भावनात्मक मुद्दों पर लड़ा जाएगा 2019 का चुनाव

अब इसे अचम्भा नहीं मानना चाहिए कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, खासकर लोकसभा चुनाव, वैसे-वैसे पूरा चुनाव राम

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सुप्रीम कोर्ट में आज से शुरू होगी राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार से एक बार फिर राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई शुरू हो रही हैै. पिछले साल

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मस्जिद नहीं भारत की गौरवमयी परम्परा टूटी है

(अयोध्या में ढांचा गिराये जाने पर 17 दिसम्बर, 1992 को लोकसभा में चन्द्रशेखर) आज मैं अटल जी से निवेदन करूंगा

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तो इस तरह से सुलझ जाएगा राम मंदिर विवाद, Video में देखें

सालों से चले आ रहे राम मंदिर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक चौंकाने वाला फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट

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बाबरी मस्जिद मामला : बढ़ सकती है उमा, आडवानी और मुरली मनोहर की मुश्किलें

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद मामले में सुनवाई में देरी होने पर चिंता जताई है।

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6 दिसंबर: बाबरी मस्जिद का गिरना और एक फैसले का इंतजार

चौथी दुनिया ब्यूरो: अयोध्या में आज ही के दिन 1992 में बाबरी मस्जिद को उग्र हिंदू कारसेवकों ने गिरा दिया. इसके

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पहले वादे अब शब्दजाल में फंसाने की कोशिश

देश की राजनीति में उथल-पुथल है, क्योंकि अंधराष्ट्रीयता के शब्दजाल ने तथ्यात्मक बहस की जगह ले ली है. सुरक्षा बल,

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चुनावी चेहरे के चयन पर चर्चा में कभी राजनाथ तो कभी कल्याण : भाजपा को अपने कल्याण की फिक्र…

अमित शाह के एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही उत्तर प्रदेश के नए अध्यक्ष और

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पत्थर डाल कर रोड़ा हटाने का जतन

अयोध्या के लोगों को न राम मंदिर से कोई लेना-देना है और न बाबरी मस्जिद से. अयोध्या की सड़कों और

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मंदिर-मस्जिद नहीं, रोजगार चाहिए

अचानक रामजन्म भूमि का मुद्दा देश में गरमाने लगा. बिहार चुनाव से पहले और बिहार चुनाव में गाय मुद्दा थी.

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आजम सपा में पर मुसलमान कहां

समाजवादी पार्टी में वापसी के बाद आजम खान ने भले ही अमर सिंह पर निशाना साधा हो, लेकिन उन्हें अब यह भी साबित करना होगा कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान आज कहां और किसके साथ खड़े हैं. राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी का खेल चलता रहता है, जिसके नफे-ऩुकसान को आम मतदाता, खासतौर पर मुस्लिम समाज अच्छी तरह से समझने लगा है. बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम इसका सबूत हैं. आजम खान की वापसी के बाद मुलायम सिंह यादव, शिवपाल, अखिलेश यादव समेत तमाम नेता ऐसे प्रफुल्लित हैं, मानों समूचा मुस्लिम वोट बैंक पार्टी की झोली में आ गिरा है. सपा के यह खेवनहार लोकसभा चुनाव में रामपुर सीट से जयाप्रदा की शानदार जीत का दृश्य शायद भूल जाते हैं. आजम खान के लाख विरोध करने के बावजूद रामपुर के मुसलमानों ने जयाप्रदा को लोकसभा पहुंचा कर ही दम लिया था. अब सवाल यह है कि जब आजम खान अपने ही घर में प्रभावी नहीं रहे तो वह समूचे उत्तर प्रदेश में मुसलमानों पर कितना प्रभाव छोड़ सकेंगे. वह भी उन परिस्थितियों में, जब मुस्लिम समाज के राजनीतिक मसलों के साथ-साथ प्राथमिकताएं एवं समस्याएं भी बदल चुकी हैं. आम मुसलमान बाबरी मस्जिद की शहादत जैसे भावनात्मक मुद्दों के साथ ही अब शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में हिस्सेदारी के मसले पर भी गंभीर है.

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सुप्रीम कोर्ट के संकेत चिंता का विषय हैं

देश की संसद ठप है. कौन जांच करे, पार्लियामेंट की ज्वाइंट कमेटी या पब्लिक एकाउंट्‌स कमेटी, यह बहस है. दोनों ने नाक का सवाल बना लिया है, पर चिंता का विषय है कि क्यों संसद के बाहर न कोई राजनेता और न राजनैतिक दल, एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार तथा कॉमनवेल्थ खेलों में हुए सत्तर हज़ार करोड़ के ख़र्चों में हुई गड़बड़ी को मुख्य मुद्दा नहीं बना रहे हैं.

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सच्चा धर्म वही, जो आगे बढ़ाए

अयोध्या पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद कई लोग इस सवाल पर बोल रहे हैं. न केवल बोल रहे हैं, बल्कि राजनीति को नए सिरे से मोड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं. लेकिन देश की जनता, जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं और हिंदू भी, इस सवाल से बहुत परेशान नहीं हैं.

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अयोध्या निर्णय: गुनाह करो, ईनाम पाओ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अयोध्या मामले में 30 सितंबर 2010 को फैसला सुनाया. आशंकाओं के विपरीत उस दिन और उसके बाद देश में कहीं हिंसा नहीं हुई. इसका श्रेय आमजनों की परिपक्व सोच को जाता है. जहां तक इस निर्णय का सवाल है, यह तीनों पक्षकारों यानी रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा एवं सुन्नी व़क्फ बोर्ड के बीच संतुलन क़ायम करने की कवायद के अलावा कुछ नहीं है.

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यह परीक्षा की घड़ी है

ऐतिहासिक घटनाएं चुनौतियां लेकर आती हैं. बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद आज़ाद भारत की पहली ऐसी घटना है, जिसने हमारी राष्ट्रीयता और धर्म निरपेक्षता को एक साथ चुनौती दी है. साठ साल से चल रहे विवाद की सुनवाई खत्म हो गई है. अब फैसले का व़क्त आया है. हालांकि यह भी तय है कि फैसला आते ही मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंच जाएगा.

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रण में उतरे राहुल

चुनावी साल में आखिरकार कांग्रेस ने अपने सबसे बड़े योद्घा राहुल गांधी को बिहार के रणक्षेत्र में उतार ही दिया. लंबे इंतजार के बाद पूरे तामझाम के साथ आए राहुल गांधी दो दिनों तक पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का हौसला बढ़ाने के साथ-साथ अपने राजनीतिक विरोधियों को ललकारते रहे.

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पुस्तक अंश-मुन्नी मोबाइल

अहमदाबाद का उनका अनुभव सबसे अलग-थलग था. वहां की यादों से आनंद भारती अब भी सिहर उठते हैं. गोधरा कांड उनकी आंखों से गुज़रा था. उनकी कलम ने उस सच्चाई को बे़खौ़फ अपनी रिपोर्टिंग का हिस्सा बनाया था. अ़खबार की लोकप्रियता भी बढ़ी थी पर स्वयं आनंद भारती के लिए उन दिनों की यादें मीठी कम और तीखी ज़्यादा रही हैं. वह कभी उन्हें याद नहीं करना चाहते, पर वे यादें ऐसी हैं जो कि रील की तरह उनके साथ चलती रहती हैं.

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देश तोड़ने वालों से सावधान रहें

साधु-संतों को समाज में नैतिकता, प्यार, स्नेह, सहिष्णुता, अपरिग्रह का बुनियादी संदेश, जो सनातन धर्म का आधार है, फैलाना चाहिए. उन्हें वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्ति सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया याद रखना चाहिए, जो भारतीय समाज का पांच हज़ार वर्ष से ज़्यादा समय से आधार रहा है, पर वे तो इसे भूलते जा रहे हैं.

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लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट के बाद भी आरएसएस पर बैन क्यों नहीं?

लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और शिव सेना को बाबरी कांड के लिए दोषी ठहराया है. अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती एवं गोविंदाचार्य समेत कई भाजपा नेताओं को भी इसके लिए ज़िम्मेदार बताया गया है. रिपोर्ट के निष्कर्ष इस बात के लिए पर्याप्त हैं कि सरकार, संघ और भाजपा पर अविलंब प्रतिबंध लगा सके. बाबरी कांड के गुनहगार हमारे सामने हैं, उनके बयान हैं, वीडियो हैं, भाषण के टेप हैं, उनको सज़ा दिलाने के लिए लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट भी है, लेकिन सरकार ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है. उन्हें दंडित करने के बजाय सरकार दार्शनिक मुद्रा में आ गई है. भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए वह क़ानून बनाने की सोच रही है.

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लिब्रहान : सत्रह साल और कुछ आश्चर्य

लिब्रहान जान-बूझकर हेराफेरी एवं अनिर्दिष्ट जांच एजेंसियों पर दोष मढ़कर राव का बचाव करते हैं. हर कोई जानता था कि उस समय क्या चल रहा था. दूसरों की अपेक्षा आईबी के अधिकारियों को तो सारी बातें और भी बेहतर तरीक़े से मालूम थीं. राव ने स़िर्फ शाम को कैबिनेट की मीटिंग बुलाई, वह भी तब, जबकि बचाने के लिए कुछ रह नहीं गया था, यहां तक कि प्रतिष्ठा भी.

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वाजपेयी जी संघ का सभ्य मुखौटा हैं!

अयोध्या की आपराधिक घटना के बाद जल्द ही दिल्ली में उन्होंने एक और नाटक का मंचन किया. उन्होंने घोषणा की कि वह राजनीति से संन्यास ले रहे हैं. अगर कोई बहुत मूर्ख होता (वहां पर्याप्त पत्रकार थे) तो उसे विश्वास होता कि वह राजनीति छोड़ रहे हैं. वाजपेयी जी अपनी ज़ुबान के कितने पक्के थे, यह इस तथ्य से आसानी से समझा जा सकता है कि उन्होंने दो मर्तबा प्रधानमंत्री पद की ज़िम्मेदारी संभाली.

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धर्म, राजनीति और हमारा संविधान

भारतीय संविधान में यह स्पष्ट तौर पर भावना व्यक्त की गई है कि राज्य और राजनीति को सभी प्रकार के धार्मिक विश्वासों से दूर रहना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और रोज़मर्रा की राजनीति में खुलेआम या छिपे तौर पर धर्म को वोट बैंक की राजनीति के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. कांग्रेस पर हमेशा से अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है और ख़ुद को वह अल्पसंख्यकों के मसीहा के रूप में पेश करती रही है.

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