आचार्य विनोबा भावे की अगुवाई में वर्ष 1951 में शुरू हुए भूदान आंदोलन के साठ वर्ष पूरे हो गए हैं. बिहार सहित देश के कई स्थानों पर विनोबा जी के आंदोलन की सराहना की गई, लेकिन इसके ठीक विपरीत बिहार में हज़ारों भूदान किसानों की जमीन खिसक रही है.
महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का साहित्य एक सुषुप्त ज्वालामुखी है, जो एक न एक दिन जनसामान्य को उद्वेलित करेगा. महाकाव्य राधा, चाणक्य एवं कालीदास जैसे उपन्यास और रूप-अरूप, तीर-तरंग, शिवा, मेघगीत, अवंतिका, कानन एवं अर्पण आदि काव्य संग्रहों के रचयिता और पद्मश्री सम्मान प्राप्त महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री की समस्त जीवन साधना ही उनकी साहित्य सर्जना है.
आचार्य राममूर्ति हमारे बीच में हैं और उसी शिद्दत के साथ हैं, जैसे 1954 में थे. 1938 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए इतिहास में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर उन्होंने बनारस के क्वींस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. 1954 में कॉलेज की नौकरी छोड़कर वह श्री धीरेंद्र मजूमदार के आह्वान पर श्रमभारती खादीग्राम (मुंगेर, बिहार) पहुंचे, जहां उन्होंने श्रम-साधना, जीवन-शिक्षण और सादा जीवन के अभ्यास के साथ एक नए जीवन की शुरुआत की.