इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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कंपनी बिल-2011 : राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया

14 दिसंबर, 2011 को लोकसभा में एक घटना घटी. डॉ. वीरप्पा मोइली ने दोपहर के बाद कंपनी बिल-2011 लोकसभा में पेश किया. इस बिल में राजनीतिक दलों को कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले धन का प्रावधान है. इस बिल के पेश होने के एक घंटे के अंदर कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी बोलने के लिए खड़े हुए. उन्होंने कहा कि काला धन प्रमुख तौर पर हमारे चुनाव में मिलने वाले चंदे से जुड़ा हुआ है और इस चुनावी चंदे के स्वरूप में परिवर्तन करके काले धन की समस्या पर बहुत हद तक क़ाबू पाया जा सकता है.

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लोकपाल के नाम पर धोखाः कहां गया संसद का सेंस ऑफ हाउस

इस बार दिल्ली की जगह मुंबई में अन्ना का अनशन होगा. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से गिरफ्तारियां दी जाएंगी. इसकी घोषणा टीम अन्ना ने कर दी है. आख़िरकार, वही हुआ, जिसकी आशंका चौथी दुनिया लगातार ज़ाहिर कर रहा था. अगस्त का अनशन ख़त्म होते ही चौथी दुनिया ने बताया था कि देश की जनता के साथ धोखा हुआ है.

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सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयकः मौजूदा कानून कहीं से कमतर नहीं

भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के बावजूद देश में टाडा जैसे क़ानून लागू हुए, मगर अपराध फैलते ही रहे. परिणाम यह हुआ कि जनता की मांग के मद्देनज़र न्याय की प्राप्ति के लिए 2005 और 2009 में विभिन्न स़िफारिशों एवं संशोधनों पर आधारित नया विधेयक प्रस्तुत किया गया. अब 2011 में पुराने क़ानूनों में संशोधन करके नया बिल पेश कर दिया गया है.

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मिलिए लोकतंत्र के राजाओं से

राजनीति पेशा है या समाजसेवा का ज़रिया, इसका जवाब इस साल संसद के मानसून सत्र को देखकर पता लग जाता है. सत्र के दौरान सांसदों ने जिस तरीक़े से अपना वेतन और भत्ता बढ़ाने की मांग की, उससे यह साफ हो गया कि इन माननीयों के लिए राजनीति समाजसेवा का ज़रिया तो कतई नहीं हो सकती.

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दिल्‍ली का बाबूः सुधार के लिए बिल

सेवानिवृत्ति के बाद नियामक संस्थाओं के साथ जुड़ने के सपने संजो रहे नौकरशाहों के लिए योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का बयान चिंता का कारण बन सकता है. नियामक संस्थाओं में सुधार के लिए प्रस्तावित बिल पर चर्चा करते हुए अहलूवालिया ने कहा था कि सचिव स्तर से सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी उन नियामक संस्थाओं से न जुड़ें तो अच्छा है, जिनसे सेवाकाल में उनका वास्ता रहा है.

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संसदीय सत्रों का भी ऑडिट हो

आज भारत में ऐसा एक भी संस्थान नहीं है, जिसके कार्यकलापों का एक निश्चित अवधि में अंकेक्षण (ऑडिट) न किया जाता हो. अंकेक्षण समय की मांग और ज़रूरत दोनों है. यह वह हथियार है, जिसके माध्यम से हम किसी भी संस्थान की ख़ामियों का पता लगा सकते हैं और उनका निराकरण कर सकते हैं.

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केवल उद्देश्य अच्छा होने से बात नहीं बनती

ज्‍यादा उत्साह स्पष्ट लक्ष्यों का कोई विकल्प नहीं है. महिला आरक्षण बिल की नेकनीयती को लेकर कोई संदेह नहीं, समस्या तो बिल के प्रावधानों को अमल में लाने के तरीक़ों पर है. ऐसा लगता है, जैसे राजनीतिक रूप से सही दिखने की चाहत में राजनीतिक वास्तविकताओं को परे रख दिया गया है.

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