बारह साल तक प्रधानमंत्री के रूप में काम करने के बाद पंडित नेहरू जब सत्तर वर्ष के हो गए तो उन्होंने सेवानिवृत्त होने की कोशिश की, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया और उन्हें अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा.
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अन्ना हजारे का आंदोलन सारे देश की चेतना को उभार रहा था. गली-गली, मैदान-मैदान, हर जगह आंदोलन हो रहे थे. ऐसे समय में संसद के ऊपर ज़िम्मेदारी थी कि वह कोई हल निकाले, लेकिन संसद अन्ना हजारे के आंदोलन के खिला़फ खड़ी नज़र आई. उस समय यह ज़रूर लग रहा था कि अगर सोनिया गांधी यहां होतीं तो वह शायद कोई हल निकालने में पहल कर पातीं.
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श्रीमती सोनिया गांधी अमेरिका में अपनी बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं. उन्होंने हिंदुस्तान में कांग्रेस पार्टी को चलाने के लिए चार सदस्यीय कमेटी बनाई. उनकी अनुपस्थिति में पार्टी का सारा काम यह कमेटी देखने वाली है और महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली है. इस कमेटी में राहुल गांधी, ए के एंटनी, जनार्दन द्विवेदी और अहमद पटेल हैं.
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मंत्रिमंडल में हुए व्यापक फेरबदल से जनता को कोई फायदा नहीं हुआ. उल्टा यह संदेश गया है कि सरकार या कांग्रेस पार्टी कंफ्यूजन में है. उसके सामने कोई रोडमैप नहीं है. देश को चलाने के लिए किस तरह के लोग ज़रूरी हैं और पार्टी को चुनाव में जिताने के लिए किस तरह के लोग चाहिए, यह भी कांग्रेस के सामने कुछ साफ़ नहीं है.
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भारत के एक ताक़तवर मंत्री ने सीबीआई के डायरेक्टर को मिलने के लिए बुलाया. जब वे मिलने आए तो उस मंत्री ने चाय मंगवाई. जब चाय का पहला घूंट मंत्री और सीबीआई डायरेक्टर ने ले लिया तो मंत्री ने कुछ कहना चाहा. सीबीआई डायरेक्टर ने उन्हें रोकते हुए विनम्रता से कहा कि मंत्री जी, आपने बुलाया, मैं प्रोटोकाल के तहत आपसे मिलने चला आया.
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राजनीति और आध्यात्म में सबसे बड़ा फर्क़ यह है कि आध्यात्म मनुष्य को मौन कर देता है, जबकि राजनीति में मौन रखना सबसे बड़ा पाप साबित होता है. बाबा रामदेव के हमले के बाद कांग्रेस पार्टी आध्यात्म की ओर मुड़ गई है, उसने चुप्पी साध ली है.
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भारत की राजनीति का यह अजीबोग़रीब दौर है. संत राजनीति कर रहे हैं और राजनीतिक दल संतों की तरह बर्ताव कर रहे हैं. संत से मतलब मौन धारण करना है. ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि किसी पार्टी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, देश भर में रैलियां करके राजनेताओं के ख़िला़फ आग उगली जा रही है और देश चलाने वाली पार्टी चुप्पी साधकर सब कुछ सुन कर रही है.
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भारत दुनिया की नज़रों में 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया था. उस समय हमारे नेताओं, अधिकारियों एवं देशभक्तों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी इस विशाल राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना. वहीं दूसरी तऱफ देश के अंदर वे शक्तियां भी सक्रिय हो उठीं, जिन्हें भारत की आत्मनिर्भरता और आम जनता से ज्यादा फिक्र इस बात की थी कि वे किस प्रकार कम समय में अधिक धन-संपत्ति का संग्रह कर सकें.
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केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार का शोर एक साल से मच रहा था. माना जा रहा था कि बड़ा फेरबदल होगा और वे मंत्री नहीं रहेंगे, जिनके काम का कोई असर नहीं दिखाई दे रहा तथा वे भी नहीं रहेंगे, जिनके खिला़फ संगीन आरोप लगे हैं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विशेष कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित करते हुए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सांप्रदायिक ताक़तों पर कटु हमला किया. उन्होंने कहा कि वे सभी संगठन, विचारधाराएं एवं व्यक्ति, जो हमारे इतिहास को तोड़ते-मरोड़ते हैं, धार्मिक पूर्वाग्रहों को हवा देते हैं और धर्म के नाम पर आमजनों को हिंसा करने के लिए उकसाते हैं, देश के लिए विनाशकारी हैं.
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वेलिंगटन के ड्यूक ने वाटरलू में कहा था कि वह नेपोलियन की सेना की तुलना में अपनी सेना से ज़्यादा डरे हुए थे. भारत के प्रधानमंत्री को भी कुछ-कुछ ऐसा ही एहसास जल्द ही हो सकता है. सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच संबंध पर कांग्रेस के प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि इन दोनों के बीच आज जो समझ है, उससे बेहतर कभी नहीं हो सकती.
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बात 2006 की है. सूचना क़ानून को लागू हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे. बिहार के झंझारपुर का एक रिक्शाचालक मजलूम इंदिरा आवास योजना के तहत आवेदन देता है. अब खंड विकास अधिकारी उसके आवेदन को पास करने के लिए 5 हज़ार रुपये की रिश्वत मांगता है. अनपढ़ और ग़रीब मजलूम तीन साल से बीडीओ कार्यालय में धक्के खा रहा था, क्योंकि 5 हज़ार रुपये घूस देना उसके लिए संभव नहीं था. इसी बीच वह एक सामाजिक कार्यकर्ता अशोक सिंह से मिला, जिन्होंने उसे सूचना के अधिकार के तहत सूचना मांगने का आवेदन बनाकर दिया. आवेदन डालने के एक सप्ताह के भीतर मजलूम को 15 हज़ार रुपये का चेक मिल गया. एक महीने बाद जब मजलूम बाक़ी राशि लेने बीडीओ दफ्तर पहुंचा तो एक बार फिर उससे रिश्वत की मांग की गई. इस बार अनपढ़ मजलूम ने बीडीओ से कहा कि अगर मेरा पैसा नहीं दोगे तो फिर से सोचना (सूचना) की अर्जी लगा दूंगा. नतीजतन, बिना एक पैसे घूस दिए मजलूम को पूरी राशि मिल गई. अनपढ़ मजलूम की अर्जी ने साबित कर दिया कि एक मौन क्रांति का आगाज़ हो चुका है. आज देश भर में मजलूम जैसे हज़ारों लोग, जो अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं, सूचना का अधिकार क़ानून के सहारे इस मौन क्रांति को आकार देने में जुटे हुए हैं. लेकिन, व्यवस्था में बैठे नेताओं और नौकरशाहों को यह बात हज़म नहीं हो रही है कि कल तक जिन लोगों के लिए वे माई-बाप हुआ करते थे, वही आज उनसे आंख मिलाकर सवाल पूछ रहे हैं. इस देश में आज भी अंग्रेजों के बनाए हुए कई क़ानून गुलामी की याद दिलाते हैं. आज़ादी के 64 साल बाद भी ऐसे क़ानूनों को हटाने, बदलने या उनमें संशोधन की ज़रूरत देश के कर्णधारों को महसूस नहीं होती, लेकिन 5 साल पुराने आरटीआई क़ानून उनकी आंखों में ऐसा चुभ रहा है कि जिसे देखो, वही इसमें संशोधन की बात कर रहा है. नेता, नौकरशाह और जज भी.
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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया |
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