, हिंदुस्तान Posted in कानून और व्यवस्था, जब तोप मुकाबिल हो, राजनीति, विधि-न्याय, संपादकीय, समाज by Author: संतोष भारतीय | No Comments » | Read More... |
क्या कहें, अपना माथा पीटें, भगवान को, अल्लाह को, गॉड को दोष दें, किस पर अपनी खीज निकालें? सीएजी की रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट में क्या नहीं है! देखने पर लगता है कि हम जिस देश में रह रहे हैं, उसमें ईमानदार प्रबंधन नाम की कोई चीज ही नहीं बची है. यह टू जी स्पेक्ट्रम का मसला नहीं है, जिसमें प्रधानमंत्री जी ने कह दिया कि उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. लोग उनको धमकाते रहे. उनके मंत्री ही उनको धमकाते रहे. प्रधानमंत्री खामोश रहे.
Tags: Bharatiya Janata Party, Democracy, Inflation, Parliament, Prime Minister, Public, political, politician, जनता, नेता, प्रधानमंत्री, भारतीय जनता पार्टी, महंगाई, राजनीतिक, लोकतंत्र, संसद Posted in कानून और व्यवस्था, जब तोप मुकाबिल हो, राजनीति, विधि-न्याय, संपादकीय, समाज by Author: संतोष भारतीय | 2 Comments » | Read More... |
भारतीय जनता पार्टी अब पार्टी विथ डिफरेंस के बजाय पार्टी इन डिलेमा बन गई है. दूसरे दलों से अलग होने का दंभ भरने वाली पार्टी अब असमंजस और विरोधाभास से ग्रसित हो चुकी है. वह भीषण गुटबाज़ी की चपेट में है, जिसकी वजह से पार्टी कार्यकर्ता आम जनता से दूर होते जा रहे हैं और पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में दूरियां बढ़ गई हैं. पार्टी के अंतर्द्वंद्व का हाल यह है कि नेता प्रतिपक्ष का कोई बयान आता है तो पार्टी के दूसरे नेता नाराज़ हो जाते हैं.
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यह कैसी सरकार है, जो जनता के खर्च को बढ़ा रही है और जीवन स्तर को गिरा रही है. वैसे दावा तो यह ठीक विपरीत करती है. वित्त मंत्री कहते हैं कि सरकार अपनी नीतियों के ज़रिए नागरिकों की कॉस्ट ऑफ लिविंग को घटाना और जीवन स्तर को ऊंचा करना चाहती है.
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अपने साथियों पर लिखना या टिप्पणी करना बहुत दु:खदायी होता है, क्योंकि हम इससे एक ऐसी परंपरा को जन्म देते हैं कि लोग आपके ऊपर भी लिखें. आप उन्हें आमंत्रित करते हैं. मैं यही करने जा रहा हूं. मैं अपने साथियों को आमंत्रित करने जा रहा हूं कि हमारे ऊपर जहां उन्हें कुछ ग़लत दिखाई दे, वे लिखें.
Tags: Corruption, Farmer, Inflation, PM, Supreme Court, editors, government officials, journalists, politics, press, problems, suicide, अधिकारी, आत्महत्या, किसान, पत्रकार, पत्रकारिता, प्रधानमंत्री, भ्रष्टाचार, महंगाई, राजनीतिक, संपादक, समस्या, सरकार, सुप्रीम कोर्ट Posted in कानून और व्यवस्था, जब तोप मुकाबिल हो, विधि-न्याय, संपादकीय, समाज by Author: संतोष भारतीय | No Comments » | Read More... |
आख़िरकार बजट पेश हो गया और बजट भाषण भी बिना किसी परेशानी के पूरा हो गया. जेपीसी की मांग मान ली गई और पीएसी भी अपनी तऱफ से जांच करेगी. अंतत: सीवीसी को भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बेआबरू होकर अपने कूचे से निकलना पड़ा.
Tags: Bill, Budget, Inflation, government, planning, political, बजट, महंगाई, योजना, राजनीतिक, विधेयक, सरकार Posted in कानून और व्यवस्था, राजनीति, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: मेघनाद देसाई | No Comments » | Read More... |
महंगाई ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है. अब जो सबसे बड़ा सवाल है, वह यह है कि एक प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों में देश की कमान होते हुए भी इस समस्या का निदान क्यों नहीं हो रहा है. हालत यह है कि देश के मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोगों की ज़िंदगी की गणित गड़बड़ा गई है.
Tags: Alzeria, Economist, Industrial, Inflation, Manmohan, Reserve, अर्थशास्त्री, अल्ज़ीरिया, औद्योगिक, मनमोहन, महंगाई, रिज़र्व Posted in आर्थिक, कानून और व्यवस्था, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: राजीव रंजन तिवारी | No Comments » | Read More... |
बात ज्यादा पुरानी नहीं है. यही कोई सात-आठ साल पहले मैं कानपुर (उत्तर प्रदेश) से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक में कार्यरत था. होली का मौका था, मैं घर पर अपने कमरे में बैठा पुराने अ़खबार पलट रहा था.
Tags: Daily, Hindi, Holi, Inflation, News Paper, festival, अ़खबार, त्योहार, दैनिक, महंगाई, हिंदी, होली Posted in कला और संस्कृति, धर्म, समाज, स्टोरी-6 by Author: महेंद्र अवधेश | No Comments » | Read More... |
प्रणब मुखर्जी के बजट में दबे-कुचलों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों और किसानों के लिए धेले भर की जगह नहीं दिखाई पड़ती. बहुत पहले ही देश में बजट का स्वरूप बदल गया था. आज स्थिति यह है कि बजट सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि जनता को आंकड़ों में उलझा कर बेवक़ूफ़ बनाने की एक सोची समझी साज़िश बनकर रह गया है.
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किसी भी प्रजातंत्र में मीडिया का काम एक प्रहरी का होता है. वह सरकार का नहीं, जनता का पहरेदार होता है. मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि सरकार जो करती है और जो नहीं करती है, वह उसे जनता के सामने लाए. जब कभी सत्तारूढ़ दल, विपक्षी पार्टियां, अधिकारी और पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते हैं, तब मीडिया उन्हें उनके कर्तव्यों का एहसास कराता है.
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आम आदमी का आक्रोश धीरे-धीरे बढ़ रहा है. महंगाई, घोटाले और भ्रष्टाचार इस आक्रोश को हवा दे रहे हैं. इन समस्याओं की असल वजह और इस मसले पर राजनीतिक दलों से लेकर आम आदमी और मीडिया की भूमिका को देखना-समझना होगा.
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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया |
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