यूरोपीय शीष्टमंडल और हुर्रियत की लादेनपरस्ती

हुर्रियत कांफ्रेंस की लादेनपरस्ती ने उसे एक बार फिर कठघरे में खड़ा किया है. कश्मीर यात्रा पर आए यूरोपीय संघ के शिष्टमंडल की गतिविधियों से तो यही लगता है. यूरोपीय संघ के राजनयिकों द्वारा हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी से मिलने से मना करना कई अर्थों को जन्म दे रहा है. कहा जा रहा है कि अलक़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के नमाज़े जनाज़ा के आयोजन से नाराज़ होकर यूरोपीय राजनयिकों ने यह क़दम उठाया.

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क्या सचमुच न्याय हुआ?

क्या रावण के साथ न्याय हुआ था? उसने तो राम से अपनी बहन सूर्पनखा की नाक काटने का बदला लेना चाहा था और इसलिए सीता को अगवा किया. क्या यह कारण इतना बड़ा था कि लंका नगरी को ही तबाह कर दिया जाए और उसके साथ-साथ सैकड़ों लोगों को भी मार डाला जाए और मार डाला जाए रावण के सारे बेटों को और फिर उसे भी?

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लादेन अब मॉस्‍को की मुसीबत बना

सोवियत संघ के बिखरने के बाद बने चेचेन गणराज्य में विद्रोही आज़ाद होने के लिए न स़िर्फ बेचैन हैं, बल्कि वे कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं. हालांकि चेचेन विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता आरबी बरायोव रूसी सैनिकों के हाथों मारा जा चुका है, फिर भी वहां शांति की स्थापना असंभव लगती है.

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भारत-पाक वार्ताः बातचीत का यह कैसा तरीका है

यह अजीबोग़रीब स्थिति है कि एक आतंकी की वजह से न्यूक्लियर शक्ति से लैस दो देश आपस में अपने रिश्ते ख़राब करने पर आमादा हैं. यह किस तरह की डिप्लोमेसी है कि दोनों देश के महान राजनयिक उसी निर्णय पर पहुंच जाते हैं, जो दोनों देशों में आतंक फैलाने वाले आतंकी चाहते हैं.

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आतंकवाद के खिलाफ जंगः रणनीति में खामी

आतंकवाद के खिला़फ चल रही जंग की रणनीति में कुछ ऐसी आधारभूत खामियां हैं कि इस जंग में जीत हासिल करने का भी शायद ही कोई फायदा हो. युद्ध की रणनीति बनाते समय अमेरिका और पाकिस्तान इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गए कि यह एक बहुआयामी लड़ाई है.

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आतंकवाद : वास्तविकता को पहचानने की ज़रूरत

सैन्य अभियान समस्या का कोई समाधान नहीं है. इस मुद्दे के साथ कई पहलू जुड़े हैं, जिनके लिए एक बहुआयामी

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