पुस्तक मेले लेखकों का प्रचार मंच बन चुके हैं

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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धूप भी चांदनी-सी लगती है

आधुनिक उर्दू शायरी के क्रांतिकारी शायर अली सरदार जा़फरी ने अपनी क़लम के ज़रिये समाज को बदलने की कोशिश की. उनका कहना था कि शायर न तो कुल्हा़डी की तरह पे़ड काट सकता है और न इंसानी हाथों की तरह मिट्‌टी से प्याले बना सकता है. वह पत्थर से बुत नहीं तराशता, बल्कि जज़्बात और अहसासात की नई-नई तस्वीरें बनाता है.

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ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें

बीसवीं सदी के मशहूर शायरों में जां निसार अख्तर को शुमार किया जाता है. उनका जन्म 14 फरवरी, 1914 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक सुन्नी मुस्लिम परिवार में हुआ. उनके पिता मुज़्तर खैराबादी मशहूर शायर थे. उनके दादा फज़ले-हक़ खैराबादी मशहूर इस्लामी विद्वान थे. जां निसार अख्तर ने ग्वालियर के विक्टोरिया हाई स्कूल से दसवीं पास की. इसके बाद आगे की प़ढाई के लिए वह अलीग़ढ चले गए, जहां उन्होंने अलीग़ढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की.

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समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

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सोनिया: कुछ कही, कुछ अनकही

किसी भी शख्स की जीवनी लिखना एक श्रमसाध्य काम है और अगर कोई लेखक किसी मशहूर हस्ती की जीवनी लिखना शुरू करता है तो उसका यह काम उस नट की तरह होता है, जो दो खंभों के बीच रस्सी पर एक डंडे के सहारे संतुलन बनाकर चलता है.

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मैं तुझे फिर मिलूंगी

अमृता प्रीतम ने ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने शब्दों में पिरोकर रचनाओं के रूप में दुनिया के सामने रखा. पंजाब के गुजरांवाला में 31 अगस्त, 1919 में जन्मी अमृता प्रीतम पंजाबी की लोकप्रिय लेखिका थीं. उन्हें पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. उन्होंने क़रीब एक सौ किताबें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है.

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साक्षात्‍कारः बड़े ढांचे में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का चलना मुश्किल

83 वर्षीय सच्चिदानंद सिन्हा एक समाजवादी कार्यकर्ता, चिंतक एवं लेखक हैं. उस दौर में जब समाजवादी विचारधारा महानगरों एवं चर्चाओं तक सीमित रह गई हो, तब सच्चिदानंद बाबू की न स़िर्फ लेखनी, बल्कि उनकी जीवनशैली भी समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करती नज़र आती है.

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गली-गली चोर है

बॉलीवुड में रूमी जा़फरी की पहचान एक लेखक के रूप में है. कई हिट फिल्मों की कहानी, स्क्रीन प्ले और संवाद उन्होंने लिखे हैं. डेविड धवन के लिए उन्होंने कई कॉमेडी फिल्मों में लेखन किया है. हीरो नं 1, घरवाली बाहरवाली, बड़े मियां छोटे मियां, दुल्हन हम ले जाएंगे, मैंने प्यार क्यों किया जैसी हिट फिल्मों से उनका नाम जुड़ा है.

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औरत की बोली

पिछले कई सालों से हिंदी में साहित्येतर विधाओं की किताबों के प्रकाशन में का़फी तेज़ी आई है. प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी इस ओर गंभीरता से ध्यान दिया है. कई लेखकों ने कहानी, कविता, उपन्यास से इतर समाज के उन विषयों को छुआ है, परखा है, जो अब तक हिंदी समाज की नज़रों से ओझल थे.

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पांच दशक से समीक्षा कर्म में लगे हैं मधुरेश

प्रेमचंद की मशहूर कहानी पंच परमेश्वर में अलगू चौधरी और खाला के बीच एक संवाद है- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे. यह बात उस प्रसंग में कही गई है जब खाला, जुम्मन से परेशान होकर पंचायत करवानी चाहती है.

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जन्‍मदिवस 31 जुलाई पर विशेषः प्रेमचंद के सपनों का भारत

मुंशी प्रेमचंद के सपनों का भारत निश्चित ही गांधी के सपनों का भारत था. गांधी ने आज़ाद भारत का बड़ा तल्ख तजुर्बा किया. प्रेमचंद इस मायने में भाग्यशाली थे कि उन्होंने आज़ाद भारत का दु:ख और पराभव नहीं देखा. बेकल उत्साही के एक गीत का यह मुखड़ा प्रेमचंद के सपनों के भारत को सजीव करता है:

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कुंठा @ प्रेम डॉट कॉम

विमल कुमार हिंदी के पाठकों के बीच एक जाना-पहचाना नाम हैं. लिक्खाड़ पत्रकार हैं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य और साहित्येतर विषयों पर उनके लेख और टिप्पणियां प्रकाशित होती रहती हैं. अच्छे कवि भी हैं और कविता के लिए 1987 में ही भारत भूषण पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं.

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चमकीली दुनिया, काला सच

उपन्यास में आत्मकथ्य की परंपरा हिंदी में बहुत पुरानी है. अपनी रचना में मैं को प्रतिस्थापित करने से एक तो रचना की विश्वसनीयता बढ़ जाती है और दूसरे कल्पना के भंवरजाल से मुक्त होकर कृति एक नया आयाम प्रस्तुत करती है.

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तट है, तटस्‍थ नहीं

रामचंद्र गुहा आज़ाद भारत के ऐसे इतिहासकार हैं, जिन्होंने इतिहास लेखन को मार्क्सवादी ढर्रे से मुक्त कराकर उसे लोकप्रिय बनाया. उनकी शैली शास्त्रीय इतिहास लेखन से बिल्कुल अलग हटकर है, जिसे इतिहास के विद्यार्थियों के अलावा आम पाठकों ने भी सराहा है.

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पद्मश्री आचार्य जानकी वल्‍लभ शास्‍त्रीः तिमिर गरल पिया अमृत भोर के लिए

महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का साहित्य एक सुषुप्त ज्वालामुखी है, जो एक न एक दिन जनसामान्य को उद्वेलित करेगा. महाकाव्य राधा, चाणक्य एवं कालीदास जैसे उपन्यास और रूप-अरूप, तीर-तरंग, शिवा, मेघगीत, अवंतिका, कानन एवं अर्पण आदि काव्य संग्रहों के रचयिता और पद्मश्री सम्मान प्राप्त महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री की समस्त जीवन साधना ही उनकी साहित्य सर्जना है.

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प्रचारप्रियता की विचारधारा

चंडीगढ़ में एक सेमिनार में हुर्रियत के नेता मीरवाइज उमर फारुख के साथ धक्कामुक्की की गई और उन्हें भाषण देने से रोकने की कोशिश की गई. हंगामा करने वालों का आरोप था कि वह एक भारत विरोधी सेमिनार में हिस्सा लेने आए थे और भारत विरोधी बातें कह रहे थे. इस मानसिकता के पीछे के कारणों को जानने की ज़रूरत है. लंबे समय से शहर दर शहर घूम-घूमकर भारत विरोधी सेमिनार किए जा रहे हैं. इन सेमिनारों में एक किताब लिखकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल कर लेने वाली लेखिका अरुंधति राय, जिन्हें वन बुक वंडर कह सकते हैं, प्रमुखता से शामिल हो रही हैं.

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लाल चश्मे से देखा गया इतिहास

आत्मकथा या संस्मरण एक ऐसी विधा है, जिसमें अमूमन उसका लेखक खुद को कसौटी पर नहीं कस पाता है. विश्व साहित्य की अगर हम बात करें तो इस बात के सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं, जहां लेखक अपने आसपास के परिवेश और परिचितों पर तो निर्ममतापूर्वक कलम चलाता है, लेकिन ख़ुद को न केवल बचाकर चलता है, बल्कि अपनी एक आदर्श व्यक्ति की तस्वीर पेश करता है.

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समाचार बाज़ार की नैतिकता

जैसा कि किताब के नाम, समाचार बाज़ार की नैतिकता से ज़ाहिर है कि यह मीडिया से जुड़ी पुस्तक है और लेखक ने मीडिया को बाज़ार के बरक्श रखकर नैतिकता को कसौटी पर कसा होगा. दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर कुमुद शर्मा ने बेहद श्रमपूर्वक देश-विदेश के लेखकों एवं मीडिया पुरोधाओं के उद्धरणों के आधार पर भारतीय मीडिया के बदलते स्वरूप को सामने लाने की कोशिश की है.

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अप्रासंगिक लेखक संगठन

वर्ष 1935 में लंदन के नानकिंग रेस्तरां में बैठकर सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद, ज्योति घोष, प्रमोद सेन गुप्ता एवं मोहम्मद दीन तासीर जैसे लेखकों ने एक संगठन की बुनियाद रखने की बात पर विचार विमर्श किया था और यही विमर्श बाद में इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का आधार बना और इसी नाम से संगठन की नींव पड़ी.

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अतीत मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण : राजेंद्र मोहन

मेरे लिए अतीत इसलिए जरूरी है जैसे पेड़ के लिए जड़. जड़ रहित पेड़ खड़ा नहीं रह सकता. संसार में भारत को इसीलिए सबसे ज़्यादा महत्व हासिल है, क्योंकि उसके पास वेदोपनिषद्‌ जैसे ज्ञान के उत्कृष्ट भंडार हैं. वेद तो संसार के प्राचीनतम एवं आध्यात्मिक ग्रंथ हैं, जो संसार को सदैव उज्ज्वल दृष्टि प्रदान करते रहे हैं, कहते हैं लेखक एवं साहित्यकार डॉ. राजेंद्र मोहन भटनागर.

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बाज़ार के फंदे में हिंदी कहानीकार

अभी चंद दिनों पहले की बात है, मेरी पत्नी चित्रा मुदगल की किताब-गेंद और अन्य कहानियां ख़रीद लाई. इस संग्रह के ऊपर दो मासूम बच्चों की तस्वीर छपी है और नीचे लिखा है, बच्चों पर केंद्रित कहानियों का अनूठा संकलन. मुझे भी लगा कि पेंग्विन से चित्रा जी की कहानियों का नया संग्रह आया है, लेकिन जब मैंने उसे उलटा-पुलटा तो लगा कि उसमें तो उनकी पुरानी कहानियां छपी हैं.

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बयासी साल का ज़िंदादिल जवान

दिल्ली के साहित्य प्रेमियों को हर साल 28 अगस्त का इंतज़ार रहता है. साहित्यकारों को तो खासतौर पर. हर साल यह दिन दिल्ली में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है. दिल्ली के सारे साहित्यकार एक जगह इकट्ठा होते हैं, जमकर खाते-पीते हैं. महानगर की इस भागदौड़ और आपाधापी की ज़िंदगी में कई लोग तो ऐसे भी होते हैं, जो साल भर बाद इस दिन ही मिलते हैं.

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नारायण सुर्वे: आम जनता का कवि

ऐसा गामी ब्रह्म, माझे विद्यापीठ एवं जाठीरबामा जैसे कविता संकलनों के रचयिता एवं प्रसिद्ध मराठी विद्वान पद्मश्री नारायण सुर्वे नहीं रहे. पिछले दिनों उनका निधन हो गया, वह 83 साल के थे. नारायण अनाथ थे, बचपन में उनका पालन पोषण सुर्वे नामक मज़दूर ने किया था.

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कारण कवन नाथ मोहे मारा

नया ज्ञानोदय के अगस्त 2010 अंक में छपे मेरे इंटरव्यू पर हुई प्रतिक्रियाओं से एक बात स्पष्ट हो गई कि मैंने अपनी लापरवाही से एक गंभीर विमर्श का हेतु बन सकने का मौक़ा गंवा दिया. मैंने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिनसे बचा जा सकता था.

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पच्चीस का हंस

आज से पच्चीस साल पहले जब अगस्त 1986 में राजेंद्र यादव ने हंस पत्रिका का पुनर्प्रकाशन शुरू किया था, तब किसी को भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यह पत्रिका निरंतरता बरक़रार रखते हुए ढाई दशक तक निर्बाध रूप से निकलती रहेगी, शायद संपादक को भी नहीं. उस व़क्त हिंदी में एक स्थिति बनाई या प्रचारित की जा रही थी कि यहां साहित्यिक पत्रिकाएं चल नहीं सकतीं.

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प्लेगियरिज़्म और कॉपीराइट क़ानून की उलझन

27 जून के दैनिक हिंदुस्तान में शब्द पृष्ठ के अंतर्गत युवा स्वर स्तंभ में एक स्पष्टीकरण प्रकाशित किया गया है कि 20 जून के अंक में युवा स्वर के तहत प्रकाशित कविता खूंटी में टंगी ज़िंदगी पूर्व में सितंबर 2001 की कादंबिनी पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी थी. दैनिक हिंदुस्तान को यह सूचना कविता के मूल रचनाकार बृजेश कुमार त्यागी ने दी.

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अज्ञानता का दर्प

अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब फिल्म थ्री इडियट्स में क्रेडिट को लेकर लेखक चेतन भगत ने ख़ासा बवाल खड़ा कर दिया था. चेतन भगत के दो हज़ार चार में लिखे उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन-व्हाट नॉट टू डू एट आईआईटी पर विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्म बनाई, जो सुपरहिट रही थी.

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अदम्य जिजीविषा की दास्तां

आत्मकथा और जीवनियों में मेरी शुरू से ही रुचि रही है. देशी-विदेशी लेखकों, साहित्यकारों, फिल्म कलाकारों और राजनेताओं की दर्जनों आत्मकथाएं मैंने पढ़ी हैं. पिछले दिनों कूरियर से मुझे डॉ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना की आत्मकथा- मेरी आत्मकथा, कालजयी संघर्ष गाथा मिली.

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पौराणिक आख्यान, नई व्याख्या

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में महाभारत और रामायण दो ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्हें लेकर विद्वानों के बीच आज भी आकर्षण है. इन ग्रंथों को पिछले सैकड़ों सालों से नए-नए तरीक़े से व्याख्यायित करने और उसके पुनर्पाठ की तमाम कोशिशें जारी हैं. निरंतर अनुसंधान के फलस्वरूप अनेक नए आधार स्रोतों का उद्घाटन भी होता रहा है.

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